अध्यात्म

धनतेरस पर घर लाएं 15 वस्तुएं

खरीदारी का शुभ समय

लखनऊ के स्थानीय पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह 10.31 बजे से 7 नवंबर को सुबह 10.48 बजे तक रहेगी।
शुभ चैघड़िया-सुबह 11.50 से दोपहर 1.12 बजे तक।
चल चैघड़िया-दोपहर 3.58 से शाम 5.20 बजे तक।
लाभ चैघड़िया- रात 8.35 से 10.13 बजे तक।
माँ लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर पूजन मुहूर्त- शुक्रवार, 6 नवंबर को शाम 5.51 बजे से
7.44 बजे तक लखनऊ में धनतेरस पूजन का विशेष मुहूर्त रहेगा। यह प्रदोष काल और वृषभ लग्न का समय है। इसी अवधि में श्रद्धापूर्वक लक्ष्मी-कुबेर पूजन करना शुभ माना जाता है।
दीपावली के पंचदिवसीय महापर्व का शुभारंभ धनतेरस से होता है। सनातन परंपरा में धनतेरस को धन, आरोग्य और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इस वर्ष धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन धन की देवी माँ लक्ष्मी के साथ भगवान धन्वंतरि और धन के अधिपति कुबेर की पूजा का विशेष महत्व है।
सिर्फ सोना-चाँदी नहीं, इन 15 वस्तुओं का भी है विशेष महत्व
धनतेरस पर खरीदारी को लेकर लोगों में विशेष उत्साह रहता है। सामान्यतः सोना, चाँदी, पीतल, तांबा और नए बर्तन खरीदने की परंपरा है। इसके साथ ही कुछ ऐसी पारंपरिक पूजन सामग्री भी है, जिन्हें माँ लक्ष्मी की कृपा, शुभता और समृद्धि का प्रतीक मानकर घर लाया जाता है।
कौड़ी: माँ लक्ष्मी से जुड़ा प्रतीक है। पीली कौड़ी को परंपरागत रूप से माँ लक्ष्मी और धन-संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। इसे लक्ष्मी पूजन में शामिल किया जाता है।
गोमती चक्र: शुभता और संरक्षण का प्रतीक है गोमती चक्र को धार्मिक मान्यताओं में अत्यंत शुभ माना गया है। इसे पूजा स्थल अथवा लक्ष्मी पूजन में रखा जाता है।
साबुत धनिया: धन वृद्धि की पारंपरिक मान्यता है धनतेरस पर साबुत धनिया खरीदकर माँ लक्ष्मी को अर्पित करने की परंपरा है। दीपावली पूजन के बाद इसे शुभता के प्रतीक के रूप में सुरक्षित रखा जाता है।
नमक: स्वच्छता और शुभता है। धनतेरस पर नमक खरीदने की भी लोकपरंपरा प्रचलित है। इसे घर की स्वच्छता और सकारात्मक वातावरण से जोड़ा जाता है।
झाड़ू: स्वच्छता का प्रतीक है। झाड़ू को माँ लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि स्वच्छ घर में ही सुख-समृद्धि का वास होता है।
लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा: दीपावली पूजन के लिए नई लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा खरीदना शुभ माना जाता है। माँ लक्ष्मी धन और भगवान गणेश बुद्धि एवं विघ्नों के निवारण के प्रतीक हैं।
गुंजा: पारंपरिक धार्मिक सामग्री है। गुंजा के बीजों का पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं में विशेष स्थान है। इन्हें पूजा एवं धार्मिक संग्रह में रखा जाता है।
कमलगट्टा: लक्ष्मी उपासना का विशेष आधार है कमलगट्टा माँ लक्ष्मी की पूजा में विशेष महत्व रखता है। कमलगट्टे की माला से श्रीलक्ष्मी मंत्रों का जाप करने की परंपरा है।
हल्दी: मंगल और पवित्रता का प्रतीक है। साबुत हल्दी को पूजा में शामिल करना शुभ माना जाता है। इसका संबंध मांगलिक कार्यों और समृद्धि से है।
पीली सरसों: पारंपरिक धार्मिक उपाय है। पीली सरसों का उपयोग दीपावली के अवसर पर विभिन्न पारंपरिक पूजा-विधियों और धार्मिक उपायों में किया जाता है।
शंख: माँ लक्ष्मी का प्रिय प्रतीक है। शंख को पूजा स्थल में रखना शुभ माना जाता है। शंखनाद को पवित्रता और सकारात्मक वातावरण से जोड़ा जाता है।
चाँदी का सिक्का: ऐश्वर्य का प्रतीकरू चाँदी के सिक्के पर लक्ष्मी या गणेश का स्वरूप हो तो उसे दीपावली पूजन में शामिल किया जा सकता है।
पीतल या तांबे के बर्तन: धातुओं की खरीदारी धनतेरस की प्राचीन परंपरा है। अपनी आवश्यकता के अनुसार धातु के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।
दीपक: अंधकार से प्रकाश की ओररू मिट्टी के दीपक खरीदकर धनतेरस से दीपावली तक घर और पूजा स्थल को प्रकाशित करना चाहिए।
सुपारी और अक्षत: सुपारी को मंगल कार्यों में गणेश स्वरूप तथा अक्षत को पूर्णता एवं समर्पण का प्रतीक मानकर पूजा में शामिल किया जाता है।
यम दीपदान को न भूलें
धनतेरस की संध्या को घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यमदेव के निमित्त दीपदान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यम दीपदान परिवार की मंगलकामना और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति की प्रार्थना के लिए किया जाता है।
धनतेरस का वास्तविक संदेश केवल खरीदारी तक सीमित नहीं है। भगवान धन्वंतरि हमें आरोग्य का महत्व समझाते हैं, माँ लक्ष्मी परिश्रम और समृद्धि का संदेश देती हैं तथा भगवान कुबेर धन के सदुपयोग की प्रेरणा देते हैं। इसलिए इस पर्व पर घर की स्वच्छता, पूजा-पाठ, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता का भी संकल्प लेना चाहिए। धनतेरस पर खरीदी गई वस्तुओं को श्रद्धा और शुभ संकल्प के साथ पूजा में शामिल करें। किसी भी वस्तु की खरीदारी को निश्चित धनलाभ की गारंटी न मानें, बल्कि इसे अपनी सनातन परंपरा और आस्था से जोड़कर देखें। (ज्योतिषाचार्य पं. पुनीत दुबे-हिफी फीचर)

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