
रामचरित मानस एक आदर्श, आशीर्वाद देने वाला और सभी की समझ में आने वाला प्रबंधकाव्य है लेकिन इसके गूढ़ अर्थ भी हैं जिन पर बड़े-बड़े विद्वान रात-दिन चर्चा-परिचर्चा भी करते हैं। सामान्य श्रद्धालु मानस की प्रत्येक चैपाई, दोहा, सोरठा और श्लोक को एक मंत्र की तरह जपते हैं। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने तथा इसमें दिये गये उपदेशों का मनन करने और उसके अनुसार आचरण करने से जीवनशैली में स्पष्ट बदलाव दिखाई पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास और अन्यान्य भगवत भक्तों ने भगवान श्रीराम और माता सीता की कृपा से उनकी दिव्य लीलाओं का संभवतः प्रत्यक्ष अनुभव भी किया है तो दूसरे लोग भी उसी भाव से इस कथा को सुनकर उसी तरह का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। इसलिए रामचरित मानस के विषय में जब यह कहा जाता है कि इसकी रचना साक्षात भगवान शंकर और मां पार्वती की आज्ञा से की गयी और भगवान शंकर ने ही सत्यं, शिवं, सुन्दरम् लिखा तो इस प्रकार का अलौकिक प्रभाव कोई आश्चर्य की बात नहीं है। भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है। हमारी भारतीय संस्कृति में वैसे भी प्रत्येक कार्य की शुरुआत ईश वंदना से होती है। शादी-व्याह जैसे संस्कारों के कार्ड पर सबसे पहले ‘वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि सम प्रभः, निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा’ या सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके…’ लिखा होता है। इसका मतलब है कि हम जिस काम को करने जा रहे हैं उसमें देवगण हमारी सहायता करें और किसी प्रकार की
बाधा न उत्पन्न होने दें। गोस्वामी तुलसी दास ने भी रामचरित मानस की रचना करने से पहले विघ्न-विनाशक भगवान गणेश को नमस्कार किया और जानकी वल्लभ भगवान राम का आह्वान करते हुए उनको विराजमान रहने की प्रार्थना की। तत्पश्चात मां सरस्वती की
आराधना की क्योंकि हमारी वाणी अर्थात् बोली को मां सरस्वती का ही आशीर्वाद मिलता है, तभी उससे अच्छे विचार प्रकट होते हैं। इस प्रकार मां सरस्वती और विघ्न विनाशक गणेश की वंदना से रामचरित मानस का बालकाण्ड प्रारम्भ होता है।
वर्णानामर्थ संधानां रसानां छन्द सामपि’
मंगलानाम च कत्र्तारौ वन्देवाणी विनायको।
अर्थात् अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों (कल्याण समूह) को प्रदान करने वाली मां सरस्वती और भगवान गणेश जी की मैं वंदना करता हूं। वाणी साक्षात् सरस्वती का रूप है। इस वाणी से हम किसी को अपना प्रिय बना लेते हैं और किसी को अपना दुश्मन भी बना लेते हैं। संत कबीर ने कहा है कि ऐसी वाणी बोलिए कि मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपुहिं शीतल होय।’ अर्थात् शब्दों का चयन भी बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। कभी-कभी अचानक कोई ऐसी बात मुंह से निकल जाती है कि हमको साॅरी बोलना पड़़ता है। बिना बोले तो काम नहीं चलता इसलिए मां सरस्वती की आराधना किसी भी रचना से पहले करने का विधान बनाया गया है। स्कूल-कालेजों का वार्षिकोत्सव हो या कोई अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम तो सबसे पहले मां सरस्वती के चित्र के सामने दीप जलाया जाता है और सरस्वती वंदना की जाती है। इसी प्रकार भगवान गणेश को उनके पिता भगवान शंकर और मां पार्वती ने ही सर्वप्रथम पूज्य का आशीर्वाद दिया था। इसलिए सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन किया जाता है और ऐसा माना जाता है कि इससे कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़ती है। भगवान गणेश का एक नाम विघ्न विनाशक भी है।
गोस्वामी तुलसीदास ने मां सरस्वती और गणेश की वंदना करने के पश्चात मां पार्वती और भगवान शंकर की वंदना की है।
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वास रूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम।।
अर्थात् श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप भगवान शंकर और माता पार्वती की मैं वंदना करता हूं जिनके बिना सिद्धजन अपने अंतः करण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते। श्रद्धा और विश्वास हमारे जीवन में कार्यकलाप को बहुत प्रभावित करते हैं। सामान्य रूप से ये दोनों शब्द एक जैसे ही दिखते हैं। हमारी किसी के प्रति श्रद्धा है तो हम उसका सम्मान करते हैं, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं और उसका आशीर्वाद लेकर ही कोई कार्य करते हैं। इसी प्रकार विश्वास भी एक तरह की श्रद्धा ही है क्योंकि किसी पर विश्वास करके हम निश्चिंत हो जाते हैं। उदाहरण के लिए हमारे पर्स में लाखों रुपये हैं। हम उनको संभाल कर रखे हुए हैं लेकिन तत्काल कोई और काम करने के लिए हमे जाना है जहां हम वह पर्स नहीं ले जा सकते तो उसे किसी ऐसे व्यक्ति को सौंप देते हैं जिस पर हमारा विश्वास है कि वह उस पर्स को उसी तरह से सुरक्षित रखेगा जैसे कि मैं रखे हुए था। यह विश्वास हमें जीवन के पग-पग पर करना होता है और जब कोई उस विश्वास को तोड़ देता है तो बहुत कष्ट पहुंचता है। कभी-कभी इसके चलते लड़ाई-झगड़े, मारपीट, मुकदमे और यहां तक कि हत्या तक कर दी जाती है। इसलिए श्रद्धा और विश्वास का भाव बहुत महत्वपूर्ण है जो अलग अलग रूप में दिखने के बाद भी एक ही तथ्य की तरफ इंगित करता है। हम जिस पर श्रद्धा कर रहे हैं, उस पर विश्वास करें। भगवान शंकर को इसीलिए अर्द्ध नारीश्वर नाम दिया गया है क्योंिक उनका आधा शरीर नर का और आधा स्वरूप नारी का है। अर्थात् मां पार्वती उनके शरीर का ही एक अंग हैं। श्रद्धा-विश्वास एक दूसरे से इसी प्रकार जुड़े हुए हैं। ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास दोनों का होना जरूरी है तभी हम उसकी अनुभूति कर सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान शंकर और मां पार्वती की विश्वास और श्रद्धा के रूप में इसीलिए वन्दना की क्योंकि श्रद्धा और विश्वास के अभाव में सिद्धजन भी अपने अन्तःकरण (हृदय) में स्थित ईश्वर को नहीं देख पाते हैं। इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास ने यह भी कह दिया कि ईश्वर कहीं और नहीं हमारे हृदय में ही स्थित है लेकिन उसको देखने के लिए ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए।
मंगलाचरण के क्रम में ही भगवान शंकर की वंदना करते हुए कहा गया है-
वंदे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणाम्
यमाश्रितो हि वक्रोअपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।
अर्थात् ज्ञानमय, नित्य शंकर रूपी गुरू की मैं वंदना करता हूं जिनके आश्रित होने से टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वंदित (सम्मानित) होता है। हमारे पौराणिक ग्रंथों में भगवान शंकर को आदिदेव कहा गया है अर्थात् सबसे पहले के देवता वही हैं क्योंकि सभी ज्ञान की बातें उन्होंने ही सिखाई हैं। इस नाते वह परम गुरू भी हैं। अनादिकाल से चले आ रहे है, इसलिए वे नित्य हैं। गुरू के रूप में उनकी वंदना का तात्पर्य भी यही है कि हम भगवान शंकर की दी गयी शिक्षाओं को ग्रहण करें। उनके आश्रित होने पर वक्र चन्द्रमा भी सम्मानित किया जाता है। यह एक प्रतीक है क्योंकि हमारे पर्व-त्योहारों में गणेश चतुर्थी, करवा चैथ, संकटहरण चतुर्थी जैसे कई व्रत हैं जब चन्द्रमा को देखकर पूजन किया जाता है। चन्द्रमा की गतियों को ही देखकर कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष बनाये गये हैं। चन्द्रमा की जिन तिथियो में पूजा होती है, उनमें उसका आकार एक चैथाई होता है, इसलिए उसे वक्र चन्द्रमा कहा जाता है लेकिन वक्र का एक अर्थ दुर्गुणों के लिए भी है। कोई व्यक्ति अधिक क्रोध करता है या दबंगों जैसा व्यवहार करता है तो उसे भी वक्र अर्थात् टेढ़ा आदमी कहते हैं। ऐसे लोग समाज के लिए दुखदायी होते हैं और लोग उनसे दूर-दूर रहना ही अच्छा समझते हैं, टेढ़े लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि भगवान शंकर ऐसे गुरू हैं कि उनके सानिध्य में रहकर टेढ़े लोग भी वंदनीय हो जाते हैं और उनका अवगुण दूर हो जाता है। इस प्रकार गुरू कैसा होना चाहिए, इसका महत्व भी मंगलाचरण में गोस्वामी तुलसीदास ने बताया है।-क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



