नवरात्र की नौ रातों का रहस्य

नवरात्र शुरू होने के साथ ही एक अजीब सा उत्साह और उल्लास पूरे वातावरण में फैल जाता है। हर तरफ देवी के श्रृंगार और पूजा के सामान का बाजार सज जाता है लोग तैयारी शुरू कर देते हैं और कलश स्थापना और कहीं-कहीं देवी की मूर्ति की स्थापना के साथ इसकी शुरूआत की जाती है। बंगाली षष्ठी पूजन से पूजा का प्रारम्भ करते हैं। जगह-जगह पंडाल सज जाते हैं और पूरा माहौल खुशनुमा हो जाता है। प्रतिवर्ष के अवसान पर आने वाला यह त्यौहारों का समय हर्ष और उल्लास का तो होता ही है इसके साथ ही वो एक खास संदेश भी देता है जो इन त्यौहारों को मनाने के पीछे है वह बहुत गंभीर है। लेकिन यह सारी तैयारियां तो बाहर की हैं, असली पूजा तो तब होगी जब हम अपने भीतर अपने अन्तर्मन में उतरकर खुद को पहचान सकें। वस्तुतः यह सिर्फ उत्सव मनाने का त्यौहार नहीं है, बल्कि स्वयं की चेतना के भीतर उतरने की एक गहरी साधना है। नौ देवियों की आराधना हमारे शरीर और मन के भीतर के नौ चक्रों में स्थित चेतना के गहनतम स्तर तक जाने के लिए है।
शैल पुत्री प्रथम देवी हैं जिनकी पूजा नवरात्र के पहले दिन की जाती है। शैलपुत्री हमारे भीतर की जड़ता को दूर करने के लिए हैं। यह हमारी चेतना का पहला कदम है, यानी अपनी मूर्खता को, अपनी कमियों को पहचानना। यह नौ रातों की पूजा सिर्फ बाहर की पूजा नहीं बल्कि भीतर की यात्रा है। एक आन्तरिक क्रांति है ये दुर्गा पूजा हमारे भीतर नौ स्तरों के जागरण का प्रतीक है।
दूसरी देवी ब्रह्मचारिणी देवी हैं जो हमें तप और संयम सिखाती हैं। ये व्रत और उपवास इसी संयम को साधने कें लिए होते हैं, क्योंकि हमारी ऊर्जा का सही दिशा में बहना भी जरूरी है।
तीसरी देवी हैं चन्द्रघण्टा जो जागरूकता की घंटी की तरह हैं। इनकी कृपा से कोई भी व्यक्ति जाग्रति प्राप्त कर सकता है। कहते हैं माँ चंद्रघण्टा देवी की अनुकम्पा से हमारे भीतर जाग्रति, यानी ध्यान और ज्ञान की पहली झंकार होती है तब हम जीवन को अलग ढंग से देखना शुरू करते हैं यह वही स्थिति होती है, जब हम जाग्रत होते हैं। जीवन में यह बहुत जरूरी है कि जीवन में हम जाग्रत रहें, सतर्क हरें। ताकि जब भी हम कुछ करें हमें पता हो कि हम क्या कर रहे हैं। हमें स्वयं गलत और सही का पता होना चाहिये।
चैथी देवी हैं कुष्माण्डा। ये सृजन की शक्ति हैं समस्त ब्रह्मण्ड एक छोटी सी ऊर्जा से ही उत्पन्न हुआ है। कहते हैं जब हमारे भीतर की ऊर्जा जागती है तब हम भी अपने जीवन के अनुभवों सृजनकर्ता बन जाते हैं। हम देखते हैं कि समाज में अधिकांश लोग मूर्छित रहते हुए, सोते हुए ही अपना जीवन बिता देते हैं यह गलत है, जीवन बहुत कीमती है उसे सकारात्मकता के साथ जीना चाहिये। नवरात्र में कुष्माण्डा देवी की आराधना की जाती है ताकि कुछ सार्थक करते हुये जीवन जिया जा सके।
पांचवी देवी हैं स्कन्दमाता। ये प्रेम और करूणा की देवी हैं। कहते हैं हमारी भीतरी जाग्रत ऊर्जा ही प्रेम में परिवर्तित होती है। ध्यान करते वक्त एक ऐसी स्थिति आती है जब हम अपने आस-पास के लोगों को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें वे जैसे हैं वैसे ही स्वीकार करने लगते हैं। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है जिसे हमारी संस्कृति में इतनी सहजता से समझाया गया है।
छठी देवी हैं कात्यायनी। ये साहस और परिवर्तन का प्रतीक हैं। यह वह कठिन चरण है, जिसमें साधक को साहस करना होता है, अपने पुराने स्वरूप को त्यागने का, तोड़ने का। यह बहुत कठिन होता है क्योंकि यह वह स्थिति होती है जब हमें अपने अहंकार को छोड़ना होता है। यह देवी के ध्यान की चरम अवस्था से थोड़ा पहले की अवस्था है। यह कठिन साधना तभी सम्भव हो पाती है जब हमने पिछले पांच चरणों में एकाग्र होकर ध्यान किया हो। तभी हम मन की उस मजबूत और स्थिर स्थिति में पहुंच जाते हैं। जब अहंकार को छोड़ना आसान हो जाता है।
सातवीं देवी हैं कालरात्रि। यह साधना की स्थिति है जब हमें अपने भीतरी अंधकार का सामना करना होता। प्रत्येक साधक को अपने भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार से गुजरना ही पड़ता है। डर, क्रोध, वासना, अहंकार, हमारे भीतर का अज्ञान है, इनका सामना करना ही पड़ता है इनसे भागेंगे तो कभी इनसे मुक्त नहीं हो पायेंगे। साधना के दौरान ही हमें इन अपने दुर्गुणों को देखना होता है और इन्हें स्वीकार करके छोड़ना ही मुक्ति के मार्ग पर चलने की शुरूआत है। हमारे तीज, त्यौहार, हमारी परम्परायें हमें हमारे दुर्गुणों से मुक्त कराने के लिए ही आते हैं।
आठवीं देवी हैं महागौरी। ये शुद्धता की अवस्था है। अर्थात जब हम अंधकार से गुजर जाते हैं, यानी सातवें चरण को पार कर लेते हैं। तब हम अपने पूर्ण शुद्ध रूप में होते हैं तभी हम महागौरी की उपासना तक पहुंचते हैं। तब हमारा मन निर्मल हो जाता है हमारे अंदर एक नई निर्मलता पैदा होती है जैसे बारिश के बाद आकाश साफ हो जाता है, बिलकुल वैसी ही स्वच्छता हमारे अन्दर बाहर सब तरफ फैल जाती है। सात दिन पूजा, साधना के बाद आठवें दिन यह एक सुखद आनन्द की अवस्था होती है।
नौंवी देवी हैं सिद्धिदात्री। यह पूर्णता की अवस्था है इस स्थिति में साधक को कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रहती। वह स्वयं में ही पूर्ण हो जाता है। कोई इच्छा नहीं रहती है। आध्यात्मिक भाषा में इसी स्थिति को मोक्ष कहते हैं यहाँ कोई कमी नहीं होती, कुछ भी सोचने की इच्छा नहीं रहती। वस्तुतः नवरात्र के नौ दिन वे नौ कदम हैं, जो हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाते हैं। यह बाहरी पूजा का नहीं बल्कि भीतरी जागरण का पर्व है। यह मूलतः हमारी आन्तरिक चेतना के सात चक्रों को जागृत करने की पूजा है। नौ दिनों की इस पूजा के दौरान हम ‘मूलाधार’, ‘स्वाधिष्ठान’, ‘मणिपुर’, ‘अनाहत’, ‘विशुद्ध’ ‘आज्ञा’, सहस्त्रार’ चक्रों को ध्यान और साधना के माध्यम से जाग्रत करते हैं जब हम नवरात्र की पूजा और उपवास करते हुए अपने भीतर और बाहरी आचरण में सुधार करते हैं तभी यह पूजा सार्थक होती है। यदि हम अपने आचरण में कोई सुधार नहीं ला सके हैं और सिर्फ व्रत और पूजा करते हैं तो यह सिर्फ पहले से चली आ रही परम्परा का निर्वाह भर है। असली पूजा तो तब संभव होती है जब हम अपने आचरण अपनी सोच में कुछ सार्थक बदलाव ला सकें। नवरात्र की
असली पूजा तो अपने भीतर झांकने वहां संशोधन करने से शुरू होती है। देवी का हर रूप, उनका प्रत्येक भाव हमारे भीतर है, बस जरूरत है उसे जाग्रत करने की। अतः इन नौ दिनों में हमें अपने ऊपर काम करना चाहिये ताकि
हम अपने जीवन को सार्थक बना सकें। इन नौ दिनों के रहस्य को समझते हुये पूजा और अनुष्ठान करने चाहिये ताकि अपने व्यक्तित्व में, चिन्तन में निखार ला सकें।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



