
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की कथा पवित्र नदी के समान है जिसमें स्नान करने से असीम पुण्य प्राप्त होता है। लोगों का विश्वास है कि ऐसी नदियों में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता है। पहले नदी के किनारे ही लोग रहते थे। बड़ी-बड़ी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं। आज भी नदियों से नहरें निकाल कर खेतों की सिंचाई की जाती है। नदियों पर बांध बनाकर बिजली पैदा की जाती है। इस प्रकार नदियां इहलोक और परलोक दोनों को संवारती हैं।
मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कविता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि रघुनाथ प्रभु राम की यह कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है। कलियुग वर्तमान का युग माना जाता है। लोग कहते हैं कि हम तो कोई पाप नहीं करते लेकिन सच्चे मन से विचार करें तो सभी से पाप होते ही रहते हैं। कभी हम झूठ बोलते हैं। कभी हम चोरी करते हैं तो कभी किसी का मन दुखाते हैं। शायद ही कोई व्यक्ति हो जो यह काम न करता हो, भले ही उसे अदालत से सजा नहीं मिलती। आत्ममंथन करें तो यह महसूस होगा कि हमने यह गलत काम किया है। कर्मचारी अपने कर्तव्य में ढिलाई बरतते हैं तो मालिक उनके परिश्रम की भरपूर कीमत नहीं देते। व्यापारी मुनाफा कमाने के लिए नकली माल बेचते हैं। कलियुग के पापों का वर्णन करने में बड़ा सा ग्रंथ तैयार हो जाएगा लेकिन राम कथा का श्रवण करते समय कुछ देर के लिए ही सही पाप कर्मों से मन हट जाता है। इसलिए राम कथा कलियुग के पापों को हरने वाली कही गयी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मेरी इस कूर (भद्दी) कविता रूपी नदी की चाल (गति) पवित्र जलवाली नदी (गंगा जी) की चाल की भांति टेढ़ी है। प्रभु श्री राम के सुन्दर यश रूपी साथ से यह कविता सुन्दर तथा सज्जनों के मन को अच्छी लगने वाली हो जाएगी। ठीक उसी प्रकार से जैसे श्मशान (मरघट) की अपवित्र राख भी श्री महादेव जी के शरीर पर लेपन के बाद सुहावनी लगती है। शिव लिंग पर लेपित मसान की राख को लोग न सिर्फ मस्तक पर लगाते हैं बल्कि प्रसाद के रूप में खाते भी हैं। इसलिए
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति रामजस संग।
दारु विचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग।
श्री राम जी के यश के संग से मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्रिय लगेगी जैसे मलय पर्वत के संग से लकड़ी मात्र चंदन वंदनीय हो जाता है। चंदन को घिसकर मस्तक पर लगाया जाता है, कोई भी उसे लकड़ी समझ तुच्छ (व्यर्थ) नहीं कहता है। इसी प्रकार
स्याम सुरभि पय विसद अति गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।
श्यामा (काली) गाय होने पर भी उसका दुग्ध उज्ज्वल (सफेद) और बहुत गुणकारी होता है, यही समझ कर सब लोग उसे पीते हैं। इसलिए गंवारू भाषा में होने पर भी श्री सीताराम जी के यश को बुद्धिमान लोग बड़े चाव से सुनते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास किसी वस्तु की उपयोगिता के बारे में बताते हुए कहते हैं-
मनिमानिक मुकुता छबि जैसी, अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।
नृप किराट तरुनी तनु पाई, लहहि सकल सोभा
अधिकाई।
तैसेहिं सुकवि कबित बुध कहहीं, उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।
भगति हेतु विधि भवन बिहाई, सुमिरत सारद आवति धाई।
अर्थात् माणि, माणिक और मोती की जैसी सुन्दर छबि है, वह सांप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती है जैसी राजा के मुकुट और नवयुवती के शरीर पर अच्छी लगती है। इसी तरह बुद्धिमान लोग कहते हैं कि अच्छे कवि (सुकवि) की कविता भी उत्पन्न कहीं और होती है और शोभा दूसरी जगह पाती हैं, यह कविता वहां शोभा पाती है जहां उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्श का ग्रहण और अनुसरण होता है। कवि के स्मरण करते ही उसकी भक्ति के कारण सरस्वती जी, जिन्हें वाक्देवी कहा जाता है और माना जाता है कि हमारी वाणी उन्हीं सरस्वती माता की देन है। इसीलिए किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम से पहले मां सरस्वती की पूजा-वंदना की जाती है। मां सरस्वती कवि की भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्म लोक से दौड़ती हुई आती हैं तो हम सभी यह जानते हें कि जो दौड़कर आया है, उसे थकान भी लगेगी। यह भी हम जानते हैं कि थकान लगने पर स्नान करने से राहत मिलती है। इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि-
रामचरित सर बिनु अन्हवाएं, सो श्रम जाइ न कोटि उपाएं।
कवि कोबिद अस हृदय विचारी, गावहि हरिजस कलिमल हारी।
सरस्वती जी की वह थकावट रामचरित रूपी सरोवर (तालाब) में नहलाये बिना दूर नहीं हो सकती, भले ही करोड़ों उपाय कर डालिए। कवि और पंडित (विद्वान) ऐसा विचार कर कलियुग के पापों को हरने वाले भगवान विष्णु के यश का गान करते हैं।
कीन्हें प्राकृत जनगुन गाना, सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।
हृदय सिंधु मति सीप समाना, स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।
संसारी मनुष्यों (प्राकृत जन) का गुणगान करने से सरस्वती जी सिर
धुनकर पछताने लगती हैं। गोस्वामी तुलसीदास का चाटुकारिता पर यह प्रहार हैं। मौजूदा समय में यह बहुत ज्यादा होने लगा है। नेताओं के नाम पर चालीसा लिखे जाते हैं, उनकी मूर्तियां स्थापित की जाती हैं लेकिन ऐसा करने वालों को लम्बे समय तक कोई याद नहीं रखता और न विद्वानों में उनका शुमार किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि बुद्धिमान लोग हृदय को समुद्र और बुद्धि को सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान समझते हैं इसमें यदि श्रेष्ठ विचार रूपी जल बरसता है तो मुक्ता मणि (मोती) के समान सुन्दर कविता होती है- जौं बरषइ बर बरि विचारू, होहिं कबित मुकुतामनि चारू। -क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



