‘सम्राट’ ने कहा है तो सच ही होगा!

राजनीति में कभी भी, कुछ भी हो सकता है। अभी 2 दिन पहले ही पश्चिम बंगाल मंे होने जा रहे उपचुनाव मंे ममता बनर्जी की नंदीग्राम में प्रत्याशी ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। समय-समय की बात है। इसलिए बिहार मंे मुख्यमंत्री सम्राट चैधरी कहते हैं कि नीतीश कुमार पर कोई दबाव नहीं था। उन्होंने मुख्यमंत्री पद खुद ही छोड़ दिया था। ‘सम्राट’ कहते है तो यह सच ही होगा लेकिन मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठकर उसे छोड़ना कोई नहीं चाहता। सम्राट चैधरी की पार्टी में ही मध्य प्रदेश, कर्नाटक और दिल्ली में इसके उदाहरण मौजूद हैं। बिहार मंे ही लालू यादव ने इसी डर से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को जेल जाते समय मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी और तमिलनाडु में जयललिता ने ऐसे विश्वासपात्र को अपनी अनुपस्थिति मंे सीएम की कुर्सी पर बैठाया था जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जयललिता की तस्वीर रखकर राजकाज चलाता था। इसलिए विश्वास नहीं होता कि नीतीश कुमार ने अपनी मर्जी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी थी लेकिन सम्राट चैधरी कहते हैं तो मान लेते हैं।
नीतीश कुमार ने क्या बिहार के चीफ मिनिस्टर का पद भाजपा के दबाव में छोड़ा था? इस सवाल का जवाब बिहार में उनकी जगह लेने वाले सम्राट चैधरी ने खुद दिया है। उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने अपनी इच्छा से सीएम पद से इस्तीफा दिया था। उन्हें ऐसा करने के लिए कहा नहीं गया था और न ही उन
पर ऐसा कोई दबाव था। उन्होंने
पटना में एक मीडिया इवेंट में यह भी कहा कि नीतीश कुमार भले ही अब राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन अब भी वह बिहार एनडीए के नेता हैं और इस बात को लेकर किसी तरह का विवाद नहीं है।
सम्राट चैधरी ने कहा, नीतीश कुमार ने अपनी शर्तों से सीएम का पद छोड़ा था। हमने उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा था। यही नहीं वह यह भी मानते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी ने ही उन्हें पहली बार सीएम बनने का मौका दिया था, जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या उनसे अधिक थी। अब उसी तरह का भाव नीतीश कुमार ने जताया है। सम्राट चैधरी ने कहा कि वर्ष 2000 में जब पहली बार नीतीश कुमार सीएम बने थे तो किसी को बहुमत नहीं मिला था। तब भाजपा ने समर्थन दिया और नीतीश कुमार सीएम बने थे। तब उनकी समता पार्टी होती थी, लेकिन बहुमत साबित न हो पाने के चलते यह सरकार एक सप्ताह तक ही चल सकी। उन्होंने कहा कि भाजपा ने नीतीश कुमार का हमेशा समर्थन किया है और वह भी हमेशा साथ रहे। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार का आशीर्वाद तो लालू यादव की आरजेडी को भी मिला था। उन्होंने कहा कि लालू यादव यदि बिहार का सीएम बने तो इसके लिए भी उन्हें भाजपा का आभारी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि तब दलित नेता राम सुंदर दास काफी मजबूत थे और उनकी जगह पर लालू यादव नेता बने थे। बता दें कि 1990 में लालू प्रसाद यादव जनता दल में थे, तब जनता दल की सरकार को भाजपा का ही बाहर से समर्थन मिला था। इससे पहले 1970 में राम सुंदर दास भी कुछ समय के लिए सीएम रहे थे। उन्हें प्राइम मिनिस्टर वीपी सिंह का समर्थन हासिल था। वह भी रेस में थे, लेकिन लालू यादव को मौका मिला था।
जनता दल के विधायकों की मीटिंग में नेता चुना जाना था। लालू प्रसाद यादव के मुकाबले करीबी अंतर से राम सुंदर दास हार गए थे। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऊंची जाति के विधायकों ने लालू यादव का समर्थन कर दिया था। इसके अलावा रघुनाथ झा अहम थे और उनकी लॉबिंग से ही लालू को चांस मिला था। बता दें कि सम्राट चैधरी भी एक समय में आरजेडी में थे और उन्हें राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बनने का चांस मिला था। वह तब सीएम बनी थीं, जब लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के केस में जेल जाना पड़ा था।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना को वर्ष 1996 में ?जैन हवाला कांड में नाम आने के कारण अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। साल 1991 में हवाला कारोबारियों (जैन बंधुओं) के यहां छापेमारी के दौरान एक डायरी मिली थी, जिसमें कई राजनेताओं के नाम थे। इस डायरी में मदनलाल खुराना पर कथित तौर पर 3 लाख रुपये लेने का आरोप लगाया गया था। फरवरी 1996 में जब सीबीआई इस मामले में चार्जशीट दाखिल करने वाली थी, तब पार्टी के उच्च नेतृत्व के निर्देश पर मदनलाल खुराना ने नैतिक आधार पर 26 फरवरी 1996 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में वर्ष 1997 के अंत तक अदालत ने हवाला मामले में मदनलाल खुराना को बरी कर दिया और उन पर लगे आरोप खारिज हो गए लेकिन इस इस्तीफे के बाद वे दोबारा दिल्ली की सत्ता में नहीं लौट सके। वर्ष 1993 में पार्टी ने 70 में से 49 सीटें जीतकर पहली बार पूर्ण विधानसभा चुनाव जीता था। मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने लेकिन हवाला स्कैम में नाम आने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
खुराना को दिल्ली की गद्दी संभाले 2 साल से अधिक का समय हो चुका था। इस बीच जैन हवाला डायरी कांड को लेकर देशभर में खूब चर्चा थी। इस हवाला स्कैम में दिल्ली के सीएम रहे मदन लाल खुराना का भी नाम आया। जैन बंधुओं से जुड़े 65 करोड़ के हवाला घोटाले में बीजेपी नेता का नाम आने के बाद उनपर दबाव बढ़ने लगा था। सुरेंद्र जैन की डायरी में मदन लाल खुराना का नाम आया था। खुराना पर कथित रूप से 1989 में हवाला कारोबारी जैन बंधुओं से 3 लाख रुपये लेने का आरोप लगा। इसके बाद उन्होंने 2 साल 86 दिन के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
सत्ता में यह पहली बार हुआ था कि इस तरह से किसी सीएम को पद छोड़ना पड़ा हो। 1996 में सीबीआई ने खुराना के खिलाफ हवाला कांड में चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, बाद में खुराना इस मामले में अदालत से बरी हो गए। स्पेशल जज वीबी गुप्ता ने बीजेपी नेता को पैसे लेने के आरोप से बरी कर दिया। प्रथम दृष्टया उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले। 1993 में जब दिल्ली में फिर विधानसभा बहाल की गई तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने मदनलाल खुराना की अगुआई में चुनाव लड़ा और प्रचंड जीत हासिल की। इस तरह बीजेपी दिल्ली में पहली बार अपनी सरकार बनाने में सफल रही। बीजेपी ने 70 सीटों वाली विधानसभा में 49 सीटें हासिल की थीं जबकि कांग्रेस महज 14 सीटों पर सिमट गई थी। जाहिर सी बात है कि मदनलाल खुराना उस समय मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी की पहली पसंद थे। उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली लेकिन खुराना के इस्तीफा देने और बरी होने के बीच यमुना में बहुत पानी बह चुका था। साहिब सिंह वर्मा दिल्ली के सीएम बने तो कुर्सी से चिपक गये थे।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



