विश्व-लोक

नार्थ कोरिया में 70 साल से काबिज है किम का परिवार

नार्थ कोरिया में सत्ता करीब 70 साल से एक ही परिवार के हाथ में है। शासन ऐसा कि कोई चूं तक न कर सके। पूरी दुनिया से कटा लेकिन जो अमेरिका जैसे सबसे बड़ी महाशक्ति को भी डराए रखता है। आज भी किम इल सुंग की बनाई शख्सियत की पूजा जैसी छवि कायम है। यानी यहां के लोग उन्हें भगवान जैसे पूजते हैं या पूजने को मजबूर हैं। उनके पोते किम जोंग उन भी ‘जीता-जागता भगवान’ माने जाते है।
शुरुआत हुई थी एक युवा गुरिल्ला लड़ाके से, जो जापानी कब्जे के खिलाफ लड़कर हीरो बना और आगे चलकर नॉर्थ कोरिया का तानाशाह बन गया। किम इल सुंग सिर्फ अपने शासन को मजबूत करके नहीं रुके। उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनकी मौत के बाद सत्ता किसके हाथ में जाएगी। इसी सोच के साथ उन्होंने सत्ता को परिवार के अंदर रखने वाली वंशवादी व्यवस्था खड़ी कर दी। यही व्यवस्था आज तक चली आ रही है। किम इल सुंग के बनाए इस सिस्टम में उनकी शख्सियत को ‘जीता-जागता भगवान’ जैसी छवि दी गई। उनकी बनाई व्यक्तित्व पूजा करीब 70 साल बाद भी नॉर्थ कोरिया में कायम है। आज देश पर उनके पोते किम जोंग उन का शासन है, जिन्हें भी इसी तरह की छवि के साथ पेश किया जाता है।
1910 में, जापान द्वारा कोरिया पर कब्जा करने और उसे अपना उपनिवेश बनाने के साथ ही कोरिया में चोसुन राजवंश का अंत हो गया। कोरियाई लोग आज भी जापानी औपनिवेशिक शासन को एक क्रूर अनुभव के तौर पर याद करते हैं। जैसे हम भारत के लोग अंग्रेजी शासन को याद करते हैं। कोरिया और चीन में बागी समूह बने, जिन्होंने दक्षिणपंथी जापानी सरकार के विरोध में ज्यादा लेफ्टिस्ट राजनीति को अपनाया। इस दौरान कोरिया में आधुनिकीकरण भी शुरू हुआ, और खासकर प्योंगयांग शहर ईसाई धर्म और पश्चिमी संस्कृति का एक जीवंत केंद्र बन गया।
1945 में जापान की हार के बाद, सोवियत संघ (रूस) और अमेरिका कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध के बाद के नियंत्रण को आपस में बांटने पर सहमत हुए। 10 अगस्त 1945 को, अमेरिका के दो युवा सैन्य अधिकारियों ने 38वें समानांतर पर अमेरिका और सोवियत कब्जे वाले क्षेत्रों को अलग करने वाली एक रेखा खींची। यह बंटवारा अस्थायी होना चाहिए था। कहा गया कि यह कोरिया के लंबे इतिहास में बस एक छोटी सी घटना है लेकिन शीत युद्ध के शुरू होने से यह एक बहुत अहम घटना बन गई। कोरिया में अपना-अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश में, अमेरिका और सोवियत संघ ने अपने पक्ष के नेताओं को सत्ता सौंपी। (हिफी)

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