अध्यात्म

भगवान की सर्व व्यापकता का पर्व अनंत चतुर्दशी

योगेश्वर भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में मोहग्रस्त अर्जुन को उपदेश देकर कर्तव्य पालन के लिये तैयार किया। इसी दौरान उन्होंने अपना विराट स्वरूप दिखाकर अर्जुन को समझाने का प्रयास किया कि सब कहीं मैं हूँ और सब कुछ मेरे ही अंदर है। यही भगवान की सर्व व्यापकता है। वे किसी विशेष स्थान पर ही नहीं अपितु सभी जगह हैं। राम चरितमानस में भी शंकर जी ने देवताओं की सभा में कहा था-
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम से प्रगट होहि मैं जाना।।
देस काल दिसि बिदिसंहु माहीं।
कहहु सो कहां जहां प्रभु नाहीं।।
भगवान की इसी सर्व व्यापकता का स्मरण कराने के लिए भाद्र पद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है और भगवान के विराट रूप की पूजा की जाती है। इस दिन 14 गांठों वाला एक धागा भी धारण किया जाता है। अंक शास्त्र में इसका विशेष महत्व होता है। श्रीमदभागवत के पांचवें स्कंध के 24वें अध्याय में 14 लोकों का वर्णन है। अनंत चतुर्दशी पर धारण किये जाने वाले धागे की 14 गांठे इन्हीं 14 लोकों की प्रतीक मानी जाती हैं।
इस वर्ष 2026 में यह पर्व 25 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है और गणेश उत्सव का समापन व गणपति विसर्जन भी इसी दिन होता है। इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और संकटों से मुक्ति के लिए व्रत रखा जाता है। पूजा में कुमकुम या हल्दी से रंगे 14 गांठों वाले पवित्र धागे (अनंत सूत्र) को कलाई पर बांधा जाता है।ये 14 गांठे भगवान विष्णु द्वारा रचित 14 लोकों (सात ऊपर और सात नीचे के लोक) का प्रतीक मानी जाती हैं। दस दिवसीय गणेश उत्सव का इस दिन समापन होता है और लोग गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं। जैन समुदाय के लिए यह पर्यूषण पर्व का अंतिम दिन (संत्सरी) होता है। पुरुष इस धागे को अपनी दाहिने हाथ की कलाई पर और महिलाएं बाएं हाथ की कलाई पर बांधती हैं। ऐसी मान्यता है कि लगातार 14 वर्षों तक यह व्रत रखने से विशेष फल और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
इस पर्व से जुड़ी एक खास संख्या है 14 इसलिए पूजा में 14 गांठों वाला अनंत सूत्र, 14 प्रकार के नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। आखिर अनंत चतुर्दशी में 14 को इतना महत्व क्यों मिला और इसका शास्त्रीय आधार है।
श्रीमद्भागवत महापुराण, पंचम स्कंध, 24वां अध्याय में ब्रह्मांड की संरचना के संदर्भ में 14 लोकों का वर्णन मिलता है। इन्हें सात ऊर्ध्व लोक (उच्च लोक) और सात अधो लोक (निचले लोक) के रूप में बताया गया है। 14 लोकों की रचना के बाद इनके संरक्षण और पालन के लिए भगवान 14 रूपों में प्रकट हुए थे और अनंत प्रतीत होने लगे थे। इसलिए अनंत को 14 लोक और भगवान विष्णु के 14 रूपों का प्रतीक माना गया है।
ऊर्ध्व लोक – भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य लोक हैं
अधो लोक – अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल हैं।
अनंत चतुर्दशी की पूजा में पीला, लाल या केसरिया रंग के धागे में 14 गांठें लगाकर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने और इसे हाथ में धारण करने की परंपरा है। मान्यता है कि ये गांठें भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप और 14 लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं।
इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु पूजा के दौरान भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं और अनंत सूत्र धारण करते हैं। इसे संकटों से रक्षा, सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण के लिए बांधा जाता है। मान्यता है कि, जो व्यक्ति पूरे 14 वर्ष तक अनंत चतुर्दशी का व्रत करता है, पूजा-पाठ करता है और चैदह गांठ वाले इस अनंत सूत्र को बांधता है उसे भगवान विष्णु की कृपा से बैकुंठ की प्राप्ति होती है।
अंक शास्त्र में 14 को मूलांक 5 से जोड़ा जाता है, क्योंकि 1 और 4 मिलकार 14 होता है। अंक 5 को बुध ग्रह से जोड़ा गया है। अंबुध को बुद्धि, संवाद, तर्क, व्यापार, गणना का कारक माना गया है। ऐसे में एस्ट्रोलॉजर के अनुसार अनंत चतुर्दशी का दिन मूलाकं 5 वालों के लिए नए संपर्क बनाने और पुराने क्लाइंट से बातचीत बढ़ाने का दिन रह सकता है। रुका हुआ भुगतान मिलने या किसी पुराने आर्थिक मामले में प्रगति के संकेत हैं।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है। साल 2026 में परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात से शुरू होगी और 22 सितंबर की रात तक रहेगी।
परिवर्तिनी एकादशी का संबंध भी भगवान विष्णु के चातुर्मास में करवट बदलने से जोड़ा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत में केवल उपवास ही नहीं, बल्कि मन, वाणी और आचरण की शुद्धता को भी महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसे में अगर आप 22 सितंबर को एकादशी व्रत रखने वाले हैं तो इसकी तैयारी 21 सितंबर यानी दशमी तिथि से ही शुरू करना उचित माना जाता है। एकादशी व्रत की तैयारी दशमी से ही मानी जाती है। दशमी की रात भोजन हल्का और सात्विक रखना चाहिए। एकादशी व्रत की विधि में दशमी तिथि पर मांसाहार, प्याज, मसूर दाल आदि से बचने की बात कही गई है। कई परंपराओं में दशमी की रात अनाज का सेवन न करने की भी सलाह दी जाती है, ताकि अगले दिन व्रत के संकल्प में बाधा न आए।
एकादशी को केवल भोजन का त्याग नहीं माना गया है। इस व्रत में झूठ बोलने, कटु वचन कहने, छल-कपट और अनावश्यक विवाद से दूर रहने की परंपरा है। इसलिए 21 सितंबर से ही मन को शांत रखें और किसी के प्रति क्रोध या अपशब्दों से बचें। धार्मिक मान्यता में व्रत की सफलता के लिए आचरण की शुद्धता को भी महत्वपूर्ण माना गया है। घर और पूजा स्थान की सफाई करें। एकादशी से पहले घर के पूजा स्थान की सफाई करना और भगवान विष्णु की पूजा की तैयारी करना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल साफ करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की सामग्री तैयार कर अगले दिन स्नान के बाद भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लेकर पूजा करें।
परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है। इसलिए 21 सितंबर से ही विष्णु मंत्र, विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ या भगवान विष्णु के नाम का स्मरण किया जा सकता है। एकादशी की धार्मिक परंपरा में कथा श्रवण और भगवान के नाम का जाप भी महत्वपूर्ण माना गया है।

(प. आर.एस.-द्वि़वेदी-हिफी फीचर)

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