
बांग्ला साहित्यकार विमल मित्र कहा करते थे- ‘वी लर्न फ्राम हिस्ट्री दैट वी डोन्ट लर्न फ्राम हिस्ट्री’ अर्थात इतिहास से हम सिर्फ यही सीखते हैं कि इतिहास से हमने कुछ नहीं सीखा। हमारे देश के स्वर्णिम इतिहास के बारे में तो यह बात शत-प्रतिशत सही साबित होती है। वेद, पुराणों मंे वर्णित ज्ञान-विज्ञान को हम कपोल कल्पित मानने लगे जबकि वेद-पुराणों पर ही अनुसंधान करके जर्मनी जैसे देश बहुत आगे बढ़ गये। रामायण एवं महाभारत कालीन दिव्यास्त्रों पर आज अनुसंधान कार्य चल रहे हैं। पहले लोग सवाल उठाते थे कि महाभारत काल में संजय राजा धृत राष्ट्र को कुरुक्षेत्र के मैदान का आंखों देखा हाल किस तरह सुना रहे होंगे जबकि आज लंदन के लाडर््स मैदान पर क्रिकेट का आंखों देखा हाल दुनिया भर में कहीं भी न सिर्फ सुना जा सकता है बल्कि देखा भी जा सकता है। इसलिए यह बात निर्विवाद रूप से सच साबित हुई है कि स्वर्णिम अतीत से हमें प्रेरणा मिलती है और हम अपना लौकिक और पारलौकिक जीवन सुधार सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि-
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई, तेहि मग चलत सुगम मोहि भाई
अर्थात ऋषि-मुनियों ने प्रभु राम की कीर्ति का यशगान करके जिस तरह से शुरुआत की है, उसी तरह उनके रास्ते पर चलना मुझे सुगम (सरल) लगता है।
अति अपार जे सरित बर जौ नृप सेतु कराहिं।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहिं जाहिं।
अर्थात अत्यंत बड़ी श्रेष्ठ नदियां, जिनको पिपीलिका अर्थात चींटी पार नहीं कर सकती लेकिन उन नदियों पर जब राजा पुल बनवा देते हैं तो उस पुल से चींटी भी बिना ज्यादा परिश्रम के पार हो जाती है।
एहि प्रकार बल मनहि देखाई, करिहउं रघुपति कथा सुहाई।
व्यास आदि कवि पुंगव नाना, जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना
चरन कमल बंदउं तिन्ह केरे, पुरवहुं सकल मनोरथ मेरे।
कलि के कबिन्ह करउं परनामा, जिन्ह बरने रघुपति गुनग्रामा।
इसी प्रकार मुनियों के वर्णन के सहारे मैं श्रीराम के चरित्र का वर्णन सहज ही कर सकूंगा। इस प्रकार मन को बल दिखाकर मैं श्री रघुनाथ जी की सुंदर कथा की रचना करूंगा। व्यास आदि जो अनेक श्रेष्ठ कवि हो गये हैं और जिन्होंने बड़े आदर से भगवान श्री रघुनाथ जी के गुण समूहों का वर्णन किया है, उनके साथ कलियुग के उन कवियों को भी प्रणाम करता हूं जिन्होंने प्रभुराम की कथा कही है ये सभी लोग हमारे मनोरथ को पूर्ण करेंगे।
जे प्राकृत कवि परम सयाने, भाषां जिन्ह हरि चरित बखाने
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगे, प्रनवऊं सबहि कपट सब त्यागे
होहु प्रसन्न देहु वरदानू, साधु समाज भनिति सनमानू
जो प्रबंध बुध नहीं आदरहीं, सो श्रमबादि बाल कवि करहीं।
तुलसीदास जी कहते हैं जो बुद्धिमान प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने सरल और अपने क्षेत्र की भाषा (बोली) में हरिचरित्रों का वर्णन किया है जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं जो इस समय वर्तमान हैं और जो भविष्य में होंगे उन सभी को मैं सारा कपट त्याग कर प्रणाम करता हूं क्योंकि इन सभी ने प्रभु राम की कथा का मार्ग बनाया है अर्थात रचना का संदर्भ प्रदान किया है इसलिए आप सभी प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिए कि साधु-समाज में मेरी कविता का सम्मान हो क्योंकि बुद्धिमान लोग जिस कविता का आदर नहीं करते हैं, मूर्ख कवि ही ऐसी रचना में अपना परिश्रम बर्बाद करते हैं। यहां पर यह समझना भी समीचीन होगा कि काव्य दो प्रकार के होते हैं एक खण्ड काव्य और दूसरा प्रबंध काव्य। खण्ड काव्य में किसी कहानी का एक संदर्भ ही वर्णित होता है लेकिन प्रबंध काव्य में किसी नायक की पूर्ण कहानी बतायी जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने प्रभु श्री राम की पूरी कहानी का वर्णन राम चरित मानस में किया है, इसलिए यह प्रबंध काव्य माना जाता है।
कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कहं हित होई
राम सुकीरति भनिति भदेसा, अस मंजस अस मोहि अंदेसा।
अर्थात कीर्ति (यश), भनिति (कविता) और भूति (सम्पत्ति) वहीं उत्तम है जो गंगा जी की तरह सभी का हित करने वाली हो। श्री रामचन्द्र जी की कीर्ति तो बड़ी ही सुंदर (सभी का अनंत कल्याण करने वाली) है लेकिन मेरी कविता भद्दी है अर्थात इन दोनों का मेल नहीं मिलता। इस बात की मुझे चिंता हो रही है।
तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे, सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।
लेकिन कवियों, आपकी कृपा से यह बात भी मेरे लिए सुलभ हो सकती है क्योंकि रेशम के धागे से यदि टाट जैसे भद्दे कपड़े पर भी सिलाई कर दी जाए तो वह सुहावनी अर्थात अच्छी लगती है।
सरल कवित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।
अर्थात चतुर पुरुष उसी कविता का आदर करते हैं जो सरल हो और जिसमें निर्मल अर्थात साफ-सुथरे चरित्र का वर्णन हो तथा जिसे सुनकर शत्रु स्वाभाविक वैर (दुश्मनी) को भूलकर सराहना करने लगे।
सो न होइ बिनु विमल मति, मोहि मति बल अति थोर
करहु कृपा हरिजस कहउं पुनि पुनि करउं निहोर
कवि कोविद रघुबर चरित मानस मंजु मराल
बाल विनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल
बंदउं मुनिपद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित
बंदउं चारिउ बेद भव बारिध बोहित सरिस
जिन्हहिं न सपनेहुं खेद, बरनत रघुवर बिसद जसु
बंदउं विधि पदरेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहं
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल विष बारूनी
विबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि करउं करजोरि
होई प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धि के होती नहीं और मेरी बुद्धि बल बहुत थोड़ा है इसीलिए बार-बार विनय करता हूं कि हे कवियों, आप कृपा करें जिससे मैं हरि का यश बखान कर सकूं। कवि और पण्डितगण आप जो रामचरित रूपी मानसरोवर के हंस हैं, मुझ बालक की बिनती सुनकर और सुंदर रूचि देखकर मुझ पर कृपा करें। मैं उन बाल्मीकी मुनि के चरण कमलों की वंदना करता हूं जिन्होंने रामायण की रचना की जो खर (राक्षस) सहित होने पर भी खर (कठोर) से विपरीत बड़ी कोमल और सुंदर है। महर्षि बाल्मीकि की रचना में दूषण (राक्षस) सहित होने पर भी दूषण अर्थात दोष से रहित है। महर्षि बाल्मीकि की रामायण में खर और दूषण राक्षसों की कथा बतायी गयी है। बाल्मीकी रामायण में रामकथा का यथार्थ वर्णित किया गया है। खर से मतलब खरा अर्थात यथार्थ भी होता है जबकि गोस्वामी तुलसीदास की रचना में मर्यादा का पूरा ध्यान रखा गया है। इसलिए बाल्मीकि की रामायण को ‘दोष रहित दूषण सहित’ बताया गया।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते
हैं कि चारों वेदों की वन्दना करता हूं जो संसाररूपी समुद्र के पार होने के लिए जहाज के समान है तथा जिन्हें श्री रघुनाथ जी के निर्मल यश का वर्णन करने में स्वप्न में भी थकावट नहीं हुई। मैं ब्रह्मा जी के चरण-रज (धूल) की वंदना करता हूं जिन्होंने भवसागर (सृष्टि) बनाया है जहां से एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्ट मनुष्य रूपी विष और मदिरा।
इस प्रकार देवता, ब्राह्मण, पंडित और ग्रह के चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर कहता हूं कि आप सभी प्रसन्न होकर मेरे सारे सुंदर मनोरथों को पूरा करें। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



