छत्तीसगढ़ के ‘दशरथ माझियों’ को सलाम

हमारे देश को अब विकसित राष्ट्र बनने से कोई रोक नहीं सकता। हम यह बात किसी सरकार के भरोसे नहीं कह रहे हैं। हमंे यह विश्वास दिलाया है नक्सलवाद से त्रस्त रहे छत्तीसगढ़ के उन दशरथ माझियों ने, जिनके संगठन और साहस की चर्चा आज पूरे देश में हो रही है। बिहार के दशरथ माझी ने पहाड़ काटकर अकेले दम पर सड़क बना दी थी लेकिन छत्तीसगढ़ के जिले कांकेर मंे कई दशरथ माझियों ने मिलकर पहाड़ों के बीच से सड़क बना ली। यहां के पुसाझर गांव मंे सरकार ने पक्के मकान तो मंजूर कर दिये लेकिन आने-जाने का सुगम रास्ता नहीं था। पुसाझर छोटा सा गांव है और यहां के लोगों ने श्रमदान करके कच्चा रास्ता तैयार कर दिया है। कांकेर एक नक्सल प्रभावित जिला रहा है। यहां सड़कों का न बनना दुर्भाग्यपूर्ण है। कांकेर के कलेक्टर कुंदन कुमार यह स्वीकार करते हैं कि क्षेत्र के कई ऐसे गांव हैं जहां विकास की बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को यह मामला गंभीरता से लेना पड़ेगा।
छत्तीसगढ़ में सालों तक जिन रास्तों पर बारूद की गंध और नक्सलियों का खौफ था, आज वहां लोग सिस्टम की नाकामी के शिकार हो रहे हैं। ये दास्तां है छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित रहे जिले कांकेर की। यहां के पुसाझर गांव में सरकार ने पक्के मकान तो मंजूर कर दिए लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सड़क देना भूल गई। नतीजा ये हुआ कि गांव वालों ने खुद ही अपनी जमा पूंजी इकट्ठा की और पहाड़ को काटकर रास्ता बना दिया। इसके लिए पूरे गांव ने श्रमदान किया
और कड़ी मेहनत के बाद गांव तक आने के लिए कच्चा रास्ता तैयार कर दिया। ये सब इसलिए ताकि पक्के घर का सपना पूरा हो सके। बताया जा रहा है कि कच्ची सड़क बनाने
के बाद गांव वाले खुद ही मीलों दूर से ईंट, सीमेंट और सरिया अलग-अलग साधनों से ले आए। जिससे गांव में अब एक पक्का घर तैयार हो गया है।
सालों से उपेक्षा झेल रहे ग्रामीणों के सब्र का बांध जब टूट गया, तो उन्होंने आपस में बैठक की। गांव के हर परिवार ने अपनी गाढ़ी कमाई से जमा पूंजी इकट्ठा की और पूरा गांव श्रमदान के लिए निकल पड़ा। पुरुष, महिलाएं और युवा सभी एक साथ पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में जुट गए। ग्रामीणों के पक्के इरादों के आगे आखिर पहाड़ को भी झुकना पड़ा और कड़ी मेहनत के बाद गांव तक पहुंचने का एक कच्चा रास्ता बनकर तैयार हो गया। दरअसल प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सरकार ने इस गांव के कुछ परिवारों के लिए पक्के मकान स्वीकृत तो कर दिए थे, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। ग्रामीणों द्वारा तैयार किया गया कच्चा रास्ता इतना संकरा और दुर्गम था कि कोई भी ट्रैक्टर या निर्माण सामग्री ढोने वाला बड़ा वाहन गांव तक नहीं पहुंच पा रहा था। मुख्य बाजार बीढ़ापाल यहां से पूरे 13 किलोमीटर दूर था। लेकिन ग्रामीणों ने हार नहीं मानी। उन्होंने अलग-अलग साधनों का जुगाड़ किया और सिर तथा पीठ पर सीमेंट की बोरियां, सरिया और रेत लादकर पहाड़ों के रास्ते चढ़ना शुरू किया। ग्रामीणों की यह तपस्या आखिरकार रंग लाई। मीलों दूर से बेहद कठिन रास्तों से होते हुए निर्माण सामग्री गांव तक पहुंचाई गई। गांव वालों ने खुद ही नींव खोदी, खुद ही मसाला तैयार किया और आपसी सहयोग से अब गांव में एक खूबसूरत पक्का घर बनकर तैयार हो गया है। यह पक्का घर सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह इन ग्रामीणों के स्वाभिमान, अटूट हौसले और आपसी एकता का जीता-जागता प्रतीक है। देखा जाए तो पुसाझर गांव के लोगों के लिए यह रास्ता केवल घर बनाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह उनकी जिंदगी की लाइफलाइन है। सड़क के अभाव में पहले बीमार लोगों को अस्पताल ले जाना एक बड़ी चुनौती थी, और बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना भी बेहद मुश्किल था। ग्रामीणों ने अपनी तरफ से एक रास्ता तो तैयार कर दिया है, लेकिन अब भी उनकी मांग है कि सरकार और प्रशासन इस कच्चे रास्ते को चैड़ी और पक्की सड़क में तब्दील करे, ताकि गांव के बाकी लोगों का भी जीवन आसान हो सके।
कांकेर के कलेक्टर कुंदन कुमार ने बेहद ईमानदारी से स्वीकार किया कि क्षेत्र में कई ऐसे अंदरूनी गांव हैं जहां अब तक विकास की बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं। कलेक्टर ने बताया कि यह इलाका लंबे समय तक घोर नक्सलवाद से प्रभावित रहा था, जिसके चलते विकास के काम बुरी तरह बाधित हुए थे। लेकिन अब चूंकि नक्सलवाद का प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है, इसलिए प्रशासन प्राथमिकता के आधार पर ऐसे सभी सुदूर गांवों का चरणबद्ध तरीके से विकास करने और वहां तक पक्की सड़क पहुंचाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है।
इससे दशरथ माझी की कहानी याद आती है। प्यार तो सब करते हैं लेकिन कोई-कोई ही ऐसा होता है जिनका प्यार इतिहास बन जाता है। ऐसा ही प्यार था एक मजदूर का अपनी पत्नी के लिए जिसने एक छेनी-हथौड़े की मदद से पहाड़ को काटकर उसके बीच रास्ता बना दिया। ये प्यार की अनोखी दास्तां है, एक मामूली से मजदूर दशरथ मांझी की, जिसने अपने हाथों से उस पहाड़ का सीना चीर कर रख दिया जो उसकी मोहब्बत की राह में आ खड़ा हुआ था और जिसकी वजह से उनकी प्रियतमा की मौत हो गई थी। उसी दिन उन्होंने संकल्प लिया कि इस कठोर पहाड़ को काटकर इसके बीच आने-जाने का रास्ता बना देंगे कि फिर भविष्य में किसी प्यार करने वाले को एक-दूसरे से बिछड़ना ना पड़े।बिहार के गया जिले में 1934 में जन्मे दशरथ मांझी की शादी बचपन में ही हो गई थी लेकिन दशरथ मांझी की मोहब्बत तब परवान चढ़ी जब वो 22 साल की उम्र में यानी 1956 में धनबाद की कोयला खान में काम करने के बाद अपने गांव वापस लौटे और गांव की एक लड़की से उन्हें मोहब्बत हो गई। किस्मत देखिए ये वही लड़की थी जिससे दशरथ मांझी की शादी हुई थी। दशरथ मांझी ने ये पहाड़ तोड़ने का फैसला अपनी उसी मोहब्बत यानी फाल्गुनी के लिए किया था।दशरथ मांझी अपनी पत्नी फाल्गुनी के साथ गेहलौर में रहते थे। वे अपनी पत्नी से अथाह प्रेम करते थे। उन दोनों की जिंदगी की गाड़ी गरीबी में भी काफी अच्छे से चल रही थी। दशरथ खेतों में काम करते, मजदूरी करते और फाल्गुनी उनके लिए खाना लेकर रोज जाती थीं।
गेहलौर के लोगों को जरूरी सामान लेने के लिए वजीरपुर जाना पड़ता था जो गेहलौर घाटी को पार कर जाना पड़ता था इसके लिए लोगों को 80 किलोमीटर का लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। फाल्गुनी भी किसी काम से गेहलौर घाटी का दुर्गम रास्ता पारकर वजीरपुर जा रही थीं कि अचानक उनका पैर फिसल गया और वे गिर गईं। दशरथ की आंखों के सामने गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक्त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



