लेखक की कलम

उद्धव ठाकरे को फिर झटका

राजनीति में परिस्थितियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इनको जिसने समझ लिया, उसके लिए सफलता के दरवाजे खुल जाते हैं और जो समझ नहीं पाता अथवा जानबूझकर नजरंदाज करता है, उसके सामने मुश्किलों पर मुश्किलें आती रहती हैं। आज से लगभग 12 साल पहले भाजपा ने परिस्थितियों को अच्छी तरह समझा और आलोचना की परवाह न करते हुए भी वरिष्ठों को किनारे करके नरेन्द्र मोदी जैसे युवा नेता को आगे लाया गया। इसका नतीजा आज सभी लोग देख रहे हैं। केन्द्र में लगातार तीन बार सरकार बनी और बीस से ज्यादा राज्यों में भी भाजपा के हाथ मंे सत्ता है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में कभी सबसे ताकतवर समझी जाने वाली शिवसेना के वारिस उद्धव ठाकरे 2020 में परिस्थितियों को ठीक से नहीं समझ पाये। वे किसी तरह मुख्यमंत्री तो बन गये थे लेकिन शिवसेना की विचारधारा से मेल न खाने वाली कांग्रेस का साथ उसे बहुत महंगा पड़ा। पहले एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों को बगावत कराकर भाजपा के साथ सरकार बना ली और अब साथी लगातार साथ छोड़ रहे हैं। सभी का आरोप यही है कि शिवसेना अपने लक्ष्य से भटक गयी है। अभी हाल ही शिसेना के प्रवक्ता आनंद दुबे ने उद्धव का साथ छोड़ दिया। वह कहते हैं कि हम सीजेपी (काकरोच जनता पार्टी) के साथ नहीं रह सकते। आनंद दुबे कहते हैं कि शिवसेना के आदर्श में सरजील इमाम, उमर खालिद और ध्रुव राठी शामिल नहीं हो सकते। उद्धव ठाकरे को आनंद दुबे की इस दलील पर गौर करना ही होगा क्योंकि बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना का तेवर ही उसे बेताज बादशाह बनाये हुए था।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के राष्ट्रीय प्रवक्ता आनंद दुबे ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपनी प्राथमिक सदस्यता और प्रवक्ता पद, दोनों से खुद को पूरी तरह अलग करने का ऐलान किया है। अपने इस्तीफे में उन्होंने वैचारिक मतभेदों और पार्टी के भीतर लंबे समय से महसूस की जा रही घुटन को मुख्य कारण बताया है।
आनंद दुबे ने साफ किया कि उनका यह फैसला अचानक या रातों-रात नहीं लिया गया है। उन्होंने कहा, पिछले चार-पांच सालों से मैंने महाराष्ट्र से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पार्टी का मजबूती से पक्ष रखा। लेकिन क्या बदला? पिछले कई महीनों से मैं गहरी पीड़ा में था और खामोशी से अंदर ही अंदर घुट रहा था। दुबे ने कहा कि वे पार्टी के मंच से अपने हिंदुत्व और सनातन धर्म के आदर्शों को स्वतंत्र रूप से जाहिर करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे। उन्होंने अपनी विचारधारा को साफ करते हुए कहा, हर पार्टी की अपनी एक विचारधारा होती है। मैं वीर सावरकर और स्वामी विवेकानंद के आदर्शों पर चलने वाला कार्यकर्ता हूं। मैं छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज को अपना आदर्श मानता हूं। पार्टी की तरफ से मुझे जो लाइन बोलने के लिए दी जाती है, वह मुझे सही नहीं लगती। दुबे ने कुछ नामों का जिक्र करते हुए पार्टी की मौजूदा वैचारिक दिशा पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने कहा, मेरे हीरो शर्जील इमाम, उमर खालिद या ध्रुव राठी नहीं हैं. मेरे हीरो स्मित मच्छार हैं वह व्यक्ति जिसने केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को बजरंगबली की असीम शक्ति दिखाई। इसके बावजूद, हमारी पार्टी की ओर से उनके समर्थन में एक ट्वीट तक नहीं किया गया।
उद्धव ठाकरे की पार्टी के प्रवक्ता और हिंदी भाषी चेहरा आनंद दुबे ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और राष्ट्रीय प्रवक्ता के पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि वह पिछले कई महीनों से अंदर ही अंदर परेशान थे और भारी मन से यह फैसला लिया है। आनंद दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग और एसआईआर को लेकर शिवसेना यूबीटी ने जो रुख अपनाया है, वह उससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह सीजेपी के साथ काम नहीं कर सकते। दुबे ने कहा कि सरजील इमाम, उमर खालिद और ध्रुव राठी उनके आदर्श नहीं हैं। उनके आदर्श शिवाजी महाराज और वीर सावरकर हैं। उन्होंने कहा, जिस ट्रेन में कॉकरोच हो, मैं उस ट्रेन में सफर नहीं करूंगा। आनंद दुबे ने कहा कि जब उन्हें उचित प्लेटफॉर्म मिलेगा, तब वह उस पार्टी को जॉइन करेंगे। उनके इस्तीफे को महाराष्ट्र में एमवीए गठबंधन के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है। एक तरफ गठबंधन में एकजुटता की बात कही जा रही है, वहीं आनंद दुबे ने कहा कि देश के मुद्दे पर मतभेद और असहमति हो सकती है, लेकिन राष्ट्र सबसे ऊपर होना चाहिए।
जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत के कारण शिवसेना में ऐतिहासिक विभाजन हुआ था, जिससे पार्टी दो मुख्य गुटों में बंट गई। बगावत की शुरुआत जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के कई विधायकों के साथ बगावत की और सूरत तथा गुवाहाटी चले गए इस बगावत के चलते उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर गई और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, भारत निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को असली शिवसेना नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न सौंपा। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) या शिवसेना (यूबीटी) नाम मिला, और उनका चुनाव चिन्ह मशाल तय हुआ।
महाविकास अघाड़ी का जन्म एक असाधारण राजनीतिक समझौते से हुआ। हिंदुत्व और मराठी अस्मिता पर बनी शिवसेना ने कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाई। यह गठबंधन लगभग ढाई वर्ष चला, कोविड महामारी जैसी असाधारण चुनौती से गुजरा और अंततः शिवसेना के अपने विधायक दल के बड़े विद्रोह से गिरा। विद्रोह अचानक दिखाई दिया, लेकिन उसकी राजनीतिक, वैचारिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि पहले से बन रही थी।
भाजपा के साथ मुख्यमंत्री पद पर सहमति न बनने के बाद शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने महाविकास अघाड़ी बनाई। साझा न्यूनतम कार्यक्रम ने वैचारिक मतभेदों को पीछे रखकर किसानों की ऋण-माफी, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और राज्य के विकास को शासन का सार्वजनिक आधार बनाया। उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
यह शिवसेना के इतिहास में दोहरा परिवर्तन था। पहली बार ठाकरे परिवार का कोई सदस्य संवैधानिक पद पर आया और पहली बार पार्टी ने भाजपा-विरोधी राष्ट्रीय दलों के साथ दीर्घकालीन सत्ता-साझेदारी स्वीकार की। गठबंधन समर्थकों ने इसे महाराष्ट्र-केंद्रित व्यावहारिक व्यवस्था कहा। भाजपा और शिवसेना के भीतर आलोचकों ने इसे चुनाव-पूर्व वैचारिक जनादेश से विचलन बताया। मुख्यमंत्री पद शिवसेना के पास था, लेकिन गठबंधन की वास्तविक शक्ति तीन नेतृत्व-केंद्रों में बँटी थी। एनसीपी प्रमुख शरद पवार गठबंधन के प्रमुख राजनीतिक संयोजक बनेय अजित पवार को उपमुख्यमंत्री तथा वित्त विभाग मिला। यह संरचना सरकार चलाने के लिए आवश्यक थी, पर शिवसेना विधायकों के लिए नई प्रतिस्पर्धा भी लाई।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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