क्या है गणेश की मूर्ति का रहस्य

क्या आपको पता है कि गणेश चतुर्थी के दिन हम गणेश की मूर्ति घर क्यों लाते हैं। इस हाथी के मुँह वाले रूप के पीछे कौन सा अर्थ है जो हम नहीं जानते। सदियों से हम जिस गणेश भगवान की पूजा करते आ रहे हैं आइये आज उनके स्वरूप के रहस्य को समझते हैं। गणेश सिर्फ मन्दिर में बैठी हुई एक मूर्ति नहीं हंै, गणेश हमारे भीतर बैठी उसे चेतना का नाम है जिसे हमने अभी तक पहचाना ही नहीं है। इस बात पर गौर करना जरूरी है कि यदि गणेश सिर्फ धन देने वाले देवता हैं, बाधायें दूर करने वाले देवता हैं तो उन्हें हाथी का सिर और मूषक की ही सवारी क्यों दी गई। उनका एक दंत ही क्यों रखा गया है। इस भगवान का ऐसा स्वरूप क्यों बनाया गया है।
इसका मुख्य कारण है कि हमारा धर्म हमेशा संकेतों और प्रतीकों में बोलता है लेकिन हम लोग संकेत नहीं समझ पाते और कहानी को पकड़ लेते हैं। मूर्ति की पूजा, प्रसाद सब अच्छी बात है लेकिन गणेश चतुर्थी इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि इस एक दिन हमें अपने भीतर उतरने का मौका मिलता है। यह दिन अपने अन्दर के विघ्न को देखने का है हमारे अपने भीतर अनेक बाधायें होती हैं डर, क्रोध, अहंकार, चिन्ता, तुलना, ईष्र्या, भविष्य की बेचैनी, अतीत का बोझ, हार जाने का भय और स्वयं को न पहचान पाना। इनको समझना, पहचानना जरूरी है। गणेश का हाथी जैसा मस्तक इसी ओर संकेत करता है, यह इस बात का प्रतीक है कि बड़े बनना लेकिन दिखने में नहीं, समझ में। दृष्टि बड़ी होनी चाहिये। प्रशंसा और निंदा में सम रहो गणेश का विशाल सिर इस बात का संदेश देता कि छोटी घटनाओं में मत उलझो जिसकी दृष्टि छोटी होती है उसके लिये छोटी सी घटना भी पहाड़ बन जाती है और बड़ी दृष्टि वालों के लिए पहाड़ सी परेशानियाँ भी छोटी हो जाती हैं। कमजोर व्यक्ति शोर करता है, जो भीतर से बड़ी सोच वाला होता है वह गंभीर होता है। जो भीतर से खाली होता है वह बाहर से अपने को बड़ा दिखाना चाहता है, जो स्वयं को नहीं जानता वह चाहता है कि पूरी दुनिया उसे जाने। हाथी को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, यही गणेश का पहला रहस्य है। गणेश हमें बताते हैं कि बड़े बनो समझ में। कई बार हम देखते हैं कि परिस्थितियों में देखने की दृष्टि से परिणाम बदल जाते हैं क्योंकि जिसकी जैसी समझ होती है, परिणाम उसी हिसाब से आकार ले लेते हैं।
गणेश जी इतने विशाल शरीर के मालिक हैं लेकिन उनका वाहन बहुत छोटा है। मूषक। यह मन का प्रतीक है जिसे गणेश वाहन बनाते हैं। वे चूहे को चला रहे हैं चूहा गणेश को नहीं चलाता है। यहां यह संदेश है कि हमारा मन भी चूहे की तरह है, अज्ञान में डूबे हुये व्यक्ति को मन नियंत्रित करता है जबकि जाग्रत व्यक्ति मन को स्वयं नियंत्रित करता है। गणेश चतुर्थी हमें जाग्रत होने का संदेश देती है। यह गणेश चतुर्थी का दूसरा रहस्य है कि मन के मालिक बनो। गणेश के बड़े कानों का भी रहस्य यही है कि वे शब्दों के पार सुनने की शिक्षा देते हैं। यानी प्रतिक्रिया देने की बात नहीं कहते। वे कहते हैं कि इतना सुनो कि उत्तर देने की जल्दी खत्म हो जाय। गणेश के छोटे नेत्र इस संदेश को देते हैं कि कम देखो मगर गहराई से देखो। छोटी आँखें कहती हंै कि अपनी दृष्टि को भीतर ले जाओ। क्योंकि बाहर जो कुछ भी हो रहा है उसका बहुत सा हिस्सा भीतर से निकलता है। क्योंकि हम जैसे देखते हैं और फिर उसको जैसे समझते हैं उसी पर हमारे जीवन के निर्णय और परिणाम घटित होते है।ं इसीलिये गणेश चतुर्थी में विसर्जन भौतिक रूप से तो हम मूर्ति का करते हैं परंतु वस्तुतः तो यह अपने अहंकार के विसर्जन का दिन है। मूर्ति के पानी में जाने के बाद भी यदि अहंकार हमारे भीतर वैसे ही बैठा रहा तो विसर्जन पूरा नहीं होता। गणेश हमें बाहर से भीतर ले जाने के लिए आते हैं यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का आरम्भ मूर्ति की स्थापना से होता है और अन्त विसर्जन से। स्थापना का अर्थ है जिस चेतना को हमने बाहर खोजा है उसे भीतर स्थापित करना। तथा विसर्जन बाहर से पकड़े हुये स्वरूप को छोड़ देना ही है। गणेश को मूर्ति में नहीं अपने भीतर देखने की जरूरत है। मूर्ति की पूजा को अपने शान्त मन में मौन में देखने की आवश्यकता है यही यात्रा है जो हमें रूप से अरूप, शोर से मौन की तरफ ले जाती है। उनका टूटा हुआ दाँत जीवन की अपूर्णता को दर्शाता है। सब कुछ परफेक्ट कभी नहीं होता उसी अपूर्णता में सौन्दर्य को खोजना ही जीवन को एक नई दृष्टि देना है। जब हमारे भीतर कुछ टूटता है जिसे हम अपनी हार समझते हैं वही परिस्थिति हमें कुछ नया करने की पे्ररणा भी देती है।
आइये कुछ गणेश की सूँढ़ के बारे में जानते हैं
गणेश जी की सूँढ़ बहुत भारी वज़न को उठा भी सकती है और नाजुक चीज को संभाल भी सकती है। यह हमें सिखाता है कि कठोरता और कोमलता का संतुलन जीवन में बहुत जरूरी है। जहां कठोर बनने की जरूरत हो, वहां कठोर जरूर बनो। पर जहां कोमल, मृदु वचन से काम चल सकती है वहां डंडा मत चलाओ। अपने जीवन को परिस्थितियों के अनुसार ढालना गणेश जी की सूंढ़ सिखाती है।
गणेश जी का बड़ा पेट भी एक जरूरी संदेश देता है। जीवन के सुख-दुःख, लाभ, हानि, कठिन, सरल परिस्थितियों को पचा लेने का। हर परिस्थिति में समभाव रखने का। न ज्यादा सुखी, ना ज्यादा दुःखी होने का। जैसे गणेश जी का बड़ा पेट है सब कुछ पचा कर गणेश को प्रसन्न मुख रखता है, वैसे ही जीवन को केवल गुजरते हुए एक दृष्टा की तरह देखो और खुश रहो कर्मा मत बनो।
गणपति के साथ मोरया क्यों
गणपति बप्पा मोरया में मोरया का मतलब मोर बिलकुल नहीं होता। बल्कि इसके पीछे एक कहानी है। एक ऐसे संत की, जो गणेश जी के अनन्य भक्त थे। 14वीं-15वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के चिंचवाड़ में एक संत हुये संत मोरया गोसावी। मोरया गोसावी गणेश भगवान के समर्पित भक्त थे। वे बचपन से ही गणेश जी की पूजा-अर्चना किया करते थे। हर गणेश चतुर्थी को वे लगभग सौ किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मन्दिर तक गणेश भगवान के दर्शन करने जाया करते थे। ये काम उन्होंने लगातार 117 साल तक किया। उम्र अधिक होने पर उनका मन्दिर जाना मुश्किल हो गया। फिर एक रात कुछ ऐसा हुआ जिसने उनकी पूरी जिन्दगी ही बदल दी। ऐसा कहा जाता है कि गणपति बप्पा संत मोरया गोसावी के सपने में आये और उनसे कहा कि अब तुम्हें मेरे पास आने की जरूरत नहीं है, मैं स्वयं तुम्हारे पास आऊँगा। अगली सुबह मोरया गोसावी जब स्नान कंुड से बाहर निकले तो उन्हें वहाँ गणपति की एक मूर्ति मिली। आश्चर्य की बात यह थी कि यह मूर्ति बिलकुल वैसे ही स्वरूप वाली थी जैसे भगवान मोरया को सपने में दिखाई दिये थे। संत मोरया ने उस मूर्ति को मन्दिर में स्थापित किया। धीरे-धीरे खबर पूरे गांव में फैल गई और भक्त दर्शन के लिये उमड़ने लगे। ऐसा माना जाता है कि संत मोरया गोसावी की अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उनसे वर मांगने के लिये कहा। तब उन्होंने भगवान से कहा ‘‘प्रभु बस अपने नाम के साथ मुझे भी स्थान दीजिये।’’ भगवान ने वरदान दिया कि आज से गणपति के साथ भक्त तुम्हारा भी नाम लेंगे। इसी वरदान और मान्यता के चलते आज भी गणेश उत्सव मनाते समय ‘‘गणपति बप्पा मोरया का जयकारा लगाया जाता है।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



