
सवालों के घेरे में ज्ञानेश कुमार
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और 80 वर्ष की प्रौढ़ता के बाद अगर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो यह सामान्य बात नहीं है। टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे ज्ञानेश कुमार को इसका जवाब कुछ इस तरह से देना होगा कि देश की 140 करोड़ जनता संतुष्ट हो सके। अभी यह कहना सही नहीं होगा कि तमाम लोग निर्वाचन आयोग की बैठक के बाद आए बयान से संतुष्ट हैं और सिर्फ विपक्षी दल के लोग ही ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा मांग रहे हैं। इस प्रश्न के साथ निर्वाचन आयोग के दो सहायक आयुक्तों के विरोध और महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस चोकलिंगम के निर्वाचन आयोग को लिखे पत्र को भी जोड़ना पड़ेगा। चोकलिंगम ने निर्वाचन आयोग से ईसीआई नेट साफ्टवेयर में बदलाव करने का अनुरोध किया है। चोकलिंगम चाहते हैं कि मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) मतदाता सूची में गड़बड़ियों से जुड़े मामले में अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकें। दूसरे शब्दों में कहें तो महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एस चोकलिंगम चाहते हैं कि ईआरओ को ज्यादा अधिकार दिये जाएं तो मतदाताओं के साथ न्याय हो सकेगा। अभी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के फैसले के आधार पर ही ईआरओ कार्य कर रहे हैं और मतदाताओं के बारे मंे जानते हुए भी उनके हाथ बंधे रहते हैं। यही आपत्ति मुख्य निर्वाचन आयोग के दो सहायक आयुक्तों- डा. सुखवीर सिंह संधू और डा. विवेक जोशी ने भी उठाई थी। हाल में जो विवाद खड़ा हुआ है उनके मूल में एक बिन्दु यह भी है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर ईआरओ के अधिकारों में कटौती पर अपनी असहमति जतायी थी लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उनकी आपत्ति को अनसुना कर दिया था। चुनाव आयोग ने बैठक करके जो सफाई दी उसमंे एक महत्वपूर्ण सवाल भी छिपा है। गत 26 सितम्बर को चुनाव आयोग ने जिन नौ कदमों की घोषणा की है, उनमें एक यह भी है कि अब हर बैठक का एजेण्डा पहले ही सदस्यों को दे दिया जाएगा। सवाल है कि क्या अब तक बिना एजेंडा दिये ही बैठकें होती थीं? इसलिए चोकलिंगम की चिंता बेवजह नहीं है और ज्ञानेश कुमार जी इसे प्रतिष्ठा का सवाल न बनाएं। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की साख का मामला है। संतोष की बात है कि चुनाव आयाग ने फार्म-6 से एसआईआर से जुड़ी घोषणा हटा दी है। दादा-दादी का सत्यापन अब जरूरी नहीं होगा।
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस चोकलिंगम ने निर्वाचन आयोग से ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर में बदलाव करने का अनुरोध किया है, ताकि मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) मतदाता सूची में गड़बड़ियों से जुड़े मामलों में अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकें। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी चोकलिंगम ने निर्वाचन आयोग को 24 सितंबर को भेजे पत्र में यह अनुरोध किया। एक अधिकारी के मुताबिक, सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अक्सर आयोग को अपने सुझाव भेजते रहते हैं और इसमें कोई नयी बात नहीं है। उन्होंने कहा, सॉफ्टवेयर हमेशा केंद्रीकृत होता है और वहीं से नोटिस भेजे जाते हैं। हमने अनुरोध किया था कि ईआरओ को किसी भी गड़बड़ी से जुड़े नोटिस पर फैसला लेने की शक्ति दी जाए। निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा 30 सितंबर से बढ़ाकर 12 अक्टूबर कर दी है। राज्य में 2.07 करोड़ मतदाताओं के गणना प्रपत्र या तो जमा नहीं हो पाए या फिर उन्हें अनुपस्थित, मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टि के तौर पर दर्ज किया गया। अधिकारी के मुताबिक, चोकलिंगम की ओर से भेजे गए पत्र में मतदाताओं के माता-पिता के नाम या उम्र संबंधी जानकारी का मिलान न होने जैसी तार्किक विसंगतियों का जिक्र किया गया है और कहा गया है कि जब ईआरओ जमा किए गए दस्तावेजों से संतुष्ट हों, तो उन्हें मतदाताओं को सुनवाई से छूट देने का अधिकार प्रदान किया जाए। इस बीच, कांग्रेस की महाराष्ट्र इकाई ने ईसीआईनेट प्रणाली के जरिये मतदाता की पात्रता तय करने की ईआरओ की कानूनी शक्तियों को कमजोर किए जाने का आरोप लगाते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंढे ने कहा, अगर कोई गड़बड़ी या विसंगति है, तो कौन मतदाता है और कौन नहीं, यह तय करने का कानूनी अधिकार ईआरओ के पास है। उन्होंने आरोप लगाया कि महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग समेत कई अधिकारियों की संलिप्तता से ईसीआईनेट प्रणाली के जरिये ये अधिकार वापस लिये जा रहे हैं। ईसीआईनेट निर्वाचन आयोग का एक एकीकृत डिजिटल मंच है, जिसका मकसद चुनाव प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना और पारदर्शिता एवं सुलभता बढ़ाना है।
26 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में भारत निर्वाचन आयोग की बैठक हुई थी। इस बैठक में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी उपस्थित रहे। यह बैठक विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और फॉर्म-6 से जुड़े हालिया विवादों और चर्चाओं के बीच हुई थी। एसआईआर पूरा हो चुके राज्यों में नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 से अतिरिक्त एसआईआर घोषणा को हटा दिया गया है, जिससे नए मतदाताओं को अब अलग से पूर्वजों या माता-पिता की जानकारी नहीं देनी होगी। आयोग ने कामकाज में पारदर्शिता के लिए नए नियम तय किए जिसके तहत बैठकों से पहले एजेंडा साझा किया जाएगा और फैसलों का रिकॉर्ड रखा जाएगा। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान, जिन लोगों को जानकारी प्राप्त न होने और तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किया गया है, उन मामलों में बीएलओ दस्तावेज इकट्ठा करने के लिए उनके घर जाएंगे और उसके बाद ईआरओ द्वारा निर्णय लेने के लिए उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। ऐसे लोगों को सुनवाई के लिए ईआरओ कार्यालय नहीं बुलाया जाएगा। केवल असाधारण परिस्थितियों में, जैसा ईआरओ द्वारा तय किया जाएगा, प्राथमिकता के आधार पर ऑनलाइन सुनवाई होगी। यदि आवश्यक हो, तो मतदाता, परिवार के किसी भी वयस्क सदस्य को अपनी ओर से सुनवाई में शामिल होने के लिए अधिकृत कर सकता है। ऑनलाइन सुनवाई की सुविधाओं को मजबूत किया जाएगा। क्षेत्र अधिकारियों को उनकी वैधानिक शक्तियों के
अनुसार ईसीआईनेट प्रणाली तक भूमिका-आधारित पहुंच प्राप्त है। वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त (डीईसी) की
अध्यक्षता में एक समिति, जिसमें आईआईटी का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा, ईसीआईनेट की समीक्षा करेगी तथा जांच करेगी कि यह प्रणाली अधिनियमों और नियमों के प्रावधानों का अनुपालन करती है, अथवा नहीं और आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इस प्रकार चुनाव आयोग जनता का विश्वास अर्जित करने का प्रयास कर रहा है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



