जननी से भी बड़ी हो गयीं यशोदा मैया

भगवान श्रीकृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के आठवें अवतार हैं जिन्हें हम पूजते हैं। यह वासुदेव और देवकी के पुत्र हैं और इनका जन्म मथुरा कारागार में हुआ था। इनका बचपन वृंदावन में बीता था। इन्होंने संदीपनी मुनि के आश्रम में बलराम के साथ शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत से अद्भुत कार्य किये थे। जैसे इन्होंने कंस का वध किया और द्वारका नगरी बसाई और अर्जुन जो पांडवों के पुत्र थे उनको भगवत गीता का उपदेश दिया। उन्होंने उन्हें कर्म करने और योग करने का उपदेश दिया। आज इसलिये वे भगवान कहलाते हैं और उन्हें पूजा जाता है। माता देवकी और पिता वसुदेव से जन्मे भगवान श्रीकृष्ण का पालन पोषण माता यशोदा और पिता नंद ने किया था।
श्रीकृष्ण ने पांडवों का मार्गदर्शन किया और उनको अपना मित्र मानकर उनको सही राह दिखाई और सभी बुराइयों का अंत किया। श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, शरारत, ज्ञान और कर्म का अद्भुत संगम है जो सभी भक्तों के जीवन जीने की कला सिखाता है। वसुदेव और देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण 8वीं संतान थे। देवकी के भाई कंस थे। कंस एक अत्याचारी राजा था उनसे आकाशवाणी सुनी थी कि देवकी उसकी बहन का 8वां पुत्र जो होगा वो कंस का वध करेगा। इससे भयभीत होकर कंस ने अपनी बहन (देवकी) और जीजा (वसुदेव) को मथुरा के कारागार में डाल दिया था। कंस के डर से वसुदेव ने बालक के पैदा होते ही यमुना पार गोकुल में नंद यशोदा के यहां पहंुचा दिया। गोकुल में उनका लालन-पालन हुआ और यशोदा और नंद उनके माता-पिता बन गये। यशोदा नंद बाबा की पत्नी और रोहिणी की बहन थीं। पिता वसुदेव जी अपने नंद बाबा के चचेरे भाई थे। इसलिए उन्होंने कंस के डर से आकर श्रीकृष्ण के पैदा होते ही उनको नंद बाबा और यशोदा जी को दे दिया। वहां उन्होंने श्रीकृष्ण का पालन-पोषण किया और उनको सभी शिक्षा प्रदान की।
पौराणिक कथाओं के अनुसार मैया यशोदा जी को सबसे ऊपर रखा जाता है क्योंकि यशोदा जी का कृष्ण जी से खून का संबंध न होते हुये भी उन्होंने कृष्ण जी का लालन-पालन बड़े प्रेम से किया। यशोदा ने बलराम के पालन पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जो रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे। एक कथा के अनुसार यशोदा जी ने अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु जी की तपस्या की थी जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्ण के रूप में पुत्र प्राप्त किया था। यह बहुत सौभाग्य की बात है कि उन्हें भगवान कृष्ण पुत्र के रूप में मिले थे। वे वात्सल्य प्रेम और निःस्वार्थ ममता की प्रतिमूर्ति मानी जाती है। उन्होंने ही बाल कृष्ण की ‘माखन चोर’ और उनकी नटखट लीलाओं का आनंद लिया जिससे ईश्वर भी उनके प्रेम में बंध गये।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कलियुग में यशोदा का जन्म वकुला देवी के रूप में हुआ था। वहां उन्होंने वेंकेटेश्वर (कृष्ण का ही रूप) ओर पद्मावती के विवाह को देखा। यशोदा मैया को मां के रूप में सबसे ऊपर रखा जाता है क्योंकि उन्होंने भगवान कृष्ण को जन्म न देते हुये भी उनका पालन-पोषण बहुत ही प्रेम से किया जो एक सगी मां नहीं देती। यशोदा जी का भारत में बहुत महत्व है और इसी कारणवश यशोदा जयंती भगवान कृष्ण की पालक माता, माता यशोदा के निःस्वार्थ प्रेम, ममता और उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। यह फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। यह दिन विशेष रूप से संतान की सुरक्षा, लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिये पूजा-व्रत के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व मातृत्व और वात्सल्य को समर्पित है। यह जयंती इसलिये भी मनायी जाती है कि यशोदा जी ने कंस से उनकी रक्षा की और ममता मई पालन-पोषण किया। इस दिन महिलाएं संतान प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं कि उनको अच्छे संतान की प्राप्ति हो और जिनकी गोद सूनी है उन्हें संतान प्राप्ति का सुख मिले। यह पर्व मां के अटूट प्रेम और वात्सल्य का प्रतीक है।
यशोदा जयंती के दिन श्रद्धालु माता यशोदा और बाल कृष्ण की पूजा कर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। इस वर्ष अर्थात वर्ष 2026 में यशोदा जयंती 7 फरवरी को मनाई जायेगी। यह दिन कृष्ण की दिव्य माता यशोदा को समर्पित है। यह दिन भक्तों को यशोदा के प्रेम और समर्पण को दिखाता है और प्रेरित करता है कि जिस तरह मैया यशोदा ने उन्हें प्रेम दिया। उसी तरह सब अपने संतानों को प्रेम करें। इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं और श्रीकृष्ण जैसे संतान की कामना करते हैं, प्रार्थना करते हैं एवं जप करते हैं।
इस दिन मैया यशोदा को भक्त याद करके उनका स्मरण करते हैं। यशोदा जी का जीवन सांसारिक और दिव्य के बीच का गहरा संबंध है। इस माता यशोदा को याद करके व्यक्ति अपने हृदय में प्रेम, करुणा और निस्वार्थता का भाव विकसित करता है। इस दिन भक्त पूजा की शुरुआत स्नान करने के बाद मैया यशोदा और कृष्ण जी की तस्वीर रखते हैं और फिर उन्हें फूल चढ़ाते हैं, उन्हें अगरबत्ती, दीपक, कुमकुम और प्रसाद अर्पित करते हैं। बेटे के प्रति मां के बात्सल्य की अनगिनत कहानियां मिल जाएंगी लेकिन महाकवि सूरदास ने यशोदा का कृष्ण के प्रति जिस तरह वात्सल्य दिखाया वह अनूठा है उदाहरण के लिये-
हरि पालनैं झुलावै
जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै।
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै।
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै
कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनि पावै
इस पद में सूरदास जी ने भगवान् बालकृष्ण की शयनावस्था का सुंदर चित्रण किया है। वह कहते हैं कि मैया यशोदा श्रीकृष्ण (भगवान् विष्णु) को पालने में झुला रही हैं। कभी तो वह पालने को हल्का-सा हिला देती हैं, कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी मुख चूमने लगती हैं। ऐसा करते हुए वह जो मन में आता है वही गुनगुनाने भी लगती हैं। लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती है। इसीलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं कि अरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहीं? तू शीघ्रता से क्यों नहीं आती? देख, तुझे कान्हा बुलाता है। जब यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी तो पलकें मूंद लेते हैं और कभी होंठों को फड़काते हैं। (यह सामान्य-सी बात है कि जब बालक उनींदा होता है तब उसके मुखमंडल का भाव प्रायरू ऐसा ही होता है जैसा कन्हैया के मुखमंडल पर सोते समय जाग्रत हुआ।) जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा कि अब तो कान्हा सो ही गया है। तभी कुछ गोपियां वहां आई। गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं। इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुनरू कुनमुनाकर जाग गए। तब यशोदा उन्हें सुलाने के उद्देश्य से पुनरू मधुर-मधुर लोरियां गाने लगीं। अंत में सूरदास नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते हैं कि सचमुच ही यशोदा बड़भागिनी हैं। क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं व ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है।(चक्षु स्वामी-हिफी फीचर)



