गिरना कोई हार नहीं, ये तो बस एक विराम है

एक दिन आॅफिस जाते समय रेड लाइट में जब गाड़ियाँ रुकीं तो एक अजीब सा दृश्य देखने को मिला जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। एक बहुत छोटा सा बच्चा मेरी गाड़ी के करीब आया और उसने मुझे स्केच पेन का एक पैकेट बढ़ा दिया और मुझसे खरीदने का अनुरोध करने लगा। मुझे जरूरत नहीं थी लेकिन मैंने ले लियां इसी तरह वह सभी गाड़ियों के पास जाता और अपनी बात कहता। कुछ लोगों ने लिया और कुछ लोगों ने मनाकर दिया। जो लोग उससे पेन सेट ले लेते वह खुश होकर थैंक यू अंकल कहकर आगे बढ़ जाता और जो नहीं लेते उनसे भी मुस्कुराकर ठीक है कहकर आगे बढ़ जाता। बच्चा किसी सम्भ्रांत परिवार का लग रहा था। मुझे थोड़ अजीब लगा। इतना छोटा सा बच्चा है ट्रैफिक में आते जाते लोगों के बीच पेन बेच रहा है क्या कारण है तभी उसके पीछे उसकी टीचर दिखाई दीं, मैंने पास बुलाकर पूछा तो उन्होंने बताया कि हम लोग बच्चों को इसी तरह से कुछ काम करवाते है ताकि वे मजबूत बन सकें। बच्चा खुशी-खुशी अपना काम कर रहा था और किसी के न बोलने पर भी उदास नहीं होता था। मैंने पूछा, ‘कब तक करोगे बेटा’ तब उसने कहा, ‘‘जब तक 100 नो न हो जायं। मुझे टारगेट दिया गया है 100 नो का। जब तक 100 नो इकट्ठे नहीं हो जायेंगे मुझे यह काम करना है। उसने जिस आत्मविश्वास से यह बात कही मैं आश्चर्य चकित रह गई। कोई उसे अनदेखा कर देता कोई फोन पर बात करता रहता और कोई नहीं बेटा, नहीं लेना है कहकर दूसरी तरफ देखने लगता लेकिन वो बिलकुल निराश नहीं था। हर ग्राहक की ‘ना’ के बाद वह मुस्कुराता, हल्के से बोलता ठीक है सर और दूसरे व्यक्ति की तरफ बढ़ जाता। उसके चेहरे पर न शर्म थी, न डर और न निराशा। पूरे आत्मविश्वास से भरा हुआ वह अपना टारगेट पूरा करने में लगा था। मेरे चेहरे पर सवाल देखकर बगल में खड़ी हुई टीचर मुस्कुराई और बोली, ‘हमारा मकसद पेन सेट बेचना नहीं है, हमारा उद्देश्य है यह छोटा सा बच्चा इस उम्र से ही ना सुनना और उसे स्वीकार करना सीखे और फिर अगले व्यक्ति से पूछने की हिम्मत रखे।’’ उस टीचर का उत्तर सुनकर मैं लगभग चुप हो गई थी क्योंकि अपने घरों के बच्चों को तो हम कभी हारने के विषय में बात भी करने से मना करते हैं और उन्हें जीवन में संघर्ष करना तो सिखाते ही नहीं हैं। उनकी हर ज़िद पूरी करते हैं, पैसे की कीमत क्या होती है वह कभी समझ ही नहीं पाता। ऐशो आराम की ज़िन्दगी जीते हैं जब तक माता-पिता रहते हैं वह सब देते हैं बच्चों को वही आदत हो जाती है। वे नहीं जानते कि एक-एक पैसा कमाने के लिए, उनके लिये हर सुख-सुविधा जुटाने के लिये उनके पेरेन्टस को कितना परिश्रम करना पड़ता है।
पहली क्लास से लेकर बड़े होने तक स्कूलों और घरों में बस यही बताया जाता है कि खूब पढ़ो, फस्र्ट आओ, काॅम्पिटीशन जीतो, अच्छे काॅलेज में सेलेक्ट हो जाओ तभी तुम सफल कहलाओगे। हम बच्चों को ज़िन्दगी की सच्चाई से कभी रूबरू ही नहीं होने देते। रात-दिन पढ़ाई, कोचिंग और फिर काॅम्पिटीशन जीतने की दौड़ में लगा रहकर वह यह कल्पना भी नहीं करता कि कभी जीवन में मुसीबत भी आ सकती है। हमेशा मिलती हुई जीत ही जीवन का सच नहीं है, कभी हार का सामना भी करना पड़ सकता है। यही वजह कि बच्चे जीवन के तमाम क्षेत्रों में जीत हासिल करने और शिखर पर पहुंचने के बाद भी ज़रा सी प्रतिकूल हवा से टूटकर बिखर जाते हैं। आज के समाज में ऐसा अनेक बार हमने देखा है कि पैसा, सम्मान और सफलता के बाद भी डिप्रेशन हो रहा है और लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं। आईआईटी तक पहुंचने के बाद एक बच्चा आत्महत्या कर लेता है पत्नी या अपनी दोस्त की बेवफाई से परेशान होकर अपना जीवन समाप्त कर ले रहे हैं। ये घटनायें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि अब बहुत हो गई भागदौड़ अब तो समय है ठहरकर विचार करने का कि हम कहां चूक रहे हैं। जीवन में जितना जीतना और सफल होना जरूरी है उससे कहीं ज्यादा जरूरी है हार को संभालना, असफलताओं से मुठभेड़ करना, संघर्ष करना। बच्चों को हारना सिखाना जीवन के महत्वपूर्ण पाठों में से एक है जिसे हम नजरअन्दाज कर देते हैं ऐसे समय में इस एक स्कूल की यह पहल एक नई रोशनी की तरह है, जहां जीवन फूल और काँटों के साथ-साथ चल रहा है। केमेस्ट्री, बायो और फिजिक्स के प्रयोगों के साथ इस तरह की प्रयोगात्मक कक्षायें हर स्कूल में होनी चाहिये, जहां बच्चे स्वयं संघष्क्र्ष करके कुछ अर्जित भी करें और असफलता और हार को सकारात्मक रूप से सम्भालना सीखें। यह उनके व्यक्तित्व निर्माण के लिये बहुत जरूरी है, जीत और सफलता के बाद मिली हार हमारे बच्चों को अपवादग्रस्त बना रही है अतः हार को स्वीकार कर आगे बढ़ना उन्हें अवश्य सिखायें ताकि उनका मानसिक विकास भी हो ओर उनके व्यक्त्वि में एक लचीलापन भी आये ताकि वे हर परिस्थिति के लिये अपने को तैयार कर सकें।
जीवन में हमेशा जीत नहीं मिलती बचपन में मिली छोटी-छोटी हार का सामना करने से बच्चे भविष्य में आने वाली बड़ी असफलताओं और तनाव को भी झेल पाते हैं। जब वे हारते हैं तो उन्हें यह समझने का मौका मिलता है। मौका है कि उनसे कहां चूक हो गई। वे अपनी गलतियों को पहचानते हैं और उन्हें ठीक करते हैं, जिससे उनकी प्राॅबल्म साॅल्विंग स्किल भी बेहतर होती हैं। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि जो बच्चेे खुद अपनी हार का स्वाद चख लेते हैं वह दूसरों के संघर्ष और असफलताओं को भी समझते हैं। वह कभी उनका मजाक उड़ाने की हिम्मत नहीं करते। हार को मैनेज करना हमें जीतने में विनम्र रहना और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना भी सिखाता है।
अक्सर हमने देखा है कि किसी भी खेल या प्रतियोगिता में हार जाने पर बड़े-बड़े लोग भी लड़ने-झगड़ने लगते हैं, वे हार को स्वीकार नहीं कर पाते। हार को स्वीकारना एक बेहतरीन खेल भावना विकसित करता है। अतः बच्चों के साथ खेलते वक्त उन्हें स्वाभाविक रूप से हारने भी दें। हारने पर उनको प्रोत्साहित करें कहें कि तुमने बहुत अच्छा प्रयास किया। यदि बच्चा हारकर दुःखी होकर रोता है तो भी उसे डाँटे नहीं। हारने का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि आप उन्हें आगे बढ़ने से रोक रहे हैं बल्कि इसका मतलब है कि आप उन्हें एक आत्मविश्वासी, खुशहाल और मजबूत इन्सान बना रहे हैं जो जीवन की हार उतार-चढ़ाव का सामना बिना डरे कर सकता है।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



