
बंदउं गुरुपद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा
अमिय मूरिमय चूरन चारू, समन-सकल भवरुज परिवार
गोस्वामी तुलसीदास ने ज्ञान देने वाले गुरु का महत्व सर्वाधिक बताया है। उन्होंने कहा है कि मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज अर्थात धूल की भी बंदना करता हूं जो सुरुचि अर्थात सुन्दर है, सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। गुरू के चरण कमलों की धूल अमर मूल अर्थात संजीवनी जड़ी का सुन्दर चूर्ण है जो सम्पूर्ण सांसारिक रोगों (भव रूज) के परिवार को समन अर्थात नष्ट करने की क्षमता रखता है। हमारी भारतीय संस्कृति में चरण स्पर्श अर्थात पैरों को छूकर माथे पर लगाने की परम्परा है। यह परम्परा एक तरफ हमें अपनत्व और सम्मान की याद दिलाती है तो दूसरी तरफ हमारे प्राचीन रहन सहन का इतिहास भी बताती है। बड़ों का हमें सम्मान करना चाहिए। गुरू हमें ज्ञान देता है तो उसका सम्मान करना तो स्वाभाविक है। संत कबीर ने भी कहा है कि गुरू गोविन्द दोऊ खड़े का के लागू पांय।
बलिहारी गुरू आपने जो गोविन्द दियो मिलाय।। अर्थात गुरू और गोविन्द (भगवान दोनों खड़े हैं, पहले किसके चरण स्पर्श करूं? कबीर दास जी कहते हैं कि बलिहारी गुरू की है अर्थात गुरू की पहले वंदना करूं क्यों कि गुरू की कृपा से ही गोविन्द मिले हैं। संस्कृत में भी एक श्लोक है – गुरुब्र्रह्मा, गुरूर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वर।
गुरुः साक्षात परमब्रह्म तस्मैः श्री गुरूवे नमः।। अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरू ही विष्णु है और गुरू ही महादेव भगवान शिव है। गुरू साक्षात परम ब्रह्म (परमेश्वर) है, उस गुरू को मैं नमस्कार करता हूं।
गुरु के बारे में यह भ्रंाति नहीं रखना चाहिए कि कोई तिलक धारी, जटा जूट वाला तपस्वी ही गुरू हो सकता है। हमें जो अच्छी-अच्छी बातें सिखाता है, वही गुरू हैं। प्रारम्भ में बच्चों के गुरू की भूमिका उसके माता पिता या अभिभावक निभाते हैं। परिवार ही बच्चे की प्रारंभिक पाठशाला मानी जाती है। इसके बाद आस पास का समाज और स्कूल से लेकर कालेज और महाविद्यालय तक औपचारिक शिक्षा मिलती है, इसे देने वाले गुरू हैं। हमें जिससे भी अच्छा सीखने को मिले, उसे गुरु के समान ही सम्मान देना चाहिए। मैं जब हाईस्कूल में पढ़ रहा था, तब की एक घटना है। हाईस्कूल में एग्रीकल्चर (कृषि) मेरा विषय था। इस विषय में खेती करने की बातें सिखाई जाती है। अब तो खेतों की जुताई ट्रैक्टर से होने लगी है, पहले बैलों के हल से खेत जोते जाते थे। हल चलाना आसान काम नहीं है। हल में लोहे की एक पैनी नशी लगी होती है जो खेत की मिट्टी को खोदती रहती है। हल को बैल खींचते हैं और किसान उसकी मूठ को बड़ी सावधानी से पकड़ता है। जरा सी चूक हुई नहीं कि हल की नशी बैलों के पैर घायल कर देगी। मुझे हल चलाना नहीं आता था और स्कूलों में भी इसका प्रशिक्षण आम तौर पर इसलिए नहीं दिया जाता था कि बच्चे चोट न खा जाएं। बहरहाल, मैं जब अवकाश के दिनों में घर आता तो घर के नौकर जयराम को हल चलाते देखता। सुबह के नाश्ते में रोटी और अचार लेकर उसे देने जाना पड़ता था। एक दिन मैंने उससे कहा भाई जयराम हमें हल चलाना सिखा दो। जयराम बहुत डर गया कि कहीं कुछ हो गया तो उसे बहुत फटकार पड़ेगी। मेरे बहुत समझाने पर वह मान गया और मुझे हल चलाना सिखाया। स्कूल में कृषि का प्रैक्टिकल हुआ करता था। इत्तेफाक से परीक्षक ने हम सभी छात्रों से यही सवाल पूछ लिया कि आप लोग हल चलाना जानते हैं? सभी छात्र खामोश हो गये। मैंने कहा हां, हल चलाना जानता हूं। परीक्षक ने कहा चलाकर दिखाओ और मैंने खेत में हल चलाया तो सबसे ज्यादा नम्बर मुझे ही प्रैक्टिकल में मिले थे। इस प्रकार जय राम मेरा गुरू बन गया क्योंकि उसने मुझे हल चलाना सिखाया।
इस घटना का उल्लेख मैंने इस लिए किया कि गुरु के बारे में कोई भ्रम न पालें और यह न समझें कि कंठी-माला थमाने वाला ही गुरु होता है। गुरू के चरण कमलों की धूल का महत्व इसीलिए कहा गया है। इसे प्रतीक रूप में समझना होगा। यह आशीर्वाद है जैसे जयराम के आशीर्वाद से ही
मुझे कृषि की प्रयोगात्मक परीक्षा में सबसे ज्यादा नम्बर मिले। इसी तरह यदि कोई अपने माता-पिता या
अन्य अभिभावक से सीखी बातों को अपना लेते हैं तो उसे संसार की समस्याओं से लड़ने की शक्ति मिल जाती है। यही आशीर्वाद रूपी गुरू के चरण की धूल संजीवनी बूटी की तरह सांसारिक रोगों का विनाश करती है। इतना ही नहीं –
सुकृति संभु तन विमल विभूती, मंजुल मंगल मोद प्रसूती।
जन मनमंजु मुकुर मल हरनी, किएं तिलक गुनगनबस करनी।।
अर्थात गुरु के चरण कमलों की वही रज अर्थात धूल सुकृति अर्थात अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देती है और पुण्यवान पुरुष बनाती है। इस
धूल का महत्व भगवान शिव के तन पर सुशोभित भस्म (राख) के समान है। यह धूल सुन्दर, कल्याण और आनंद की जननी (माता) है अर्थात कल्याण करती है और आनंद प्रदान करती है। इस रज का मस्तक पर तिलक करने से समस्त गुण आपके वश में हो जाते हैं। भगवान शिव चिता की भस्म का लेपन करते हैं। चिता की भस्म को लोग छूना भी पसंद नहीं करते लेकिन भगवान शिव पर जब वह अर्पित हो जाती है तो उसे मस्तक पर लगाया जाता है। वही धूल वंदनीय हो जाती है।
श्री गुर पद नख मनिगन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू, बड़े भाग उर आवइ जासू।।
उधरहि विमल विलोचन ही के, मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
सूझहि राम चरित मनिमानिक, गुपुत प्रगट जहं जो जेहि खानिक।।
गोस्वामी तुलसीदास ने गुरू की महिमा बताते हुए आगे कहा कि श्री गुरू महाराज के चरण नखों अर्थात नखूनों की ज्त्योति मणियों की तरह प्रकाशमान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अंधकार का विनाश करता है, जिसके हृदय में इस तरह का प्रकाश आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं। उसके हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रि के दोष और दुख मिट जाते हैं एवं श्री राम चरित्र रूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहां जो जिस खान में हैं, सब दिखाई पड़ने लगते हैं। ये इस तरह होता है कि जैसे-
जथा सुअंजन अंजि दृग,
साधक सिद्ध सुजान
कौतुक देखत सैलवन भूतल भूरि निधान।।
अर्थात गुरू के ज्ञान रूपी अंजन (नेत्रों में काजल की तरह लगाया जाने वाला एक पदार्थ) को नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और अच्छी जानकारी रखने वाले पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर भरा आश्चर्य देख लेते हैं। ये सब गुरु की कृपा से ही संभव है।-क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



