भगत सिंह का संदेश देती योगी की पाती

शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह उस जेनजी के लिए ज्यादा प्रासंगिक हैं जिसकी ताकत तो इस देश ने देख ली लेकिन उसकी मुल्क परस्ती अभी देखना बाकी है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेनजी का आंदोलन परीक्षा और नौकरी तक ही सीमित था लेकिन देश को नयी सोच देकर विकसित राष्ट्रों की पंक्ति मंे खड़ा करने के लिए मुल्कपरस्ती भी दिखानी होगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश और देश के नाम पर अपनी पाती लिखते रहते हैं। इस बार 27 सितम्बर की पाती में योगी आदित्यनाथ ने भगत सिंह के बलिदान को याद करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने की युवाओं से अपील की है। योगी ने संक्षेप में बताया है कि युवाओं को किन-किन मुद्दों पर विशेष ध्यान देना होगा। शहीद भगत सिंह कहा करते थे कि जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है, दूसरे के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं। वह यह भी कहते थे कि आपका जीवन तभी सफल हो सकता है, जब आपका लक्ष्य निश्चित हो और आप उस लक्ष्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हों। योगी आदित्यनाथ ने अपनी पाती में इसीलिए भगत सिंह के संदेश दिये हैं। यह पाती शहीद भगत सिंह की जयंती पर लिखी गयी है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अमर शहीद भगत सिंह की जयंती के अवसर पर प्रदेशवासियों के नाम योगी की पाती लिखी। इसमें उन्होंने भगत सिंह के बलिदान को याद करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने और युवाओं को ज्ञान से जोड़ने की अपील की।सीएम योगी ने पाती में लिखा कि मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में भगत सिंह ने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनकी जयंती राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखते हुए अपने संकल्प को नई ऊर्जा देने का अवसर है। उन्होंने लिखा कि भगत सिंह ने परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े भारत को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। पाती में मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जाति-पाति, नशा और अन्य सामाजिक बुराइयों की बेड़ियों से मुक्ति के लिए भगत सिंह के अदम्य साहस और राष्ट्रनिष्ठा से सीख लेनी होगी। सीएम योगी ने लिखा कि भगत सिंह अध्येता थे और हिंदी, उर्दू, पंजाबी एवं अंग्रेजी सहित कई भाषाओं के ज्ञाता थे। उनके जीवन से ज्ञान को अपनी शक्ति बनाने, सीखने की ललक को जीवित रखने और संकल्प को कर्म से जोड़ने की प्रेरणा मिलती है।
पाती में मुख्यमंत्री ने लिखा कि ज्ञान जब कौशल से जुड़ता है तो युवा अपनी प्रतिभा को सामर्थ्य में बदलकर अपने सपनों को साकार कर सकता है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार युवाओं को शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, उद्यम और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक सहयोग दे रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के जरिए प्रतियोगी परीक्षाओं की निःशुल्क तैयारी, मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान के जरिए उद्यम स्थापित करने और रोजगार सृजित करने एवं स्टार्टअप नीति के जरिए नवाचार और उद्यमशीलता को प्रोत्साहन दिए जाने का जिक्र किया। उन्होंने योगी की पाती में युवाओं से उत्तर प्रदेश में उपलब्ध ज्ञान के साधनों का अधिक से अधिक सदुपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने लिखा कि प्रदेश में भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर प्रत्येक जनपद में आधुनिक पुस्तकालय एवं डिजिटल लाइब्रेरी विकसित की जा रही हैं, ताकि ज्ञान तक पहुंच सहज हो।
मुख्यमंत्री ने युवाओं से पुस्तकों को अपना मित्र बनाने, प्रश्न पूछने, नए विचारों को जानने और अपनी जिज्ञासा को निरंतर जीवित रखने की अपील की। उन्होंने लिखा कि एक पुस्तक किसी युवा के जीवन में नया विचार जगा सकती है और एक नया विचार पूरे समाज को नई दिशा दे सकता है। ध्यान रहे 28 सितंबर को शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती मनाई जाती है। देश की आजादी के लिए उनके संघर्ष, साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है। भगत सिंह ने कम उम्र में ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई और अपने क्रांतिकारी विचारों से देश के युवाओं में नई चेतना जगाई। उनका जीवन देशभक्ति, साहस और मातृभूमि के लिए समर्पण की मिसाल माना जाता है। भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि गहरे विचार रखने वाले युवा भी थे। उनके लेखों और विचारों में आजादी के साथ-साथ सामाजिक समानता, शोषण से मुक्ति और बेहतर समाज की कल्पना दिखाई देती है। यही वजह है कि उनके विचार आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं।
28 सितंबर के इस खास अवसर पर उनके जीवन और योगदान को याद करने के साथ उनके विचारों और देशभक्ति से जुड़े प्रसिद्ध नारों को भी याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को बंगा, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय एक सिख परिवार से थे। उनके पिता किशन सिंह तथा चाचा अजीत सिंह क्रांतिकारी थे, उनके चाचा को मांडले निर्वासित कर दिया गया था और बाद में वे सैन फ्राँसिस्को स्थित गदर पार्टी से जुड़े। जब भगत सिंह 12 वर्ष के थे तब उन्होंने जलियाँवाला बाग में हुए नरसंहार को देखा, जिससे उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल हुई और उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिये लड़ने की प्रेरणा मिली। बाद में उन्होंने लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ उन्हें स्वदेशी और क्रांतिकारी विचारों से परिचित कराया गया।
भगत सिंह वर्ष 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बने, बाद में वर्ष 1928 में इसका नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया गया। वर्ष 1926 में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिये युवाओं को संगठित करने हेतु नौजवान भारत सभा की स्थापना की। इसके बाद वर्ष 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (राजनीतिक गतिविधियों को दबाने और व्यक्तियों को निर्वासित करने) और व्यापार विवाद विधेयक (श्रमिकों के हड़ताल करने के अधिकार पर अंकुश लगाने) का विरोध करने के लिये केंद्रीय विधानसभा में कम तीव्रता वाले बम फेंके।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र केस (1928) में दोषी ठहराया गया था, जिसमें लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या शामिल थी, जिसे लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये अंजाम दिया गया था। तीनों को 23 मार्च, 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गई।
भगत सिंह एक कट्टर नास्तिक और समाजवादी थे, जो मार्क्स, लेनिन, ट्रॉट्स्की और बाकुनिन जैसे विचारकों से प्रभावित थे। उनकी रचनाएँ, जिनमें मैं नास्तिक क्यों हूँ भी शामिल है। तर्कवाद, समानता और सामाजिक न्याय में उनके विश्वास को दर्शाती हैं।
भगत सिंह ने अमृतसर के उर्दू और पंजाबी समाचार पत्रों के लिये लेखन किया, साथ ही उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी की पत्रिका ‘कीर्ति’ में भी लिखा और कुछ समय हेतु दिल्ली के ‘वीर अर्जुन’ समाचार पत्र में भी कार्य किया। वे प्रायः बलवंत, रंजीत और विद्रोही जैसे उपनामों का प्रयोग करते थे।
भगत सिंह, जिन्हें ‘शहीद-ए-आजम’ की उपाधि दी गई, ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा दिया, जो भारत की आजादी की लड़ाई का एक सशक्त घोषवाक्य बन गया। हमारे देश में प्रतिवर्ष 23 मार्च को भारत स्वतंत्रता सेनानियों- भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान को सम्मान देने के लिये शहीद दिवस मनाया जाता है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



