अध्यात्म

गणेश जी को क्यों कहते हैं विकट और विघ्नराज

इससे पहले हमने गणेश भगवान जी के लम्बोदर नाम के बारे में विस्तार से बताया था। आज हम आपको गणेश जी के विकट स्वरूप का स्तुति मंत्र उसका अर्थ और उसके पीछे की कहानी को बतायेंगे। विकट भगवान का स्तुति मंत्र ये है-
विकटो नाम विख्यातः कामासुरविदाहृकः।
मयूरवाहनश्चायं सौरब्रह्मधारः स्मृतः।।
भगवान श्री गणेश का विकट नामक प्रसिद्ध अवतार कामासुर का संहारक है, विकट भगवान का वाहन मोर होता है और ये सूर्य ब्रह्म के धाारक हैं।
कहते हैं, भगवान विष्णु जब जालन्धर का वध करने के लिये वृन्दा का तप नष्ट करने गये थे, उसी समय शुक्र से अत्यन्त तेजस्वी कामासुर नामक राक्षस पैदा हुआ था। कामासुर दैत्य गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा लेकर तपस्या के लिए वन में गया। वहाँ उसने पंचाक्षरी मन्त्र का जप करते हुये कठोर तपस्या प्रारम्भ की। भगवान शिव की तपस्या के लिये उसने अन्न, जल छोड़कर कठिन तप किया। उसकी तपस्या से भगवान शिव अत्यधिक प्रसन्न हुये। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कामासुर से वर मांगने के लिये कहा। वह भगवान शिव के चरणों में गिर पड़ा। उसने शिव जी से ब्रह्माण्ड का राज्य तथा मृत्युजयी होने का आशीर्वाद मांगा। भगवान शिव ने कहा-यद्यपि तुमने अत्यन्त दुर्लभ, देवताओं को दुःख देने वाली याचना की है लेकिन मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ। कामासुर प्रसन्न होकर अपने गुरु शुक्राचार्य के पास लौट आया। शुक्राचार्य ने प्रसन्न होकर महिषासुर की रूपवती पुत्री तृष्णा के साथ उसका विवाह कर दिया। उसी समय समस्त दैत्यों के सामने कामासुर को दैत्यों का राजा बना दिया। सभी दैत्य उसके अधीन रहने लगे।
कामासुर ने अत्यन्त सुन्दर रतिद नामक नगर में अपनी राजधानी बनाई। उसने रावण, शम्बर, महिष बलि तथा दुर्मद को सेना का प्रधान बनाया। महा असुर ने पृथ्वी के समस्त राजाओं पर आक्रमण करके उन्हें जीत लिया। फिर उसने स्वर्ग पर चढ़ाई शुरू कर दी। उसके असीम पराक्रम के आगे इन्द्रादि देवता भी नहीं ठहर सके। सभी उसके अधीन हो गये। धर्म-कर्म नष्ट होने लगे जिसके परिणाम स्वरूप ऋषि-मुनि दुःखी हो गये।
इसके बाद ऋषि मुद्गल की प्रेरणा पाकर सारे देवता और मुनिगण मयूरेश क्षेत्र में पहुंचकर गणेश जी की आराधना करने लगे। देवताओं की आराधना से मयूर के वाहन वाले भगवान विकट प्रकट हुये। उन्होंने देवताओं से वर मांगने के लिए कहा। तब देवताओं ने अपने कष्ट बताये कि उन्हें कामासुर ने परेशान कर रखा है। हमारी उससे रक्षा करें। विकट भगवान ‘तथास्तु’ कहकर अन्र्तध्यान हो गये। उन्होंने देवताओं के साथ कामासुर के नगर को घेर लिया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अन्त में गणेश भगवान ने कामासुर को अपनी शरण में आने के लिए कहा। इस युद्ध में कामासुर के दोनों पुत्रों शोषण और दुष्पूर मारे गये। भगवान विकट ने कामासुर से कहा कि अगर तुम अपनी रक्षा चाहते हो तो देवताओं को परेशान करना छोड़ दो। मेरी शरण में आ जाओ। अन्यथा तुम्हारा जीवन सम्भव नहीं है। कामासुर क्रोधित हो गया और उसने भगवान विकट पर अपनी गदा फेंक दी। वह गदा भगवान को स्पर्ष किये बिना ही पृथ्वी पर गिर गई। कामासुर मूर्छित हो गया। उसकी सारी ताकत खत्म हो गई। वह समझ गया कि जब इस देवता ने बिना शस्त्र ही मेरी यह हालत कर दी है तो शस्त्र उठायेंगे तो क्या होगा वह भगवान विकट की शरण में आ गया। विकट भगवान ने उसे क्षमा कर दिया। देवता और ऋषि-मुनि भय मुक्त हो गये।
गणेश को क्यों कहते हैं विघ्नराज
इससे पहले हमने आपको गणेश जी के विकट नाम के बारे में विस्तार से बताया था। आज हम भगवान गणेश के विघ्नराज स्वरूप, स्तुति मंत्र उसके अर्थ और पीछे की कहानी को बतायेंगे। भगवान विघ्नराज का स्तुति मंत्र ये है-
विघ्न राजावतारश्च शेषवाहन उच्यते।
ममतासुर हन्ता स विष्णुब्रह्मोति वाचकः।।
भगवान श्री गणेश का ‘विघ्नराज’ अवतार विष्णु ब्रह्म का रूप है। उसका वाहन शेषनाग है तथा वह ममतासुर का संहारक है।
एक बार की बात है। भगवती पार्वती अपनी-अपनी सखियों से बात करते हुये हंस रही थीं। कहते हैं उनके हास्य से एक पुरुष का जन्म हुआ। वह देखते ही देखते पर्वताकार हो गया। पार्वती जी ने उसका नाम ममतासुर रखा। उन्होंने उससे कहा कि तुम जाकर गणेश का स्मरण करो इससे तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। पार्वती जी ने गणेश जी का षउक्षर (वक्रतुण्जय हुम्) मन्त्र प्रदान किया। ममतासुर माँ के चरणों में प्रणाम करके वह वन को चला गया। वहाँ उसकी शम्बरासुर से मुलाकात हुई। उसने ममतासुर को सारी विधाएँ सिखा दीं। इन विधाओं के अभ्यास से उसे अनेक आसुरी शक्ति प्राप्त हो गई। शम्बरासुर ने ममतासुर को विघ्नराज भगवान की उपासना करने के लिये कहा। वह वहीं बैठकर कठोर तप करने लगा। वह हवा में रहकर विघ्नराज का ध्यान करने लगा। इस प्रकार तपस्या करते हुए उसे हजारों साल बीत गये। फिर उसकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान गणेश प्रकट हुये। ममतासुर ने विघ्नराज भगवान के चरणों में प्रणाम किया और उनकी पूजा करने लगा। विघ्नराज ने उससे वर मांगने के लिए कहा। उसने कहा कि यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज सौंप दें। युद्ध में मुझे कभी कोई बाधा न आये तथा भगवान शिव के लिये भी मैं अजेय रहूँ। गणेश भगवान ने कहा कि तुमने दुःसाहस करके कठिन वर की याचना की है। फिर भी मैं उसे पूरा करूँगा।
वर प्राप्ति के बाद ममतासुर पहले शम्बर के घर गया। शम्बर ने अपनी रूपवती पुत्री मोहिनी का विवाह ममतासुर से करा दिया। यह समाचार जब शुक्राचार्य को मिला तो उन्होंने धूमधाम से ममतासुर को दैत्यों का राजा बना दिया।
एक दिन ममतासुर ने शुक्राचार्य से विश्वविजय की इच्छा प्रकट की। शुक्राचार्य ने कहा कि हे राजन तुम दिग्विजयी हो लेकिन कभी विघ्नेश्वर का विरोध मत करना। भगवान विघ्नराज की कृपा से ही तुम्हें ये शक्ति मिली है।
इसके बाद ममतासुर ने पृथ्वी और पाताल लोक भी जीत लिया। इसके बाद स्वर्ग पर भी आक्रमण कर दिया। इन्द्र से ममतासुर का भयंकर युद्ध हुआ लेकिन राक्षसों के समक्ष देवगण नहीं टिक सके। स्वर्ग भी ममतासुर के
अधीन हो गया। युद्ध क्षेत्र में उसने भगवान विष्णु और शिव को भी
पराजित कर दिया। अब वह स्वर्ग पर राज्य करने लगा। देवता भी बंदी हो गये और धर्माचरण करने वाला कोई नहीं रहा।
परेशान होकर सभी देवताओं ने कष्ट निवारण के लिए विघ्नराज भगवान की पूजा की। एक वर्ष की कठोर तपस्या के बाद भगवान विघ्नराज प्रकट हुए। देवताओं ने उनसे ममतासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने का आग्रह किया। भगवान विघ्नराज ने नारद को ममतासुर के पास भेजा। नारद ने उससे कहा कि तुम अधर्म और अत्याचार को समाप्त करके विघ्नराज की शरण में जाओ। अन्यथा तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है। लेकिन उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ममतासुर के आचरण से क्रोधित होकर विघ्नराज ने अपना कमल असुर सेना के बीच में छोड़ दिया। उसकी गन्ध से समस्त असुर मूर्छित हो गए। तब ममतासुर कांपता हुआ विघ्नराज के चरणों में गिर पड़ा। उसने उनसे क्षमा-याचना की और उनकी स्तुति करने लगे। विघ्नराज ने ममतासुर को पाताल लोक भेज दिया। देवगण प्रसन्न हो गये।

(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

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