सम-सामयिक

आज भी प्रासंगिक हैं गाँधी

गांधी जी ने कहा था ‘‘मैं हिंसा से जुड़े शाॅर्टकट में विश्वास नहीं करता। यद्यपि मैं प्रशंसनीय उद्ेश्यों के प्रति सहानुभूति रखता हूँ, फिर भी मैं सबसे महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी हिंसक तरीकों का कट्टर विरोधी हूँ। इसलिये हिंसा के मार्ग और मेरे बीच वास्तव में कोई सामंजस्य नहीं है।’’
जीवन पर्यन्त अहिंसा की बात करने वाले दीन-हीन दलितों के लिये अपना सर्वस्व त्याग देने वाले, देश की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बापू को बेहद हिंसक तरीके से 30 जनवरी 1948 को मार दिया गया था। यह सोचकर कि गांधी की मृत्यु के साथ ही उनके चिन्तन उनकी विचारधारा का भी अन्त हो जायेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। आज इतने वर्षों बाद भी गांधी ज़िन्दा हैं अपने विचारों के रूप में। हमें विश्वास है कि जब तक भारत अस्तित्व में रहेगा गांधी की आत्मा हमारे बीच जीवित रहेगी और हमारा मार्गदर्शन करती रहेगी।
गांधी जी ने अपने पूरे जीवन में सत्य अहिंसा के अभ्यास पर बल दिया। गांधी जी मूल रूप से एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और अत्यन्त व्यवहारिक व्यक्ति थे। एक दार्शनिक वैज्ञानिक की तरह गांधी जी ने समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिये अनेक व्यावहारिक प्रयोग किये। उन्होंने उस समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से जन-मानस को रूबरू कराया तथा उसके उन्मूलन पर काम किया। उनके घनिष्ठ मित्र धीरेन्द्र मजुमदार गांधी दर्शन को जीवन जीने का एक तरीका मानते हैं। गांधीवादी विचारधारा के महानतम व्याख्याकारों में से एक राज धर्माधिकारी भी यही कहते हैं कि गांधी एक विचार हंै जो सदैव जीवित रहेगा।
एक स्वतंत्रता सेनानी एक दार्शनिक एक नैतिकतावादी, एक अध्यात्मवादी और सबसे बढ़कर एक सत्य के अनुयायी के रूप में गांधी न केवल आज बल्कि भविष्य के लिए भी प्रासंगिक हैं। आज वैश्विक स्तर पर भी जब हिंसा की निंदा की जा रही है, धार्मिक कट्टरता को फटकारा जा रहा है और उच्च स्तरीय तकनीकी प्रगति भी दुनिया के करोड़ों लोगों की समस्या का समाधान नहीं कर पा रही है, तब गांधी जी ही सम्पूर्ण मानवता के अस्तित्व की एकमात्र उम्मीद हैं।
अनादिकाल से ही मनुष्य अपने दैनिक जीवन में किसी न किसी धर्म का पालन करता है और यही धार्मिक आस्था जब कट्टरता में परिवर्तित हो जाती है तो विश्व में अनेक युद्धों का कारण बनती है। गांधी जी इस बुराई का भी एक सुन्दर उत्तर देते हैं, वे कहते हैं, ‘‘सभी धर्म इस तथ्य को मानते हैं कि ईश्वर सत्य है। यदि यह एक धर्म के लिये सत्य है तो यह दूसरे धर्मों के लिये भी सत्य ही होगा। इस तरह गांधी सभी धर्मों के साझा सिद्धांत को सामने लाते हैं और उनके लिये ‘सत्य ही ईश्वर है।’ उनका कहना था कि यदि इस अवधारणा को सभी मान लें तो किसी भी धर्म के विरुद्ध कोई दुर्भावना नहीं रहेगी। यदि इस सुन्दर सिद्धांत का पालन करें तो सभी धर्मों का सभी के द्वारा सम्मान होगा। इसीलिये धर्म के संदर्भ में गांधी का अध्ययन सरल तरीके से किया जाना चाहिये।
यद्यपि इन सबसे ऊपर गांधी जी ने धर्म के बारे में और भी बहुत कुछ विस्तार से समझाया है। अपने लम्बे अध्ययन और अनुभव के बाद गांधी जी ने निष्कर्ष स्वरूप कहा था कि 1. सभी धर्म सत्य हैं, 2. सभी धर्मों में कुछ न कुछ त्रुटि है,
3. सभी धर्म मुझे लगभग उतने ही प्रिय हैं जितना मेरा हिन्दू धर्म। गांधी जी विभिन्न धर्मों के एक ही बिन्दु पर आने वाले अलग-अलग रास्तों की तरह मानते हैं। इस विचार इस चिन्तन में धर्म में कट्टरता का अलगाववाद की कोई गुंजाइश नहीं है। गांधी जी ने एक बार कहा था कि मेरा धर्म कारागार का धर्म नहीं है, उन्होंने कभी भी इस कट्टरपंथी विचारधारा का समर्थन नहीं किया कि पृथ्वी पर केवल एक ही धर्म हो सकता है, या होगा।
वे हमेशा पारस्परिक सहिष्णुता के समर्थक रहे। उनका धर्म तो सर्वधर्म समभाव जो स्वामी विवेकानंद सार्वभौमिक धर्म और टैगोर के ‘मानव धर्म’ के बहुत समीप है। उनका धर्म विभिन्न धर्मावलम्बियों को एकत्रित करता है उन्हें एक मंच पर लाता है ताकि वे परम सत्य अर्थात मानवता की भावना तक पहुंच सकें। गांधी का धर्म मनुष्य को आध्यात्मिक और वैज्ञानिक बनाता है। जैसा कि विनोबा भावे ने कहा है कि आध्यात्मिकता और विज्ञान का योग सर्वोच्च है। इसलिये यदि वर्तमान में भी गांधी जी की धर्म सम्बन्धी अवधारणा का पालन किया जाय तो घृणा, द्वेष, शत्रुता, युद्ध और विनाश की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। यदि आज की दुनिया को तबाही से बचाना है तो केवल एक ही रास्ता है गांधीवादी मार्ग यानी सार्वभौमिक धर्म का पालन करना, जो दुनिया में शान्ति, सुकून और सद्भाव कायम करेगा।
अब तो पश्चिमी विचारक भी राजनीति में नैतिकता की बात करने लगे हैं जबकि गांधी जी ने बहुत पहले राजनीति में नैतिक मूल्यों की स्थापना की बात की थी। यही कारण था कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सत्य और अहिंसा के दोहरे हथियारों से लड़ना पड़ा था, जो बाद में एक गम्भीर आन्दोलन बना जिसे गांधी जी ने सत्याग्रह का नाम दिया। उनके लिए राजनीति ‘सेवा का द्वार खोलती है, न कि सत्ता का उपयोग करने का।’ गांधी जी के लिये राजनीति नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है। जो आज की आवश्यकता नैतिकता के माध्यम से राजनीति में क्रांति लाना है। उनका मानना था कि जब तक जनता के नैतिक और आध्यात्मिक गुण उपयुक्त नहीं होंगे, तब तक सर्वोत्तम राजनीतिक व्यवस्था और संविधान भी सफल नहीं होंगे। लोकतंत्र को सुरक्षित करने के लिये हमें जनशक्ति को स्वीकार करना ही होगा गांधी की प्रासंगिकता निर्विवाद और अकाट्य है।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button