सचेत करती है संभल दंगे की रिपोर्ट

मुरादाबाद (यूपी) के संभल में 24 नवम्बर 2024 को हिंसा भड़क गयी थी। इस हिंसा मंे 4 लोगों की मौत हो गयी थी और 29 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। पुलिस ने हिंसा के सिलसिले मंे सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क और मस्जिद समिति के प्रमुख जफर अली के साथ 2750 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। मामला काफी गंभीर था और मस्जिद से भी जुड़ा था, इसलिए योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज देवेन्द्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता मंे तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था। इस आयोग ने 28 अगस्त 2025 को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी है। इस विवाद के दो भाग हैं। पहला यह कि संभल की शाही मस्जिद को एक हिन्दू मंदिर के ऊपर बनाये जाने का आरोप लगाते हुए दो प्रमुख अधिवक्ताओं समेत कई हिन्दुओं ने संभल जिला अदालत मंे मुकदमा दायर कराया था। अदालत के आदेश पर सर्वेक्षण शुरू हुआ और इसको लेकर विरोध भी जताया गया। विवाद का दूसरा हिस्सा ज्यादा गंभीर है जब मस्जिद के दूसरे सर्वेक्षण के समय हिंसा फैली। अब जांच रिपोर्ट मंे जो तथ्य सामने आये हैं, उनका खुलासा इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं किया गया था। सपा के नेता इस रिपोर्ट को लेकर विरोध कर रहे हैं कि रिपोर्ट का खुलासा क्यों नहीं किया जा रहा है? बहरहाल, इस रिपोर्ट को लेकर मौलाना साजिद रशीदी ने जो खुलासा किया, उससे एक गंभीर सवाल उठा है। यह सवाल मुख्यमंत्री योगी भी उठा चुके हैं और देश के कई भागों मंे ऐसे सवाल उठ रहे हैं। मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि रिपोर्ट मंे बताया गया है कि संभल मंे पहले 45 फीसद हिन्दू थे लेकिन अब 15 प्रतिशत हिन्दू बचे हैं अर्थात वहां अशांति के चलते हिन्दुओं ने पलायन किया है। देश के कई हिस्सों मंे हिन्दुओं की यह डेमोग्राफी बदली है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग ने 28 अगस्त को नवंबर 2024 में हुई संभल हिंसा पर अपनी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी। न्यायाधीश अरोड़ा, भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी अरविंद कुमार जैन और भारतीय प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड अधिकारी अमित मोहन प्रसाद सहित पैनल के सदस्यों ने मुख्यमंत्री से 28 अगस्त को मुलाकात की। पिछले साल 24 नवंबर को संभल में शाही जामा मस्जिद के पास भड़की हिंसा पर अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे। प्रमुख सचिव (गृह) संजय प्रसाद ने बताया कि संभल की घटना की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है। रिपोर्ट के विवरण के बारे में प्रसाद ने कहा, हम इसका अध्ययन करने के बाद ही कुछ बता सकते हैं। आगे की कार्रवाई उसी के अनुसार की जाएगी। यह विवाद पिछले साल 19 नवंबर से शुरू हुआ है, जब अधिवक्ता हरि शंकर जैन और विष्णु शंकर जैन सहित हिंदू याचिकाकर्ताओं ने संभल स्थित जिला अदालत में एक मुकदमा दायर किया था जिसमें दावा किया गया था कि शाही जामा मस्जिद एक मंदिर के ऊपर बनाई गई थी। अदालत के आदेश पर उसी दिन (19 नवंबर) एक सर्वेक्षण किया गया, उसके बाद 24 नवंबर को एक और सर्वेक्षण किया गया। 24 नवंबर को हुए दूसरे सर्वेक्षण से संभल में भारी अशांति फैल गई, जिसके परिणामस्वरूप चार लोगों की मौत हो गई और 29 पुलिसकर्मी घायल हो गए।
संभल हिंसा पर मौलाना साजिद रशीदी ने कहा, संभल हिंसा पर सीएम योगी ने एक कमेटी का गठन किया था, जिन्होंने एक रिपोर्ट सौंपी और बताया कि पहले संभल में 45 प्रतिशत हिंदू थे, लेकिन अब 15 प्रतिशत हिंदू रह गए हैं। इन लोगों ने बार-बार होने वाले दंगों के कारण पलायन किया है। मैं इस रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण मानता हूं। उन्होंने कहा, संभल में मंदिर को लेकर विवाद हुआ और कहा गया कि मंदिर की दीवारों को ढक दिया गया, मगर ऐसा नहीं था। खुद मंदिर के पुजारी ने बताया था कि हम पर किसी ने वहां से जाने का दबाव नहीं बनाया था और अपने काम की वजह से ही शिफ्ट होना पड़ा है। ऐसी बातें सामने आने के बावजूद गोपनीय रिपोर्ट पेश करना, मुझे लगता है कि इस वजह से संभल में फिर दंगे भड़केंगे और इससे जनता का काफी नुकसान होगा।
ज्ञात हो कि संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे 24 नवंबर, 2024 को हुआ था। इस दौरान हजारों की संख्या में इकट्ठा हुए लोगों ने पुलिस पर पथराव-फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। भीड़ ने गाड़ियों को फूंक दिया था। इस मामले में कई उपद्रवियों को जेल भेजा जा चुका है। इस रिपोर्ट के बाद माना जा रहा है कि अब हिंसा के मामले में एक्शन और तेजी से होगा।
इस बीच भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अजय आलोक ने हिंसा की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए तीखी टिप्पणी की है। आलोक ने कहा
कि भारत के सियासतदानों ने गजवा-ए-हिंद की सोच को प्रमोट किया। चुन चुन के हिंदुओं को टारगेट किया गया और डेमोग्राफी बदली गई। संभल इसका बड़ा उदाहरण है। ये भाईजान सिंड्रोम देश को खा रहा है। आलोक के अलावा बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि संभल में जिस तरह बार-बार दंगे हुए और उसमें हिंदुओं का कत्ल-ए-आम हुआ, जिसकी वजह से वहां से बड़ा पलायन हुआ। रिपोर्ट भी इसी ओर इंगित कर रही है कि बड़ी संख्या में दंगों और हिंसा की वजह से पलायन हुआ। जनसांख्यिकीय बदलाव देश की डेमोक्रेसी के लिए बड़ा खतरा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पठान तुर्क में आपसी संघर्ष में हमेशा से संभल जलता रहा है। 1947 से हर दंगे में सिर्फ हिंदू मारे जा रहे हैं। इस बार भी हिन्दुओं को मारे जाने की प्लानिंग थी। दंगा करने के लिए बाहर से बलवाइयों को बुलाया गया था। हिंदू मोहल्ले में पुलिस की मौजूदगी के कारण हिंदू बच गए। तुर्क पठानों ने पुरानी रंजिश में दंगों के दौरान एक दूसरे को मारा।
डेमोग्राफी के संदर्भ में रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संभल में सिर्फ 15 प्रतिशत हिंदू बचे हैं। आजादी के वक्त संभल नगर पालिका में 45 प्रतिशत हिंदू थे। दंगों और तुष्टिकरण की राजनीति ने डेमोग्राफी बदल दी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने भी असम में जनसांख्यिकी में बदलाव के मुद्दे पर बड़ा दावा किया है। सीएम हिमंत ने कहा है कि अगर राज्य में मौजूदा वृद्धि दर जारी रहती है तो साल 2041 तक असम में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं के लगभग बराबर हो जायेगी। सीएम हिमंत ने ये भी बताया है कि साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम में 34 फीसदी मुसलमानों में से 31 फीसदी वे हैं जो पहले असम में आकर बस गए थे।
10 वर्षों में असम में हिंदू अल्पसंख्यक बन जाएंगे वाले अपने कथित बयान पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा- यह मेरा विचार नहीं है। यह जनगणना का परिणाम है। आज, 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में 34 फीसद आबादी अल्पसंख्यक है। इसलिए, यदि आप 3 फीसद स्वदेशी असमिया मुसलमानों को हटा दें, तो 31 फीसद मुसलमान असम में प्रवास कर गए हैं। इसलिए, यदि आप 2021, 2031 और 2041 के आधार पर अनुमान लगाते हैं, तो आप लगभग 50-50 की स्थिति पर आते हैं। सीएम हिमंत ने कहा कि आंकड़े और पिछली जनगणना के रिकॉर्ड से समझ आता है कि अब से कुछ साल बाद असम में मुस्लिम आबादी लगबग 50 प्रतिशत हो जाएगी। संभल दंगे की रिपोर्ट भी यही कह रही है।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)