लेखक की कलम

यूपी कांग्रेस की कमान आराधना को

देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश मंे अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं। एक तरफ भाजपा जहां योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व मंे लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की रणनीति बना रही है, वहीं विपक्षी दल अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयास करते दिख रहे हैं। मौजूदा हालात को देखकर साफ लग रहा है कि विपक्षी दलों का उत्साह मिलकर भाजपा को हराने का उतना नहीं है, जितना खुद को मजबूत करने का है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) विपक्षी दलों के गठबंधन में पहले से ही शाामिल नहीं है लेकिन गठबंधन से खुलकर इनकार भी नहीं कर रही है। बसपा प्रमुख मायावती अपने दल को युवा नेतृत्व देने के लिए लगातार प्रयोग कर रही हैं लेकिन कमान अपने ही हाथ मंे रखेंगी, यह भी स्पष्ट है। उधर, समाजवादी पार्टी (सपा) ने रायबरेली से पीडीए रथयात्रा निकाल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। यह शक्ति प्रदर्शन भाजपा के लिए कम और कांग्रेस के लिए ज्यादा था। इसीलिए कांग्रेस ने भी संगठन में सोशल इंजीनियरिंग बदल दी है। प्रदेश
अध्यक्ष पद से अजय राय को हटाकर ब्राह्मण चेहरा आराधना मिश्रा को राज्य की कमान सौंप दी है। प्रदेश के प्रभारी गौतम पाल हैं और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को यूपी कांग्रेस वर्किंग प्रेसिडेंट बनाया गया है। इस प्रकार कांग्रेस का अपना अलग पीडीए है।
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस का समीकरण दशकों तक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम पर टिका हुआ था। बीते करीब तीन दशकों में उसके हाथ से दलित छिटका, फिर मुस्लिमों के नाम पर आरजेडी और सपा जैसे नए दल उभर आए। इसके अलावा ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा में चला गया। अब कांग्रेस ने यूपी में फिर उस समीकरण को आराधना मिश्रा उर्फ मोना के जरिए साधा है। इसके अलावा इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। पिछड़े समाज के आलोक निषाद भी उपाध्यक्ष बन गए हैं तो वहीं दलित वर्ग के आलोक प्रसाद भी वाइस प्रेसिडेंट हैं। दलित समाज से ही यूपी के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम भी आते हैं। यही कारण है कि इसे कांग्रेस की अपना पुराना पीडीए समीकरण साधने की कोशिश माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस ने 1989 तक सत्ता का स्वाद चखा था, फिर मंडल और कमंडल की राजनीति का उभार हुआ तो कांग्रेस का पूरा ताना-बाना बिखर गया। ब्राह्मणों समेत सवर्णों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर मुड़ गया तो वहीं पिछड़ों की राजनीति के नाम पर उभरे सपा, आरजेडी जैसे दलों ने अलग गोलबंदी की। दलितों का बड़ा हिस्सा बसपा, लोजपा जैसे दलों में चला गया। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास कोई ऐसा सामाजिक वर्ग नहीं बचा, जिसे उसका समर्पित वोट बैंक कहा जा सके। मुस्लिमों का बड़ा हिस्सा उसके साथ काफी बाद तक बना रहा, लेकिन जब मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और मायावती जैसे नेताओं की ताकत इतनी बढ़ी कि भाजपा को हरा सकें तो मुसलमान समय-समय पर इन लोगों का साथ देता रहा। इस तरह कांग्रेस से मुसलमान भी दूर होते गए। अब कांग्रेस को फिर से मुसलमानों, दलितों और सवर्णों से उम्मीद दिख रही है। इनमें भी ब्राह्मणों पर कांग्रेस फोकस कर रही है, जिनके बारे में लगातार प्रचारित किया जा रहा है कि वे भाजपा से नाराज हैं। ऐसे मौके पर कांग्रेस ने आराधना मिश्रा मोना को चांस दिया है। एक तरफ वह मुश्किल वक्त में जीतने वाली विधायक हैं तो वहीं महिला भी हैं और ब्राह्मण भी। पहले भी 2017 में कांग्रेस ने शीला दीक्षित को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी पहचान दिल्ली से ज्यादा थी। अब यूपी की रहने वाली और यहीं पर विधायक तथा लंबी विरासत का हिस्सा आराधना मिश्रा को आगे बढ़ाकर कांग्रेस ने कई समीकरणों को साधने की कोशिश की है।
उत्तर प्रदेश के रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और प्रयागराज जैसे जिलों में कांग्रेस कभी बहुत मजबूत हुआ करती थी। बुरे वक्त में भी कांग्रेस को रायबरेली और अमेठी से सहारा मिला है। यहां के सामाजिक समीकरण में ब्राह्मण और क्षत्रियों की आबादी काफी अधिक है। ऐसे में आराधना मिश्रा को चांस देकर कांग्रेस ने वह गणित भी मजबूत करने की कोशिश की है। इसके अलावा इमरान मसूद को प्रमोशन देकर कांग्रेस पश्चिम यूपी के जिलों में खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इस बेल्ट में यादवों की आबादी कम है। ऐसे में सपा का पीडीए समीकरण उतना मजबूत नहीं बन पाता। इसलिए कांग्रेस को लगता है कि मुस्लिम वोटरों को लुभाकर वह पश्चिम में अपनी दावेदारी बढ़ा सकती है।
आराधना मिश्रा उर्फ मोना रामपुर खास विधानसभा क्षेत्र सीट से कांग्रेस पार्टी की विधायक हैं। माना जा रहा है कि यूपी में कांग्रेस महिला के साथ-साथ ब्राह्मण फेस को प्रमोट करना चाहती है। आराधना मिश्रा मोना पार्टी की कद्दावर नेता हैं। वह रामपुर खास से तीसरी बार की विधायक हैं। आराधना मिश्रा मोना ने रामपुर खास से पहला चुनाव 2014 के उपचुनाव में जीता था। इसके बाद, 2017 और 2022 में भी आराधना मिश्रा मोना जीती थीं। अब आराधना मिश्रा मोना को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। साथ ही, सहरानपुर से सांसद इमरान मसूद को भी यूपी चुनाव से पहले बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। उन्हें यूपी कांग्रेस का वर्किंग प्रेसीडेंट बनाया गया है। इसके अलावा, देविंदर निषाद और आलोक प्रसाद को सीनियर वाइज प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया है। आराधना मिश्रा ने कहा कि मैं पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ इस जिम्मेदारी को निभाऊंगी। कांग्रेस पार्टी के लिए जाति, समुदाय और धर्म कभी भी राजनीतिक विवाद के मुद्दे नहीं रहे हैं। कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जिसने पूरे देश को साथ लेकर काम किया है और आगे भी ऐसा ही करेगी। हम हर किसी को साथ लेकर चलेंगे- हर जाति, हर समुदाय और हर धर्म के लोगों को। इंडिया गठबंधन 2027 का चुनाव पूरी ताकत और जोश के साथ लड़ेगा। लड़ाई कहां, कैसे और किस हद तक लड़ी जाएगी, इसका फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा। यह फैसला उन्हीं पर निर्भर करता है।अभी तक अजय राय अध्यक्ष के रूप में यूपी कांग्रेस की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनका कार्यकाल 17 अगस्त 2023 से 2 अक्टूबर 2026 तक रहा। अजय राय ने बृजलाल खाबरी की जगह ली थी और अब उनकी जगह आराधना मिश्रा मोना ने ली है। नई नियुक्तियों में कांग्रेस ने यूपी में इमरान मसूद को वर्किंग प्रेसिडेंट बनाकर उनका कद भी बढ़ा दिया है। यूपी चुनाव से पहले ये जिम्मेदारी अहम मानी जा रही है। उधर, चुनाव में गठबंधन के लिए सपा-कांग्रेस में तकरार भी जारी है। हाल ही में कांग्रेस के 150 सीटें मांगने वाले बयान पर सपा सांसद रामजी लाल सुमन ने कहा था कि कांग्रेस को जमीनी हकीकत समझनी चाहिए।
आराधना मिश्रा ने 1997 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई पूरी की। मिश्रा का घनिष्ठ संबंध राजनीतिक पृष्ठभूमि से है। अब उन्हंे यूपी मंे एक नई कांग्रेस खड़ी करनी होगी।

(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button