अनुकरणीय डा. द्वारिकानाथ कोटनीस

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने गत 29 सितम्बर को कहा ेिक देश भर मंे निजी अस्पताल मरीजों की सेवा के बजाए मुनाफा कमाने वाले उद्योग की तरह काम कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र की मोदी सरकार से इस पर गौर करने को कहा है। धरती पर मरीजों के लिए भगवान कहे जाने वाले डाक्टर्स के बारे मंे इस तरह की जब खबरें मिलती हैं तब डा. द्वारकानाथ शांताराम कोटनीस की याद आती है। डा. कोटनीस एक महन भारतीय चिकित्सक थे जो द्वितीय चीन-जापान युद्ध के दौरान 1938 मंे घायलों की मदद में भारत से चीन भेजे गये थे। उस समय चीन की हालत बहुत डांवाडोल थी। डा. कोटनीस ने चीन मंे मरीजों, घायल सैनिकों की जिस तरह निष्ठा और त्याग से सेवा की, उसके चलते आज भी चीन की जनता उनको भगवान की तरह नमन करती है।
साल 1938 में जापान ने चीन पर धावा बोल दिया था। लाखों चीनी नागरिक और सैनिक लहूलुहान पड़े थे। मगर इलाज करने वाले डॉक्टर उंगलियों पर गिनने लायक भी नहीं थे। ऐसे में चीन के सेनापति जनरल झू दे ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक खत लिखा- दोस्त, हमारी मदद करो, कुछ डॉक्टर भेजो। नेहरू ने इस पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मशविरा किया, जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे।
नेताजी ने तुरंत पहल की और भारत के लोगों से पाई-पाई जोड़कर 22,000 रुपये का फंड इकट्ठा किया। फिर क्या था, पांच जाबांज हिंदुस्तानी डॉक्टरों की एक टीम समंदर के रास्ते चीन के लिए रवाना हो गई। इन पांच डॉक्टरों में महाराष्ट्र के सोलापुर का एक 28 साल का नौजवान भी शामिल था। नाम था डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस। अपने फर्ज को लेकर इस लड़के का जुनून कुछ ऐसा था कि जब वो पानी के जहाज से चीन जा रहे थे, तो 16 दिनों के उस सफर में ही उन्होंने सहयात्रियों से चीनी भाषा सीखनी शुरू कर दी। ताकि वहां जाकर मरीजों की बात समझने में कोई दिक्कत न हो। चीन गए तो पांच डॉक्टर थे, लेकिन जब जंग खत्म हुई तो लौटे सिर्फ चार। डॉक्टर कोटनीस वहीं रुक गए। उन्होंने वहां हजारों दम तोड़ते चीनी लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला। इसी बीच भारत से खबर आई कि उनके पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया है। कोई और होता तो घर भाग आता, लेकिन कोटनीस नहीं लौटे। उन्होंने रोते हुए भी यही कहा कि इस वक्त चीन के इन बेबस मरीजों को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है और मरीजों को बीच में छोड़ना एक डॉक्टर के ईमान के खिलाफ है। कोटनीस सीधे जंग के मैदान में कूद पड़े। पहाड़ों की कड़कड़ाती ठंड और पत्थरों की गुफाओं में, जहां बुनियादी दवाइयां तक नसीब नहीं थीं, उन्होंने एक के बाद एक कई ऑपरेशन किए। कई-कई बार तो वो लगातार 72-72 घंटे बिना पलक झपकाए मरीजों की जान बचाते रहे। इस अकेले मोर्चे
पर उन्होंने करीब 800 चीनी सैनिकों
की जान बचाई। चीनी लोग उन्हें
आदर से के दिहुआ पुकारने लगे, इसका मतलब था भारत की भूमि से आया हुआ उपकारी।
सेवा के दौरान उनकी मुलाकात गुओ किंगलान नाम की एक चीनी नर्स से हुई। दोनों को एक-दूसरे से प्यार हुआ और दिसंबर 1941 में उन्होंने शादी कर ली। उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने रखा- यिनहुआ यिन का मतलब था भारत और हुआ का मतलब चीन। दोनों देशों के प्यार को उन्होंने अपने बेटे के नाम में पिरो दिया था। लगातार बिना सोए काम करना, खराब मौसम और कम साधनों के बीच दिन-रात मरीजों की सेवा करने का असर डॉक्टर कोटनीस की सेहत पर पड़ने लगा। उनका शरीर थक चुका था। दिसंबर 1942 में, अपने बेटे के जन्म के महज तीन महीने बाद, सिर्फ 32 साल की उम्र में इस मसीहा ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। उनकी मौत की खबर से पूरा चीन सदमे में डूब गया। खुद माओ त्से तुंग ने बेहद भावुक होकर लिखा- आज चीन ने अपना एक अनमोल दोस्त खो दिया है। हम उनके इस बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे। उनका नाम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा। मगर यह कहानी यहां खत्म नहीं होती। चीन के सबसे बड़े नेता माओ त्से तुंग ने खुद अपने हाथों से उनके सम्मान में शोक संदेश लिखा था। उन्होंने कहा था- हमारी सेना ने अपना एक मजबूत हाथ खो दिया है और हमारे देश ने अपना सबसे सच्चा दोस्त गंवा दिया है।
इनकी जिंदगी पर फिल्म बनी भी थी। साल 1946 में मशहूर फिल्मकार वी. शांताराम ने डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी नाम से एक शानदार फिल्म बनाई थी, जिसमें उन्होंने खुद डॉक्टर कोटनीस का मुख्य किरदार निभाया था। यह फिल्म साल 1947 में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वेनिस फिल्म फेस्टिवल के कॉम्पिटिशन सेक्शन में भी दिखाई गई थी। आज भी चीन के शीजियाझुआंग शहर में उनकी एक भव्य समाधि और स्मारक है। उनके नाम पर वहां एक मेडिकल स्कूल चलाया जाता है। आज भी जब उस मेडिकल स्कूल के छात्र डॉक्टर बनकर निकलते हैं, तो वे डॉक्टर कोटनीस के नाम की शपथ लेते हैं।
साल 2009 में जब चीन में वोटिंग हुई, तो वहां की जनता ने डॉक्टर कोटनीस को सदी के टॉप 10 विदेशी नायकों में चुना। दशकों तक तो यह परंपरा ही बन गई थी कि चीन का कोई भी बड़ा नेता जब भी भारत के दौरे पर आता, तो डॉक्टर कोटनीस के परिवार से मिलने उनके घर जरूर जाता था। डॉक्टर कोटनीस को किसी सरहद या नक्शे से प्यार नहीं था, उन्हें तो बस इंसानों की जान बचाने से सरोकार था। सचमुच, इंसानी जज्बे की ऐसी मिसालें हर सदी में पैदा होनी चाहिए।
भारत में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक कई ऐसे अनुकरणीय चिकित्सक हुए हैं जिन्होंने न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया, बल्कि अपने सेवाभाव, समर्पण और क्रांतिकारी खोजों से भावी पीढ़ियों के लिए एक महान मिसाल कायम की।
प्राचीन भारत के चिकित्सा अग्रणी महर्षि सुश्रुत थे। इन्हें प्लास्टिक सर्जरी का जनक और भारतीय चिकित्सा का पितामह माना जाता है। ईसा पूर्व चैथी शताब्दी में उन्होंने जटिल शल्य चिकित्सा और मोतियाबिंद के इलाज की पद्धतियों को विकसित किया था। इसी प्रकार महर्षि चरक आयुर्वेद के प्रमुख स्तंभ और चरक संहिता के रचयिता। उन्होंने पाचन, चयापचय और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर गहन शोध किया था।
आधुनिक भारत के चिकित्सा मार्गदर्शकों मंे डॉ. बिधान चंद्र राय का नाम आता है। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और महात्मा गांधी के निजी चिकित्सक थे। चिकित्सा के क्षेत्र में उनके महान योगदान के सम्मान में ही भारत में हर साल 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है। उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था।
इसी क्रम में डॉ. आनंदीबाई गोपालराव जोशी हैं। वह भारत की पहली महिला डॉक्टर थीं। 19वीं सदी में सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर उन्होंने अमेरिका से मेडिकल की डिग्री हासिल की और देश की लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं।
समकालीन युग के आधुनिक डॉक्टर और सर्जन में डॉ. नरेश त्रेहन का नाम है। विश्व प्रसिद्ध कार्डियोवास्कुलर और कार्डियोथोरेसिक सर्जन। वे मेदांता के संस्थापक हैं और उन्होंने भारत में न्यूनतम आक्रामक हृदय शल्य चिकित्सा की शुरुआत कर हजारों जीवन बचाए हैं।
डॉ. देवी प्रसाद शेट्टी प्रसिद्ध कार्डियक सर्जन और नारायण हेल्थ के संस्थापक। वे बेहद कम लागत पर गरीबों के लिए विश्वस्तरीय हृदय सर्जरी उपलब्ध कराने और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के माध्यम से चिकित्सा को सुलभ बनाने के लिए जाने जाते हैं। डॉ. सौम्या स्वामीनाथन एक विख्यात बाल रोग विशेषज्ञ और नैदानिक शोधकर्ता हैं। उन्होंने तपेदिक (टीवी) और एचआईवी पर महत्वपूर्ण शोध किए और वे विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक भी रह चुकी हैं।
ये सभी डॉक्टर अपने असाधारण ज्ञान, मानवीय दृष्टिकोण और समाज के प्रति अटूट निष्ठा के कारण चिकित्सा जगत में अनुकरणीय और पूजनीय माने जाते हैं।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



