लेखक की कलम

राहत कैम्प में मौत पर सुप्रीम चिंता

सुख और दुख जीवन के अंग हैं लेकिन दुव्र्यवस्था के चलते अगर कष्ट होता है अथवा बड़ी हानि होती है तो इस पर चिंतित होना स्वाभाविक है। पूर्वोत्तर भारत के राज्य मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच ऐतिहासिक तनाव है। इसके चलते कई बार हिंसक वारदातें भी हो चुकीं हैं। संघर्ष इतना भीषण हो जाता है कि प्रभावित लोगों को सरकारी कैम्प में रहना पड़ता है। सरकारी कैम्प में भी अगर उनका जीवन सुरक्षित नहीं रह पाता तो यह सरकारी व्यवस्था की कमी है। सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में राहत शिविर में कई लोगों की मौत को लेकर इसीलिए चिंता जतायी और राज्य सरकार से जवाब भी मांगा है। मणिपुर का अपना दर्द है लेकिन जब कभी उन्हें यह एहसास होता है कि कोई भी अपना नहीं तो पीड़ा ज्यादा बढ़ जाती है। इसी महीने (सितम्बर 2026) में मणिपुर में रहने वाले संगीतकार चोंगथम विक्रम सिंह की देश की राजधानी दिल्ली में बुरी तरह पिटाई कर दी गयी। कथित हमले में लगी चोटों के कारण उनकी मौत हो गयी। मणिपुर के लोगों को ऐसे कष्ट से तो बचाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में हिंसा के दौरान विस्थापित हुए लोगों के लिए बने राहत कैंपों में हुई कई मौतों पर हैरानी जताई। कोर्ट ने मणिपुर के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे इन मौतों की जांच, आपराधिक कार्रवाई शुरू करने और वहां रहने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी दें। चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने राज्य के शीर्ष अधिकारी को चेतावनी देते हुए पूछा कि जस्टिस गीता मित्तल कमेटी द्वारा दी गई जानकारी पर कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए। बेंच ने आदेश में कहा, हम मणिपुर के मुख्य सचिव को निर्देश देते हैं कि वे मणिपुर के राहत कैंपों में हुई मौतों, खासकर असामान्य मौतों, पर एक हलफनामा दाखिल करें। साथ ही, बेंच ने यह भी पूछा कि मौत के 34 मामलों में से केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम क्यों कराए गए। बेंच ने कहा, राज्य को यह भी बताना होगा कि राहत कैंपों में शरण लेने वाले जिन विस्थापित लोगों की असामान्य मौतें हुईं, उन्हें मुआवजे के तौर पर केवल 20 से 30 हजार रुपये ही क्यों दिए गए। कोर्ट ने मणिपुर राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को भी इस मुद्दे पर एक अलग स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सेवा प्राधिकरण से कहा कि वह यह सुनिश्चित करे कि असामान्य मौत के सभी मामलों में एफआईआर दर्ज की जाएं। बेंच ने प्राधिकरण से यह भी कहा कि वह देखे कि जांच तेजी से हो और राहत कैंपों में रह रहे विस्थापित लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित किया जाए।
यह आदेश बेंच ने जस्टिस मित्तल कमेटी और एक आईपीएस अधिकारी की रिपोर्ट देखने के बाद दिया गया। इन रिपोर्टों में बताया गया था कि मणिपुर के राहत कैंपों में 30 से ज्यादा मौतें हुई हैं और एक मौत कथित यौन उत्पीड़न के बाद हुई थी। इसके अलावा, बेंच ने उम्मीद जताई कि मणिपुर में 2023 की हिंसा से जुड़े सीबीआई और एनआईए के मामलों की सुनवाई के लिए बनाई गई दो विशेष ट्रायल कोर्ट तेजी से अपना ट्रायल पूरा करेंगी। रिपोर्टों का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा कि मामलों की जानकारी कानूनी सेवा वकील को दे दी गई है और पीड़ित याचिकाकर्ता अपने मामलों को आगे बढ़ाने के लिए इनका इस्तेमाल कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ये जानकारियां राज्य सरकार और पूर्व आईपीएस अधिकारी दत्तात्रेय पडसलगीकर ने दी थीं, जो मणिपुर हिंसा की सीबीआई जांच की निगरानी कर रहे हैं। सीबीआई और राज्य सरकार की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्रीय जांच एजेंसी ने 31 मामलों की जांच की है और 28 मामलों में फाइनल रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि ब्ठप् के तीन मामलों की जांच अभी भी चल रही है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर और असम सरकारों और अन्य लोगों से कहा था कि वे मणिपुर में 2023 की जातीय हिंसा से जुड़े सीबीआई और एनआईए के मामलों की विशेष रूप से सुनवाई के लिए दो विशेष ट्रायल कोर्ट बनाने पर विचार करें। मणिपुर में जातीय हिंसा 3 मई, 2023 को शुरू हुई थी।
मैतेई समुदाय को एसटी का दर्जा दिए जाने की मांग के विरोध में पहाड़ी जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च निकाला गया था, जिसके बाद यह विवाद बढ़ गया। मैतेई समुदाय मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहता है, जबकि कुकी और नगा समुदाय आसपास की पहाड़ियों में रहते हैं। जमीन, संसाधनों और आरक्षण को लेकर इनके बीच ऐतिहासिक तनाव रहा है। इस संघर्ष में अब तक 200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लोग बेघर हुए हैं। राज्य के कई इलाकों में समुदायों के बीच सख्त भौगोलिक विभाजन देखा गया है, जिससे लोग एक-दूसरे के इलाकों में आने-जाने से कतराते हैं। समय-समय पर सुरक्षा बलों की तैनाती और शांति के प्रयासों के बावजूद पूर्वोत्तर के इस राज्य में तनाव और छिटपुट हिंसा की घटनाएं बनी हुई हैं
अब भी कई मैतेई और कुकी राहत शिविरों में रह रहे हैं लेकिन हिंसा से प्रभावित ऐसे भी लोग थे, जिन्हें भागकर पड़ोसी राज्य मिजोरम में शरण लेनी पड़ी थी।
अभी हाल ही में मणिपुर के रहने वाले संगीतकार चोंगथम विक्रम सिंह की कुछ लोगों के कथित हमले में लगी चोटों के कारण 14 सितम्बर को मौत हो गई। चोंगथम दिल्ली के आश्रम इलाके में रह रहे थे। समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, अभियुक्तों की जानकारी देते हुए पुलिस ने बताया कि मामले में 7 वयस्कों और एक नाबालिग को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बताया कि सभी अभियुक्त अलग-अलग ढाबों और फूड स्टॉल पर काम करते हैं। पुलिस ने कहा कि मामले की जांच जारी है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत मॉब लिंचिंग का मामला दर्ज किया है। अंग्रेजी अखबार द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, चोंगथम के बेटे याइफाबा ने पुलिस को दी शिकायत में कहा कि अस्पताल ले जाते समय उनके पिता ने उन्हें बताया था कि पास के एक ढाबे के लोगों ने उन पर हमला किया। शिकायत के मुताबिक, इनमें से कुछ लोगों ने पहले भी ज्यादा शोर करने की शिकायत करने के बाद सिंह को धमकी दी थी। इंफाल के रहने वाले सिंह गिटारिस्ट और संगीतकार थे। वह रॉक बैंड्स का हिस्सा रह चुके थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से काम नहीं कर रहे थे। वह कई वर्षों से संगीत प्रस्तुत करते रहे थे और संगीत शिक्षक भी थे। मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता एन. बीरेन सिंह ने कहा कि वह इस घटना से बहुत दुखी और बेहद चिंतित हैं।

(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button