
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की यह कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के दोषों को दूर करने वाली है। इस कथा से अथाह ज्ञान प्राप्त होता है। गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं कहा कि कविता के अनेक गुण होते हैं लेकिन मुझे किसी का ज्ञान नहीं है। इसके बावजूद रामचरित मानस को एक आदर्श प्रबंध काव्य की संज्ञा दी गयी। इसमें रस, अलंकार
आदि का प्रसंग के अनुसार उत्कृष्ट प्रयोग भी किया गया है। इसे जो
समझते हैं वे आनंद प्राप्त करते हैं
और जो नहीं समझ पाते, वे उपहास उड़ाते हैं।
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।
हंसहिं बक दादुर चातकही, हँसहिं मलिन खल विमल बतकही।
कवित रसिकन राम पद नेहू, तिन्ह कहं सुखद हास रस एहू।
भाषा भनिति भोरि मति मोरी, हंसिबे जोग हंसे नहि खोरी।
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी, तिन्हहि कथा सुनि लागिह फीकी।
हरिहर पद रति मति न कुतरकी, तिन्ह कहंु मधुर कथा रघुवर की।
अर्थात तुलसीदास जी कहते हैं कि दुष्टों के हंसने से मेरा हित ही होगा।
मधुर कंठवाली कोयल को कौये तो कठोर ही कहा करते हैं जैसे बगुले हंस को और मेढक पपीहे को हंसते हैं, वैसे ही मलिन मन वाले दुष्ट निर्मल वाणी को अच्छा नहीं बताते, उसकी हंसी उड़ाते हैं। कौये और कोयल के बारे में कहा जाता है कि कोयल अपने बच्चे को कौये के घोषले में छोड़ देती है। प्रारंभ में कौये और कोयल के बच्चे में कोई अंतर नहीं लगता। कौआ कोयल के बच्चों को भी अपना बच्चा समझकर पालता है लेकिन बाद में जब कोयल का बच्चा बड़ा होता है तो उड़कर कोयल के पास चला जाता है। इसीलिए कोयल को कौआ कठोर कहता है। एक कवि ने लिखा भी है
पला सब दिन कोकिल का वंश, काक के कुल का पाकर प्यार।
आज तक कोकिल कुल संभूत, कर सका कौन काक-उपकार।
इसी प्रकार चातक (पपीहा) के बारे में कहा जाता है कि वह सिर्फ स्वाति नक्षत्र में बरसने वाले पानी को पीता है। पपीहा स्वाति नक्षत्र की याद में पी कहां-पी कहां करता रहता है। मेढक पानी में रहता है और उसकी इस तपस्या का मजाक उड़ाता है। पपीहे को साहित्य में उच्च स्थान दिया गया है। मेढक को गंदा जीव (मलिन) की इसीलिए संज्ञा दी गयी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जो न कविता के रसिक (प्रेमी) हैं और न जिनका श्री रामचन्द्र जी के चरणों में प्रेम है उनके लिए भी यह कविता सुखद हास्य रस का काम देगी। रामचरित मानस में कई हास्य रस के प्रसंग हैं जैसे नारद मोह और परशुराम-लक्ष्मण संवाद। मानस का रचयिता कहता है कि प्रथम तो यह भाषा (अवधी हिन्दी) की रचना है और दूसरे मेरी बुद्धि भोली है इसलिए कोई हंसता है तो इसमें उसका कोई दोष नहीं है। प्रभु राम के चरणों में जिनका प्रेम नहीं है और न अच्छी समझ है, उनको यह कथा सुनने में फीकी लगेगी लेकिन जिनको श्री हरि अर्थात भगवान बिष्णु और श्री हर अर्थात भगवान शिव के चरणों में प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करने वाली नहीं है, उनको श्री रघुनाथ जी की यह कथा मीठी लगेगी। यहां पर गोस्वामी तुलसीदास ने वैष्णव और शैव सम्प्रदाय के मध्य वैमनस्य की तरफ भी इशारा किया है।
शैव और वैष्णव धर्म के अनुयायी उस समय एक-दूसरे की कटु आलोचना किया करते थे। एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय की निंदा करता था। वर्तमान में यह समस्या तो गंभीर बनती जा रही है। इस्लाम धर्म के नाम पर तो आतंकवादी संगठन खड़े हो गये हैं जो दुनिया भर में हिंसक वारदाते कर रहे हैं। इस प्रकार की समस्या नहीं होनी चाहिए इसके लिए गोस्वामी तुलसीदास ने लगभग पांच सौ साल पहले ही सचेत किया था। रामचरित मानस की प्रासंगिकता इसीलिए आज भी बनी हुई है। तुलसीदास जी कहते हैं कि सज्जन गण इस कथा को अपने जी में श्रीराम जी की भक्ति से भूषित जानकर सुन्दर वाणी से सराहना करते हुए सुनेंगे। उन्होंने कहा कि मैं न कवि हूं न वाक्य रचना में कुशल हूं, मैं तो सब कलाओं और सब विधाओं से रहित हूं-
रामभगति भूषित जियं जानी, सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।
कबि न होउं नहि बचन प्रबीनू, सकल कला सब विद्या हीनू।
इतना ही नहीं-आखर अरथ अलंकृति नाना, छंद प्रबंध अनेक विधाना
भाव भेद रस भेद अपारा, कबित दोष गुन विविध प्रकारा
अर्थात नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक प्रकार की छंद रचना भावों और रसों के अपार भेद और कविता के भांति-भांति के गुण-दोष होते हैं। इनमें से काव्य संबंधी एक भी बात का ज्ञान मुझमें नहीं है यह मैं कोरे कागज पर लिखकर (शपथ पूर्वक) सत्य-सत्य कहता हूं-
कवित विवेक एक नहीं मोरे, सत्य कहउं लिखि कागद कोरे।
गोस्वामी जी कहते हैं-
भनिति मोरि सब गुन रहित, विश्व विदित गुन एक।
सो विचारि सुनिहहिं सुमति, जिन्ह के विमल विवेक।
मेरी यह रचना सब गुणों से रहित है। इसमें बस जगत प्रसिद्ध एक ही गुण है उसे विचार कर अच्छी बुद्धि वाले जिनके निर्मल ज्ञान हैं इसको सुनेंगे।
यहि महं रघुपति नाम उदारा, अतिपावन पुरान श्रुति सारा।
मंगल भवन अमंगल हारी, उमा सहित जेहि जपत पुरारी।
इसमें श्री रघुनाथ जी का उदार नाम है जो अत्यंत पवित्र है वेद-पुराणों का सार है कल्याण का भवन है और अमंगलों को हरने वाला है जिसे पार्वती जी सहित भगवान शिव जी सदा जपा करते हैं।
भनिति विचित्र सुकवि कृत जोऊ, रामनाम बिनु सोह न सोऊ
बिधु बदनी सब भांति संवारी, सोह न बसन बिना बर नारी।
अर्थात जो अच्छे कवियों द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है वह भी राम नाम के बिना शोभा नहीं पाती। ठीक उसी तरह जैसे चन्द्रमा के समान मुख वाली सुन्दर स्त्री सब प्रकार से सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती है।
सब गुन रहित कुकवि क्रत बानी, रामनाम जस अंकित जानी।
सादर कहहिं सुनहि बुध ताही, मधुकर सरिस संत गुनग्राही।
जदपि कवित रस एकउ नाहीं, रामप्रताप प्रगट एहि माहीं।
सोइ भरोस मोरे मन आवा, केहिन सुसंग बड़प्पन पावा।
धूमहु तजइ सहज करु आई अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।
भनिति भदेस वस्तु बहु बरनी, रामकथा जग मंगल करनी।
इसके विपरीत राम नाम का साथ पाकर बुरे कवि की कविता भी सम्मान पाती है। बुद्धिमान लोग उसमें भी भौंरे की तरह रस निकाल लेते हैं। तुलसी दास जी कहते हैं कि मुझे कविता का एक भी रस नहीं पता लेकिन राम की कृपा से इसमें सभी रस मौजूद हैं। भले के साथ से बड़प्पन मिलता है जैसे अगर का साथ पाकर धुंआ भी सुगंधित हो जाता है। इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि यह मेरी यह कविता अवश्य भद्दी है लेकिन इसमें जगत का कल्याण करने वाली राम कथा का वर्णन होने से अच्छी समझी जाएगी। -क्रमशः (हिफी)



