लेखक की कलम

फार्म-6 पर सुप्रीम आश्चर्य

इन दिनों कई कारणों से भारत का मुख्य निर्वाचन आयोग चर्चा में है। विपक्षी दल बहुत पहले से आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग केन्द्र सरकार की कठपुतली बन गया है। कांगे्रस समेत विपक्षी दलों ने 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के लिए जबर्दस्त प्रदर्शन किया। यह विवाद मतदाता सूची के गहर परीक्षण (एसआईआर) को लेकर प्रारम्भ हुआ और कई राज्यों में जब करोड़ों की संख्या मंे लोग मतदाता सूची से बाहर कर दिये गये हैं तब इसमें नई कड़ियों भी जुड़ने लगी हैं। इनमें दो सहायक आयुक्तों की 16 फैसलों पर असहमति, महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी की चुनाव आयोग की चिट्ठी विशेष रूप से शामिल है। अब एक नया मामला सुप्रीम कोर्ट ने जोड़ दिया है। बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित फार्म-6 मंे संशोधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि उसके सामने ऐसा कोई प्रारूप आया ही नहीं, तब सुप्रीम कोर्ट की सहमति का सवाल कहां से उठा है। चुनाव आयोग ने 26 सितम्बर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी का संकेत दिया था कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से संबंधित मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अदालत ने फार्म-6 के नये घोषणा पत्र को बरकरार रखा था। इस सुप्रीम आश्चर्य ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की परेशानी और बढ़ा दी है। फार्म-6 में किये गये बदलाव पहले से विवाद के घेरे में हैं। दोनों सहायक आयुक्तों ने भी इन बदलावों का विरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि जब रिकार्ड हमारे सामने आए, तभी हम देखेंगे कि बदलाव किसने किये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से इनकार किया है लेकिन केन्द्र सरकार समेत सभी को तलब जरूर किया है। उधर, विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लड़ाई की एक महीने की रणनीति बना ली है। अभिजीत दिपके भी सीजेपी भी साथ दे रही है।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 5 अक्टूबर को स्पष्ट किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे फॉर्म-6 के किसी भी संशोधित प्रारूप को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अभियोजन की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि हमने ऐसे किसी भी फॉर्म को अप्रूव नहीं किया है। यह स्पष्ट कर दें। जब रिकॉर्ड हमारे सामने आएगा तो हम देखना चाहेंगे कि इसमें बदलाव किसने किया। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दावा किया गया था कि कुछ राज्यों में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान ऑनलाइन फॉर्म-6 के साथ लगाए गए नए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी प्राप्त है। नए फॉर्म-6 में किए गए बदलाव पहले से विवाद का विषय हैं। सामने आया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने इन बदलावों पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन किए बिना ये बदलाव नहीं किए जा सकते। बाद में ये रिपोर्ट सामने आई कि चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद नया घोषणा-पत्र लागू कर दिया गया। इसके बाद चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर संकेत दिया था कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अदालत ने फॉर्म-6 के नए घोषणा-पत्र को बरकरार रखा था।
हालांकि, बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के सामने नए फॉर्म-6 के घोषणा-पत्र की जांच का अवसर ही नहीं आया था, क्योंकि नया प्रारूप फैसला आने के बाद लागू किया गया था। नए घोषणा-पत्र में नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने वाले व्यक्ति को यह बताना होगा कि क्या वह स्वयं या उसके माता-पिता पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूची से जुड़े या चिन्हित किए गए थे। पहले इस्तेमाल किए गए फॉर्म-6 में ऐसी जानकारी नहीं मांगी जाती थी।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी से कहा कि याचिका में की गई प्रार्थनाएं व्यापक और “उलझी हुई” प्रतीत होती हैं। उन्होंने कहा कि वह याचिका में की गई प्रार्थनाओं पर कायम हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया और इसे चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देने वाले एक समान मामले के साथ जोड़ दिया।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा है कि चुनाव आयोग के फैसलों में अगर सर्वसम्मति नहीं थी तो इस पर रोक लगाई जाए। सीजेआई ने कहा कि चुनाव आयोग को लेकर अखबार की रिपोर्ट 100 प्रतिशत सही, आंशिक रूप से सही या पूरी तरह गलत हो सकती है। आज केवल उस रिपोर्ट के आधार पर अदालत कोई आदेश पारित नहीं कर सकती। कोर्ट चुनाव आयोग का जवाब जानना चाहेगी। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि हम चुनाव आयोग से जवाब मांगेंगे। हमें पुख्ता सूचना चाहिए। हम नोटिस जारी करेंगे। सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसलों का परीक्षण करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा अगर ये पाया जाता है कि फैसले न तो सर्वसम्मति से लिए गए थे और न ही बहुमत से, तो उन पर रोक लगा सकते हैं। हालांकि, अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि वह एकतरफा रूप से यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकती कि सभी फैसले अकेले लिए गए थे। सीजेआई ने कहा कि अदालत को यह प्रमाणित जानकारी चाहिए कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति से लिये गए थे या बहुमत के आधार पर। हम घोड़े के आगे गाड़ी नहीं रख सकते। सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार किया। सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार मामले पर कहा है कि चुनाव आयोग को इस मामले में नोटिस जारी होगा, न्यूज रिपोर्ट के आधार पर आदेश नहीं दिया जाएगा, चुनाव आयोग के फैसलों का निरीक्षण किया जाएगा और सुप्रीम कोर्ट को पुख्ता सबूत चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को अभियोजन से मिली कानूनी छूट की वैधता की जांच करने पर सहमति जताई है। अदालत उन आरोपों की भी जांच करेगी कि ज्ञानेश कुमार चुनावों के संचालन से जुड़े फैसले कथित तौर पर एकतरफा तरीके से ले रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह और वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं। राकेश कुमार सिंह की पैरवी करते हुए विकास सिंह ने जनप्रतिनिधित्व कानून के मूल स्वरूप और 1993 में किए गए बदलाव यानी धारा 10 (2) और (3) का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने चयन समिति में चीफ जस्टिस को शामिल कर संतुलन बनाने की बात की थी, लेकिन सरकार ने कानून में संशोधन कर सीजेआई को बाहर कर दिया और उनकी जगह प्रधानमंत्री के मनोनीत मंत्री को शामिल किया गया। विकास सिंह ने कोर्ट में कहा कि देश का हर नागरिक डरा हुआ है। मौजूदा स्थिति से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता प्रभावित हो रही है। सुप्रीम कोर्ट इसको लेकर कुछ अंतरिम आदेश जारी करे।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button