अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा…;2

..पांउ देइ एहि मारग सोई

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के चरित्र का वर्णन सरल, सुप्रेम और सुग्राह्य भाषा में किया है। रामायण के बारे में भी उन्होंने लिखा-रामायण सतकोटि अपारा…अर्थात भगवान राम के बारे में सैकड़ों करोड़ लोगों ने लिखा है अथवा उनका नाम लेते रहते हैं लेकिन रामकथा जे सुनत अघाहीं रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं। गोस्वामी तुलसीदास का मानना है कि इस राम कथा को चाहे जितना ही सुनते रहो लेकिन मन तृप्त नहीं होता और अधिक से अधिक सुनने की इच्छा होती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन लोगों को इसका रस-विशेष नहीं मिल पाता क्योंकि इस कथा के सुनने और समझने के सभी अधिकारी भी नहीं होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है कि राम कथा के तेइ अधिकारी, जिन्ह के सतसंगति अति प्यारी। इस सत्संगति का बहुत महत्व दर्शाया गया है। अच्छे लोगों का साथ और बुरे लोगों का साथ अलग-अलग प्रभाव डालता है। इसीलिए माता-पिता या अन्य अभिभावक बच्चों को समझाते रहते हैं कि हमेशा अच्छे दोस्त बनाओ। किसी दोस्त के बारे में शिकायत मिलती है तो उससे फौरन अलग रहने की सलाह देते हैं। इस तरह की कई समस्याओं का समाधान तुलसीदास की रामचरित मानस में दिया गया है और संभवतः यही कारण है कि रामायणों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय रामचरित मानस ही है। हम यहां पर क्रमबद्ध रूप से रामचरित मानस को उसके सरल अर्थों और अपने सामान्य ज्ञान से व्याख्या के साथ प्रस्तुत करेंगे।
राम कथा के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है कि ‘यह सुभ संभु उमा संवादा, सुख संपादन समन विषादा’ अर्थात इसमें भगवान शंकर ने माता पार्वती के समक्ष जो कथा सुनाई और माता पार्वती ने जिस प्रकार यह कथा सुनने की इच्छा जतायी, उसको बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसका रामचरित मानस नाम क्यों पड़ा और सबसे पहले किन महान लोगों ने इसका श्रवण किया, इसको भी बड़े रोचक ढंग से बताया गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं कहा है कि इस कथा का गायन और श्रवण भी इतनी आसानी से नहीं हो पाता। भगवान राम की कृपा जिस पर होती है वही इस कथा को कहता है और सुनता है।
अति हरि कृपा जाहि पर होई
पांउ देइ एहि मारग सोई।।
इस प्रकार इसे भगवान राम की कृपा ही मानेंगे कि हमारी प्रधान सम्पादक मनीषा स्वामी कपूर ने यह इच्छा व्यक्त की कि हम रामचरित मानस को उसकी चैपाइयों और दोहों का संकेत देते हुए क्रमबद्ध प्रस्तुत करें। गोस्वामी तुलसीदास पर हनुमान जी की कृपा हुई थी जिससे वह तमाम कष्टों से बचे और रामचरित मानस की रचना की। इतना ही नहीं हनुमान जी की कृपा से चित्रकूट में भगवान राम और लक्ष्मण के दो सुघड़़-सलोने राजकुमारों के रूप में दर्शन किये थे। यह भी होे सकता है कि हमारे इस प्रयास का कुछ लोग उपहास उड़ाएं, क्योंकि ऐसे लोगों की कमी नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे लोगों की ही सबसे पहले वंदना की है जो अपने सुख से सुखी नहीं होते बल्कि दूसरे के दुखी होने से ही उनको सुख-असीम आनंद मिलता है। ऐसे दुष्ट-असज्जन लोगों की अंत में क्या गति, हालत होती है, यह भी गोस्वामी तुलसी दास ने बड़े रोचक तरीके से बताया है जैसे- उपल अर्थात ओला फसलों पर गिरता है और फसल को बरबाद कर देता है लेकिन इस क्रम में उसका (ओले का) स्वयं ही विनाश भी हो जाता है। इसी प्रकार कुल्हाड़ी और चन्दन का एक उदाहरण दिया गया है। कुल्हाड़ी चंदन को काटती है जिस तरह दुष्ट लोग सज्जन व्यक्तियों को परेशान करते हैं। ऐसे दुष्ट होते हैं जो अकारण ही सज्जनों को परेशान करते हैं क्योंकि उनका गुण धर्म ही परेशान करना है। ऐसे दुष्टों को क्या नतीजा भुगतना पड़ता है, यह भी बताया गया है। कुल्हाड़ी के लिए पहले लोहे को आग में तपाया जाता है और फिर भारी वजनदार हथौड़े, जिसे घन कहा जाता है, उससे उसको पीटा जाता है जबकि जिस चंदन को वह कुल्हाड़ी काटती है, उसे घिस कर देवताओं के सिर पर लेपन किया जाता है।
राम चरित मानस में इस प्रकार के प्रसंगों के अनेक मणि-माणिक भरे हुए हैं। महर्षि भारद्वाज को महर्षि याज्ञवल्क्य ने और फिर पक्षीराज गरुण को काग भुशुण्डि ने उसी संवाद को सुनाया जो भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाया था। यह संवाद सिर्फ राम की कहानी भर नहीं है बल्कि हमारे जीवन की हर समस्या का समाधान भी है। इसमें एक संयुक्त परिवार में रहने की पावन परम्परा दिखाई गयी है। भाई-भाई के बीच किस तरह का प्यार होना चाहिए, यह दर्शाया गया है। आज के समय में अक्सर सुनने को मिलता है कि सम्पत्ति की खातिर अमुक व्यक्ति ने अपने सगे भाई की हत्या कर दी अथवा पिता, माता या चचेरे भाई-बहनों को मार डाला। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम के चरित्र के माध्यम से राम और भरत का उदाहरण दिया है। राम को उनकी सौतेली माता कैकेयी के कहने से 14 साल का वनवास दे दिया जाता है और कैकेयी के पुत्र भरत को युवराज बना दिया जाता है लेकिन जब यह बात भरत को मालूम होती है तो वह राजतिलक की साज-सामग्री लेकर चित्रकूट पहुंचते हैं जहां भगवान राम अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ वनवासी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राजा भरत हर प्रकार से प्रयत्न करते हैं कि राम राजा बनें लेकिन राम ने अपने पिता के वचनों को सत्य करने के लिए भरत को ही राजा बनने के लिए मजबूर किया। भाइयों का प्रेम देखिए कि ठीक 14 साल बाद जब राम वनवास की अवधि समाप्त करके अयोध्या लौटते हैं तो राजा भरत अपना राजमुकुट ज्येष्ठ भ्राता राम के सिर पर रख देते हैं। इसे ही राम राज्य कहा जाता है।
आज के समय में सत्ता के लिए लड़ने वालों की लम्बी कतार दिख जाती है। घर-परिवार में सम्पत्ति को हथियाने में लोग एक-दूसरे की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं। सम्पत्ति और सत्ता के लिए भाई-भाई का दुश्मन हो जाता है। रामचरित मानस में भी एक ऐसा उदाहरण आता है जब बालि अपने भाई सुग्रीव को मारपीट कर घर से भगा देता है। बालि सिर्फ सुग्रीव को मारकर ही भगा नहीं देता बल्कि उसकी पत्नी को भी छीन लेता है। मर्यादा का हनन करने वाले बालि को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम मृत्युदण्ड देते हैं। इस प्रकार के कितने ही रोचक और शिक्षाप्रद प्रसंग रामचरित मानस में भरे पड़े हैं। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की महिमा भी इसमें दर्शायी गयी है। इसीलिए राम चरित मानस की चैपाइयां एक वैदिक मंत्र की तरह लोग दोहराते हैं और अपने जीवन को धन्य बनाते हैं। आप सभी भी अपने जीवन को सार्थक करें- इसी कामना के साथ हम रामचरित मानस की यह शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं। -क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर

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