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(भाग-1) दुनिया का सबसे अनमोल रत्न

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक लम्बी संधर्व गाथा है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों ने अपने-अपने स्तर पर आज़ादी की इस मशाल को जलाए रखने का काम किया। स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत बंगाल से शुरू होकर पूरे देश में फैली जिसने आगे चलकर एक सशक्त मुखर क्रांति का स्वरूप ग्रहण किया। यह आंदोलन एक निरन्तर होने वाले वैचारिक विकास के रूप में जाना गया। इस दौरान जो साहित्य रचा गया जो कविताएं लिखीं गईं वे सभी शिल्प और संवेदना दोनों के स्तर पर उच्चकोटि की थीं। यह सच है कि देश की आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हमारे देश में तत्कालीन प्रबुद्ध कलमकारों ने अपने उत्पीड़न की परवाह न करते हुए जन मानस को सचेत करने, उनमें आततायी विदेशी शासन के कारनामों की पोल खोलने तथा लोगों में जन जागृति की भावना विकसित करने के लिए अपनी लेखनी का अच्छा उपयोग किया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जो सामाजिक साहित्य उस समय रचा गया वह सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था, क्योंकि उन्हें डर था कि लोग बहुत तेजी से उनके विरुद्ध उठ खड़े हों सकते हैं। ये सभी रचनाएं हमारे अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं। इस प्रतिबन्धित साहित्य से नई पीढ़ी का परिचय कराना भी हमारा नैतिक दायित्व है जिसकी शुरुआत हम जल्दी ही करेंगे। जिसके प्रथम चरण में हम प्रेमचंद की पुस्तक ‘सोज़े वतन’ से ही दूसरी कहानी यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

 

दिलफिगार एक कँटीले पेड़ के नीचे दामन चाक किये बैठा हुआ खून के आँसू बहा रहा था। वह सौंदर्य की देवी यानी मलका दिलफरेब का सच्चा और जान देनेवाला प्रेमी था। उन प्रेमियों में नहीं, जो इत्र-फुलेल में बसकर और शानदार कपड़ों से सजकर आशिक के वेश में माशूकियत का दम भरते हैं। बल्कि उन सीधे-सादे भोले-भाले फिदाइयों में जो जंगल और पहाड़ों से सिर टकराते हैं और फरियाद मचाते फिरते हैं।

दिलफरेब ने उससे कहा था कि अगर तू मेरा सच्चा प्रेमी है तो जा और दुनिया की सबसे अनमोल चीज लेकर मेरे दरबार में आ। तब मैं तुझे अपनी गुलामी में कबूल करूँगी। अगर तुझे वह चीज न मिले तो खबरदार इधर रुख न करना, वरना सूली पर खिंचवा दूँगी।
दिलफिगार को अपनी भावनाओं के प्रदर्शन का, शिकवे-शिकायत का, प्रेमिका के सौंदर्य-दर्शन का तनिक भी अवसर न दिया गया। दिलफरेब ने ज्योंही यह फैसला सुनाया, उसके चोबदारों ने गरीब दिलफिगार को धक्के देकर बाहर निकाल दिया।

और आज तीन दिन से यह आफत का मारा आदमी उसी कँटीले पेड़ के नीचे उसी भयानक मैदान में बैठा हुआ सोच रहा है कि क्या करूँ। दुनिया की सबसे अनमोल चीज मुझको मिलेगी? नामुमकिन! और वह है क्या? कारूँ का खजाना? आबे-हयात? खुसरो का ताज? जामे-जम? तख्ते-ताऊस? परवेज की दौलत? नहीं, ये चीजें हरगिज नहीं। दुनिया में जरूर इनसे भी महँगी, इनसे भी अनमोल चीजें मौजूद हैं। मगर वे क्या हैं? कहाँ हैं? कैसे मिलेंगी? या खुदा, मेरी मुश्किल क्योंकर आसान होगी?

लेखन से प्रेरणा दी मुंशी प्रेमचन्द ने
दिलफिगार इन्हीं खयालों में चक्कर खा रहा था और अक्ल कुछ काम न करती थी। मुनीर शामी को हातिम-सा मददगार मिल गया। ऐ काश, कोई मेरा भी मददगार हो जाता। ऐ काश, मुझे भी उस चीज का, जो दुनिया की सबसे बेशकीमत चीज है, नाम बता दिया जाता। भला वह चीज हाथ न आती मगर मुझे इतना तो मालूम हो जाता कि वह किस किस्म की चीज है। मैं घड़े बराबर मोती की खोज में जा सकता हूँ। मैं समुंदर का गीत, पत्थर का दिल, मौत की आवाज और इससे भी ज्यादा बेतुकी चीजों की तलाश में कमर कस सकता हूँ। मगर दुनिया की सबसे अनमोल चीज! यह मेरी कल्पना की उड़ान से बहुत ऊपर है।

आसमान पर तारे निकल आये थे। दिलफिगार यकायक खुदा का नाम लेकर उठा और एक तरफ को चल खड़ा हुआ। भूखा-प्यासा, नंगे बदन, थकन से चूर, वह बरसों वीरानों और आबादियों की खाक छानता फिरा, तलवे काँटों से छलनी हो गये, शरीर में हड्डियाँ ही हड्डियाँ दिखाई देने लगीं मगर वह चीज, जो दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज थी, न मिली और न उसका कुछ निशान मिला।

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एक रोज वह भूलता-भटकता एक मैदान में जा निकला, जहाँ हजारों आदमी गोल बाँधे खड़े थे। बीच में कई अमामे और चोगेवाले दाढ़ीधारी काज़ी अफसरी शान से बैठे हुए आपस में कुछ सलाह-मशविरा कर रहे थे और इस जमात से जरा दूर पर एक सूली खड़ी थी। दिलफिगार कुछ तो कमजोरी की वजह से और कुछ यहाँ की कैफियत देखने के इरादे से ठिठक गया। क्या देखता है कि कई लोग नंगी तलवारें लिये, एक कैदी को जिसके हाथ-पैर में जंजीरें थीं, पकड़े चले आ रहे हैं। सूली के पास पहुँचकर सब सिपाही रुक गये और कैदी की हथकड़ियाँ, बेड़ियाँ सब उतार ली गयीं।

इस अभागे आदमी का दामन सैकड़ों बेगुनाहों के खून के छींटों से रंगीन था और उसका दिल नेकी के ख़याल और रहम की आवाज से जरा भी परिचित न था। उसे काला चोर कहते थे। सिपाहियों ने उसे सूली के तख्ते पर खड़ा कर दिया, मौत की फाँसी उसकी गर्दन में डाल दी और जल्लादों ने तख्ता खींचने का इरादा किया कि वह अभागा मुजरिम चीखकर बोला, “खुदा के वास्ते मुझे एक पल के लिए फाँसी से उतार दो ताकि अपने दिल की आखिरी आरजू निकाल लूँ।”

यह सुनते ही चारों तरफ सन्नाटा छा गया। लोग अचम्भे में आकर ताकने लगे। काजियों ने एक मरने वाले आदमी की अंतिम याचना को रद्द करना उचित न समझा और बदनसीब पापी काला चोर जरा देर के लिए फाँसी से उतार लिया गया। इसी भीड़ में एक खूबसूरत भोला-भाला लड़का एक छड़ी पर सवार होकर अपने पैरों पर उछल-उछल फर्जी घोड़ा दौड़ा रहा था और अपनी सादगी की दुनिया में ऐसा मगन था कि जैसे वह इस वक्त सचमुच किसी अरबी घोड़े का शहसवार है। उसका चेहरा उस सच्ची खुशी से कमल की तरह खिला हुआ था जो चंद दिनों के लिए बचपन ही में हासिल होती है और जिसकी याद हमको मरते दम तक नहीं भूलती। उसका दिल अभी तक पाप की गर्द और धूल से अछूता था और मासूमियत उसे अपनी गोद में खिला रही थी।

बदनसीब काला चोर फाँसी से उतरा। हजारों आँखें उस पर गड़ी हुई थीं। वह उस लड़के के पास गया और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगा। उसे इस वक्त वह जमाना याद आया जब वह खुद ऐसा ही भोला-भाला, ऐसा ही खुश-व-खुर्म और दुनिया की गन्दगियों से ऐसा ही पाक-साफ था। माँ गोदियों में खिलाती थी, बाप बलैयाँ लेता था और सारा कुनबा जान न्योछावर करता था। आह! काले चोर के दिल पर इस वक्त बीते हुए दिनों की याद का इतना असर हुआ कि उसकी आँखों से, जिन्होंने दम तोड़ती हुई लाशों को तड़पते देखा और न झपकी, आँसू का एक कतरा टपक पड़ा।

दिलफिगार ने लपककर उस अनमोल मोती को हाथ में ले लिया और उसके दिल ने कहा, “बेशक यह दुनिया की सबसे अनमोल चीज है जिस पर तख्ते-ताऊस और जामे-जम और आबे-हयात और जरे-परवेज सब न्योछावर हैं।”

इस खयाल से खुश होता कामयाबी की उम्मीद में सरमस्त, दिलफिगार अपनी माशूका दिलफरेब के शहर मीनोसवाद को चला। मगर ज्यों-ज्यों मंजिलें तय होती जाती थीं, उसका दिल बैठा जाता था कि कहीं उस चीज को, जिसे मैं दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज समझता हूँ, दिलफरेब की आँखों में कदर न हुई तो मैं फाँसी पर चढ़ा दिया जाऊँगा और इस दुनिया से नामुराद जाऊँगा। लेकिन जो हो सो हो, अब तो किस्मत आजमाई है।

आखिरकार पहाड़ और दरिया तय करते शहर मीनोसवाद में आ पहुँचा और दिलफरेब की ऊँची ड्योढ़ी पर जाकर विनती की कि थकान से टूटा हुआ दिलफिगार खुदा के फजल से हुक्म की तामील करके आया है और आपके कदम चूमना चाहता है। दिलफरेब ने फौरन अपने सामने बुला भेजा और एक सुनहरे पर्दे की ओट से फरमाइश की कि वह अनमोल चीज पेश करो। -क्रमशः (हिफी डेस्क-हिफी फीचर

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