मायावती का अब ईशान पर भरोसा

राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में 19 पार्षद जुटाने के बाद बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती अपनी पार्टी को युवा नेतृत्व देने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि उनका मानना है कि बसपा परिवारवाद की राजनीति नहीं करेगी लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वह परिवार में ही पार्टी का भावी नेता तलाश रही हैं। उनके दो भतीजे और एक भतीजी इस प्रक्रिया मंे कसौटी पर कसे जा रहे हैं। बड़ा भतीजा आकाश आनंद दो बार आजमाया जा चुका है लेकिन खरा नहीं साबित हुआ। आकाश आनंद को सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए मायावती ने भतीजी दीपिका को आगे बढ़ाने की संभावना जतायी थी लेकिन किसी कारणवश प्रियंका राजनीति में नहीं आयीं। अब 23 सितम्बर को छोटे भतीजे ईशान आनंद को बसपा का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है। हालांकि ईशान को लेकर भी मायावती ने पिछले दिनों कहा था कि वह अभी राजनीति मंे अपरिपक्व है लेकिन उत्तर प्रदेश मंे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए वह बसपा को कोई युवा नेतृत्व देना चाहती हैं। ईशान आनंद लंदन में शिक्षा
प्राप्त कर चुके हैं और राजनीति में उनकी रुचि भी बतायी जा रही है। अब देखना यह है कि ईशान आनंद बसपा प्रमुख मायावती की कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं। मायावती के भाई आनंद कुमार बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी पहले से संभाल रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी में उठा-पटक का दौर अभी भी जारी है। पार्टी प्रमुख मायावती ने 23 सितम्बर को पदाधिकारियों की एक बैठक लखनऊ में ली। इसमें उन्होंने अपने भतीजे ईशान आनंद को बसपा का नया राष्ट्रीय संयोजक बनाने की घोषणा की। ईशान के बड़े भाई आकाश आनंद को मायावती ने इसी महीने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। लंदन से पढ़ाई करके आए ईशान आनंद पिछले साल से राजनीति में सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीएसपी ने यह बड़ा कदम उठाया है। ईशान आनंद मायावती के भाई और बीएसपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार के छोटे बेटे हैं। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक का पद इससे पहले ईशान के बड़े
भाई आकाश आनंद के पास था। मायावती ने उनपर अपने ससुर अशोक सिद्धार्थ के साथ मिलकर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया था।
करीब 27 साल के ईशान की शुरूआती शिक्षा दिल्ली और नोएडा में हुई है। उन्होंने लंदन की यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर से कानून की पढ़ाई की है। ईशान आनंद पहली बार 17 जनवरी 2025 को लखनऊ में आयोजित मायावती के 69वें जन्मदिन कार्यक्रम में नजर आए थे। इसके बाद से ही उनकी बसपा में सक्रियता और कोई बड़ा पद दिए जाने की चर्चा तेज हो गई थी। ईशान आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाने के संकेत मायावती ने दिए भी थे। हालांकि कुछ दिन पहले उन्होंने ईशान की बहन दीपिका को बड़ी जिम्मेदारी देने के संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि पार्टी में उनके छोटे भाई आनंद कुमार के किसी भी बेटे को किसी भी छोटे-बड़े पद पर बने रहकर राजनीति करने का मौका नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा था कि परिवार से अब केवल उनकी भतीजी और आनंद कुमार की इकलौती बेटी दीपिका कुमारी को ही जरूरत अनुसार कोई भी राजनीतिक जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इसके अलावा परिवार के किसी भी दूसरे सदस्य को पार्टी में कोई भी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। इसके बाद 20 सितंबर को एक्स पर किए एक पोस्ट में मायावती एक बार फिर अपनी ही बात से पलटती हुई नजर आईं। उन्होंने लिखा,जहां तक आगे चलकर, इनकी बेटी की मदद लेने का सवाल है तो इनकी शादी होने के बाद, फिर इनका मामला भी यदि आकाश आनन्द की तरह ही निकल गया तो यह भी पार्टी हित में सही नहीं होगा। इसे ध्यान में रखकर अब पार्टी हित में यही उचित होगा कि इन दोनों को एकदम दूर रखा जाए अर्थात् अब इनके इस फैसले में कोई भी फेरबदल नहीं किया जाएगा। इन दोनों के स्थान पर आनंद कुमार के परिवार में से केवल ईशान आनंद को ही, पार्टी में सम्मानजनक जिम्मेवारी देकर इनको आगे किया जाएगा, जिससे आकाश आनंद और इनकी बहन की तरह कभी भी कोई चक्कर नहीं रहेगा। अभी तक ऐसा ही लग रहा है। आगे तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।इसके बाद अगर इन्होंने पार्टी विरोधी ऐसा कोई भी गम्भीर कृत्य किया तो फिर इनको भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।
बहरहाल बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने बड़ा सियासी दांव खेलते हुए छोटे भतीजे ईशान आनंद को चीफ सेक्टर कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की जिम्मेदारी मायावती ने अपने पास ही रखी है। यह फैसला ऐसे वक्त पर हुआ है जब 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी पार्टियों ने अपनी कमर कस ली है। यह उत्तर प्रदेश की उस बड़ी बहस का हिस्सा है, जहां परिवारवाद बनाम योग्यता की लड़ाई हर चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनती है। अब मायावती ने यूपी की सियासत में परिवारवाद की बहस को फिर से हवा दे दी है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिवारों से आने वाले विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा है।
एडीआर ने 604 सांसदों, विधायकों और एमएलसी के परिवार के इतिहास का विश्लेषण किया, जिसमें पाया गया कि 141 यानी 23 फीसदी नेता राजनीतिक परिवारों से आते हैं। यूपी में 69 महिला प्रतिनिधियों में से 29 यानी 42 फीसदी राजनीतिक परिवारों से आती हैं।
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव के आंकड़े देखिए। भाजपा और उसके सहयोगियों ने 273 सीटें जीतीं। इनमें अपना दल की 12, निषाद पार्टी की 6 सीटें शामिल हैं। सपा गठबंधन ने 125 सीटें जीतीं, जिसमें सपा की 111, आरएलडी की 8 और एबीएसपी की 6। बसपा को सिर्फ 1 सीट मिली। कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। राजा भैया की जनसत्ता दल को 2 सीटें
मिलीं।
इसका मतलब है कि जिन पार्टियों के पास ज्यादा विधायक हैं, उनमें से ज्यादातर का सीधा संबंध राजनीतिक परिवारों से है। मायावती ने आकाश आनंद को पहले हटाया, फिर ईशान को जिम्मेदारी दी। उन्होंने कहा कि आकाश अपने ससुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव में आ गए हैं। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि बसपा में भी परिवार की भूमिका को लेकर खींचतान चल रही है। मायावती चाहती हैं कि पार्टी कांशीराम की विरासत की तरह परिवार से दूर रहे लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यूपी की राजनीति में परिवार के बिना पार्टी चलाना मुश्किल है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



