कृतज्ञता का महापर्व है श्राद्धतर्पण

भारतीय सनातन पद्धतियाँ कृतज्ञता ज्ञापक हैं इसलिये भारतीय मानस देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पति आदि के प्रति कृतज्ञता का बोध रखता है। किसी के द्वारा किये गए उपकार, सहयोग आदि को न भूलना एवं उसको स्मरण रखते हुये उसके प्रति आभार प्रकट करना भारतीय जीवन-शैली है। इसी भाव का प्रत्यक्ष उदाहरण है- श्राद्ध पक्ष।
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 (सोलह) दिन प्रत्येक वर्ष श्राद्ध के माने गये हैं। इस बार आश्विन कृश्ण नवमी तिथि की हानि होने से पितृ पक्ष 14 दिनों का होगा 01अक्टूबर को मध्यान्ह में पंचमी व अपरान्ह में षष्ठी का भी श्राद्ध कर दिया जायेगा। विद्वानों का मत है कि आश्विन कृश्ण पक्ष की मान्यता पितृ पक्ष की है। षास्त्रीय विधान है कि आश्विन कृश्ण पक्ष प्रतिपदा उदयतिथि में जिस दिन मिलती है उसी दिन से पितृपक्ष आरम्भ होता है। अतः अबकी पितृपक्ष का आरम्भ 27 सितम्बर 2026 दिन रविवार से प्रारम्भ हुआ जो 10 अक्टूबर 2026 दिन षनिवार को सर्वपैत्री अमावस्या पर पितृ विसर्जन से समाप्त होगा। पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितम्बर को किया गया। तर्पण काल व श्राद्ध का समय मध्यान्ह में होना आवश्यक होता है।
भारतीय मनीषियों ने अपनी तत्वानुवेषी मेधा एवं सूक्ष्मदर्शी वैज्ञानिक शोधों से मानव पर तीन प्रकार के ऋण का निर्धारण किया है जो कि देव ऋण, ऋषि ऋण एवं पितृ ऋण के नाम से अभिहित हैं। देव ऋण से मुक्ति के लिये शास्त्र सम्मत पूजन एवं ज्ञानार्जन का निर्देश है, जबकि ऋषि ऋण से अवमुक्त होने के लिये शिक्षार्जन, आत्मबोध हेतु उपाय आदि का शास्त्र सम्मत विधान हैं। इसी श्रंृखला में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिये गृहस्थ जीवन में सन्तुलित आचरण, सन्तानोत्पत्ति, सन्तान को सुयोग्य नागरिक बनाना प्रमुख है। इसलिये ऋषियों ने ‘‘धन्यो गृहस्थाश्रमः’’ की उद्घोषणा की। मुनियों ने ब्रह्मचर्य आश्रम, बानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम से गृहस्थ आश्रम धन्य घोषित किया। यह भी भारतीय कृतज्ञता का दर्शन है क्योंकि गृहस्थ अनवरत श्रम से उपार्जन करके अपना व अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। अतिथि, साधु, अभ्यागत आदि की भी सेवा करता है। समाज सेवा हेतु भी योगदान करता है इसलिये शास्त्रकारों ने गृहस्थ जीवन की प्रशंसा की है।
श्राद्ध श्रद्धा का एक महापर्व है जो कि पितरांे के निमित्त किया जाने वाला एक महा कर्तव्य है। पूर्वजों की अपूर्व .पा से ही आज हम सब जीवित है। यह पूर्वजों का स्मृति समारोह है कर्तव्य बोध का प्रेरक है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि ‘‘अपनी संस्.ति सभ्यता एवं परम्परा को भूलना नहीं चाहिये। आत्म गौरव एवं स्व कर्तव्य निष्ठा से ही श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है। पितरों के निमित्त किये जाने वाले कर्तव्य बोध को भी श्रीमद्भगवत गीता (अध्याय-3,12) याद दिलाती है ताकि इस परम्परा को आने वाली पीढ़ियां अनुसरण कर भारतीय संस्कृति के प्रति अपनी अस्था बनाये रखें।
भारतीय हिन्दू परम्परा में माता-पिता (पितरों) की सेवा को सबसे बडी पूजा माना गया है। इसीलिये हिन्दू धर्मशास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई है। जन्मदाता माता पिता को मृत्योपरान्त लोग भूल न जाएं। इसीलिए श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है।
पुराणों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी सपिन्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। पुराणों के अनुसार वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोडने पर धारण करती है। प्रेत होती है। प्रिय की अतिरेक अवस्था प्रेत है क्योंकि आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है, तब भी उसके अन्दर मोह, माया, भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिन्डन के बाद वह प्रेत, पितरों में सम्मिलित हो जाता है।
पितृपक्ष में जो तर्पण किया जात है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है पुत्र या उसके नाम से उनका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिन्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक अश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उध्र्वमुख्य होने लगता है। 15 दिन तक अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर ब्रह्यंडीय ऊर्जा के साथ वापस चले जाते है।
पितृपक्ष मेें हिन्दू लोग मन, कर्म, वाणी से संयम का जीवन जीते है, पितरों को स्मरण करके जल चढ़ाते हैं। निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है परन्तु गया श्राद्ध का विशेष महत्व है वैसे भी इसका शास्त्रीय समय निश्चित है परन्तु ‘गया सर्वकालेषु पिंड दधाद्विपक्षणम्’ कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति दे दी गयी है। पुराणों के व्याख्यान में वैसे तो श्राद्ध कर्म या तर्पण करने के भारत में कई स्थान है। लेकिन बिहार में पवित्र फल्गु नदी के तट पर बसे प्राचीन गया शहर की देश ही नही बल्कि विदेशों में भी पितृपक्ष और पिंडदान को लेकर अलग पहचान है। पुराणों के अनुसार पितरों के खास आश्विन मास के .ष्णपक्ष या पितृपक्ष ‘‘मोक्षधाम गयाजी’’ आकर पिंडदान एवं तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और माता पिता व सात पीढ़ियों का उद्धार होता है।
पितृ की श्रेणी में मृत पूर्वजों, माता, पिता, दादा, दादी, नाना, नानी सहित सभी पूर्वज शमिल होते है व्यापक दृष्टि से मृत गुरू और आचार्य भी पितृ की श्रेणी में आते है। कहा जाता है कि गया में पहले विभिन्न नामों के 360 वेदियां थीं, जहां पिंडदान किया जाता था इनमें अब 48 ही बची है। यहां की बेदियों में विष्णुपाद मन्दिर फल्गु नदी के किनारे और अक्षयवट पर पिंडदान करना जरूरी माना जाता है। इसके अतिरिक्त बैतरणी, प्रेतशिला, सीताकुण्ड, नागकुण्ड, पाण्डुशिला, रामशिला, मंगलागौरी, कागबलि आदि भी पिण्डदान के लिए प्रमुख है। यही कारण है कि देश में श्राद्ध के लिए 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है, जिसमें गया का स्थान स्र्वाेपरि है।
गया का पुराणाों में उल्लेख पितृश्राद्ध एवं पिण्डदान का कई कारणांे से महत्व दर्शाता है। बताया जाता है कि गयासुर नामक असुर ने कठिन तपस्या कर ब्रह्य जी से वरदान मांगा था कि उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाये और लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जायें। इस वरदान के चलते लोग भयमुक्त होकर पाप करने लगे और गयासुर के दर्शन से फिर पाप मुक्त हो जाते थे। इससे बचने के लिए देवताओं ने यज्ञ के लिए गयासुर से पवित्र स्थान की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया। जब गयासुर लेटा तो उस का शरीर पांच कोस में फैल गया। यही पंाच कोस जगह आगे चलकर गया बना। यह भी उल्लेख है कि देहदान के बाद गयासुर के मन से लोगांे को पाप मुक्त करने की इच्छा नहीं गई और फिर से देवताओं से वरदान मांगा कि यह स्थान लोंगों को तारने वाला बना रहे। तब से ही यह स्थान मृतकों के लिये श्राद्धकर्म मुक्ति का स्थान बन गया।
(प्रेेमशंकर अवस्थी-हिफी फीचर)



