
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान शंकर की वंदना कुछ विशेष कारणों से भी की है। भगवान शिव सर्वत्र और व्यापक हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की काशी (वाराणसी) उनकी विशेष रूप से नगरी मानी जाती है, जहां पर प्रभु आशुतोष बाबा विश्वनाथ के रूप में विराजे हुए हैं। शिव के 14 ज्योतिर्लिंगों में एक काशी विश्वनाथ मंदिर है। इसी काशी मंे महाकवि तुलसीदास ने बड़े संघर्षों के साथ रामचरित मानस की रचना की। यहां पर गोस्वामी तुलसीदास के बारे में भी संक्षिप्त में जान लेना समीचीन होगा। आज की तरह भक्तिकालीन कवि अपनी जीवनी नहीं लिखा करते थे। इसलिए जनश्रुति और काव्य में मिले कुछ प्रमाणों के आधार पर कहा जाता है कि प्रयाग (इलाहाबाद) के पास ही बांदा जिले में राजापुर नामक गांव में आत्माराम दूबे रहते थे। उनकी धर्म पत्नी का नाम हुलसी था। सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में पंडित आत्माराम दूबे के बेटे के रूप में गोस्वामी तुलसीदास का जन्म हुआ था। जनश्रुति है कि अन्य बच्चों की तरह तुलसीदास रोये नहीं बल्कि उनके मुख से राम-राम शब्द निकला। मुख में बत्तीसों दांत मौजूद थे और इस अद्भुत बालक को देखकर पंडित आत्माराम अमंगल की आशंका से भयभीत हो गये। माता हुलसी ने अनिष्ट की आशंका से नवजात शिशु को एक दासी के साथ ससुराल भेज दिया और दूसरे दिन ही हुलसी भी इस संसार को छोड़कर चली गयी। हुलसी ने जिस दासी को तुलसीदास का दायित्व सौंपा था वह दासी भी पांच वर्ष बाद गुजर गयी और तुलसीदास पूरी तरह अनाथ हो गये। वह द्वार-द्वार भटकने लगे। कभी कुछ खाने को मिल जाता तो खा लेते नहीं तो भूखे ही जहां जगह मिलती सो जाते। इस अनाथ बालक को देखकर जगत जननी मां पार्वती को दया आ गयी। बताते हैं मां पार्वती एक ब्राह्मण स्त्री का वेश धारण कर प्रतिदिन बालक तुलसीदास को भोजन कराती थीं।
मां पार्वती की जब कृपा हुई तो भगवान शंकर कैसे पीछे रह सकते थे। भगवान शंकर ने राम शैल पर रहने वाले स्वामी अनंतानंद जी के शिष्य श्री नर हर्यानन्द जी, जिन्हें नरहरिदास भी कहते थे, को पे्रेरणा दी कि बालक तुलसीदास के पास जाओ। बाबा नरहरिदास ही गोस्वामी तुलसीदास के प्रथम गुरू और अभिभावक बन गये। उन्होंने तुलसीदास का नाम राम बोला रखा क्योंकि जन्म लेते ही उनके मुख से राम का शब्द निकला था। स्वामी नरहरि दास गोस्वामी तुलसीदास को अपने साथ अयोध्या ले गये। उस समय हिन्दू सम्प्रदाय में दो-दो धाराएं चल रही थीं। एक थी वैष्णव सम्प्रदाय की
धारा जिसके अनुयायी अपने को भगवान विष्णु का उपासक मानते थे और दूसरी थी शैव सम्प्रदाय की धारा जो अपने को भगवान शंकर का उपासक मानती थी। स्वामी नरहरिदास वैष्णव सम्प्रदाय से थे और उन्होंने बालक रामबोला को राम मंत्र की दीक्षा दी। उनके साथ वैष्णव धर्म के सभी संस्कार किये गये और अयोध्या में ही शिक्षा-दीक्षा
शुरू हुई। तुलसीदास की बुद्धि
बड़ी प्रखर थी और एक बार जो सुन लेते थे, वह उन्हें याद हो जाता था। गोस्वामी तुलसीदास को बचपन में ही सूकर खेत (सोरों) में स्वामी नरहरि दास ने रामचरितमानस की कथा
सुनाई थी-
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकर खेत।
समुझी नहीं तसि बालपन तब अति रहेउं अचेत।
इस प्रकार भगवान शंकर और मां पार्वती का गोस्वामी तुलसीदास पर विशेष स्नेह भी रहा है। वह वैष्णव सम्प्रदाय में पले-बढ़े लेकिन भगवान शिव की कृपा को भी वह कभी नहीं भूले। कुछ हालात भी ऐसे आ गये जब तुलसीदास जी को भगवान शिव और भगवान विष्णु की निकटता स्थापित करने की जरूरत महसूस हुई। बताते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास को अपनी पत्नी से बहुत प्रेम था। एक बार पत्नी मायके गयी तो पीछे-पीछे तुलसी दास भी वहां पहुंच गये। इस पर उनकी पत्नी ने बहुत धिक्कारा और कहा कि ‘हांड़-मांस के इस शरीर में तुम्हारी इतनी आसक्ति है तो इससे आधी भी आसक्ति यदि भगवान में होती तो तुम्हारा बेड़ा पार हो गया होता। तुलसी दास को ये शब्द चुभ गये और वहां से वह सीधे प्रयाग पहुंचे। साधु वेश धारण किया और तीर्थाटन करने लगे। तीर्थाटन करते हुए काशी पहुंचे और राम कथा करने लगे। काशी उन दिनों प्रकाण्ड पंडितों की गढ़ थी और संस्कृत भाषा में ही ज्यादातर लोग बोलते थे। शिव की नगरी में सरल भाषा में राम कथा का वहां के पंडितों ने जबर्दस्त विरोध किया। तुलसीदास का कथा सुनाना तो दूर वहां रहना ही दूभर हो गया। शैव सम्प्रदाय के लोग वैष्णव सम्प्रदाय के एक गंवारू कवि को टिकने ही
नहीं दे रहे थे। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में
भगवान शिव को राम का परमभक्त और भगवान राम को शिव का परम भक्त प्रतिपादित किया। रामचरित मानस में यही दिखाया गया है कि भगवान राम और भगवान शिव में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने भगवान राम के मुख से स्वयं कहलाया है-
जेहिं पर कृपा न करहिं पुरारी।
सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
इस प्रकार गोस्वामी तुलसी दास ने शैव सम्प्रदाय और वैष्णव सम्प्रदाय को रामचरित मानस के माध्यम से एक दूसरे के सन्निकट किया। गोस्वामी जी ने आदि कवि वाल्मीकि और राम के अनन्य भक्त हनुमान जी की भी काव्य रचना से पहले वंदना की है-
सीताराम गुण ग्राम पुण्यारण्य विहारिणौ।
वन्दे बिशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वर कपीश्वरौ।।
अर्थात् श्री सीताराम जी के गुण समूह रूपी पवित्र वन में विहार करने वाले, विशुद्ध विज्ञान सम्पन्न कवीश्वर महर्षि वाल्मीकि जी और कपीश्वर श्री हनुमान जी की मैं वंदना करता हूं। आदिकवि वाल्मीकि ने ही सबसे पहले रामायण की रचना की थी। इसके बाद ही विभिन्न भाषाओं-बोलियों में रामायण की रचना हुई। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने प्रबंध काव्य रामचरितमानस में महर्षि वाल्मीकि की रचना को ही
आधार बनाया। महर्षि वाल्मीकि ने राम को अलौकिक क्षमता वाला राजपुत्र कहा है जबकि तुलसी के राम परमपरमेश्वर हैं। इसी प्रकार हनुमान की वंदना करके गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना में सहायता मांगी। राम और लक्ष्मण के दर्शन भी हनुमान जी की कृपा से ही उनको मिले थे। मानस की रचना में माता सीता का आभार भी उन्होंने माना।
उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम्
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्।।
अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली तथा सम्पूर्ण कल्याणों को करने वाली श्री रामचन्द्र जी की प्रियतमा सीता जी को मैं नमस्कार करता हूं। माता सीता की वन्दना करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम की वंदना की और कहा कि जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रह्मादि देवता और असुर हैं, जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भांति यह सारा दृश्य जगत सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भव सागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र नौका हैं। उन समस्त कारणों से परे (सब कारणों के कारण और सबसे श्रेष्ठ) राम कहे जाने वाले भगवान हरि की मैं वंदना करता हूं। गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अनेक पुराण, वेद और तंत्र-शास्त्र सम्मत विचार रामायण में वर्णित हैं और कुछ अन्यत्र से उपलब्ध विचार, जो प्रभुराम की कृपा से मिले हैं, उन सभी को अपने सुख के लिए तुलसीदास इस मनोहर कथा को कहने का प्रयास कर रहे है। तुलसीदास की तरह ही सभी को
यह कथा सुखद लगे, यही कामना करता हूं। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



