अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा… 7

चलता-फिरता प्रयागराज है संत समाज

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में गुरु की महिमा के साथ ही साधु-संतों का महत्व बताया है।
साधु-संतों की पहचान भी तभी हो सकती है जब नेत्रों में अच्छा और बुरा देखने की शक्ति होगी। इसीलिए तुलसीदास ने कहा कि ‘जथा सुअंजन अंजि दृग, साधक, सिद्ध सुजान, कौतुक देखत सैल, बन, भूतल, भूरि निधान। आंखों से हम सामान्य रूप से देखते हैं लेकिन उनकी ज्योति उम्र बढ़ने के साथ कम होने लगती है। इसीलिए पहले
औषधीय गुण वाला अंजन लगाया जाता था। वर्तमान पीढ़ी के लिए यह बातें इतिहास बन चुकी हैं। अंजन, सुरमा और काजल बचपन से ही लगाने की परम्परा रही है। आज के बच्चों को यह गाना तो याद होगा-बन्नो तेरी अंखिया सुरमेदानी लेकिन सुरमा के बारे में नहीं जानते सुरमा जिसमें रखा जाता था वह
सुरमेदानी बड़ी सुंदर आंख के समान ही होती थी। गोस्वामी तुलसीदास ने गुरू के आशीर्वाद के रूप में इसका उल्लेख किया है।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन, नयन अमिय दृग दोष विभंजन
तेहिकर विमल विवेक विलोचन, वरनउं रामचरित भव मोचन।
अर्थात श्री गुरु महाराज के चरणों की धूल कोमल और सुंदर नेत्रों के लिए अमृत के समान अंजन है जो नेत्रों के दोष को दूर करने वाला है। उस अंजन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार रूपी बंधन से छुड़ाने वाली रामकथा अर्थात रामचरित का वर्णन करता हूं।
बंदउं प्रथम महीसुर चरना, मोह जनित संसय सब हरना।
सुजन समाज सकल गुनखानी, करउं प्रनाम सप्रेम सुबानी।।
अर्थात पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूं जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को दूर करने वाले, हरण करने वाले हैं, फिर सभी गुणों की खान संत समाज को प्रेम सहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूं।
साधु चरित सुभ चरित कपासू, निरस, विसद गुनमय फल जासू।
जो सहि दुख पर छिद्र दुरावा, वंदनीय जेहिं जग जस पावा।
मुद मंगल मय संत समाजू, जो जग जंगम तीरथ राजू।
राम भक्ति जहां सुरसरि
धारा, सरसइ ब्रह्म विचार प्रचारा।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि संतों के समागम से हमारा जीवन धन्य हो जाता है, उसमें जो भी विकार होते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। संतों के बारे में उन्होंने कहा कि ‘संत हृदय नवनीत समाना, कहा कबिन पर कहत न जाना। निज परिताप द्रवहि नवनीता, पर दुख द्रवहि संत सु पुनीता। अर्थात संत दूसरों के दुख से द्रवित होते हैं। संतों का चरित्र कपास के समान होता है। कपास अर्थात रुई से सभी परिचित होंगे इसके धागे से वस्त्र बनते हैं और रुई की बत्ती बनाकर आरती की जाती है। रुई कपास के पौधे से प्राप्त होती है। इसका फल कड़ा होता है और उसे खाया नहीं जा सकता देखने में भी भद्दा लगता है लेकिन उस फल के अंदर सफेद मुलायम रुई होती है। इसी प्रकार संत ऊपरी तौर पर कठोर नजर आते हैं लेकिन उनका हृदय स्वच्छ और मुलायम रुई की तरह ही होता है। कपास का फल जिस तरह से नीरस होता है उसी तरह संतों में विषय-वासना नहीं होती। संत का हृदय अज्ञान और पाप रूपी अंधकार से रहित होता है, इसलिए वह दूसरे को ज्ञान देता है। कपास में जिस तरह से गुण अर्थात तंतु होते हैं, उससे धागा बनता है, आरती की बत्ती बनती है उसी तरह संत का हृदय भी सदगुणों का भण्डार होता है। संतों का हृदय गुणों से भरा हुआ है। कपास के अंदर भरी रुई जिस तरह धागा बनाते समय काती जाती है, बुनी जाती है या ऐंठकर बत्ती बनायी जाती तो अनेक प्रकार के कष्ट सहन करती है। इसके बावजूद बत्ती बनकर जलती है। रुई का धागा सुई के द्वारा बनाये गये छेद को भर देता है, इसी प्रकार संत दूसरे की बुराइयों को उनके अवगुणों को अपने ज्ञान रूपी धागे से भर देते हैं। इस प्रकार संत स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों की भलाई करते हैं, इसलिए संत वंदनीय है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि संतों का समाज आनंद एवं कल्याणमय है जो इस जगत में चलता-फिरता तीर्थराज संगम है। इस संत समाज रूपी संगम में राम भक्ति रूपी गंगा नदी है जो ब्रह्म के बारे में निरंतर प्रचार करती रहती है।
विधि निषेधमय कलिमल हरनी, करमि कथा रविनंदनि बरनी
हरि हर कथा विराजत बेनी, सुनत सकल मुद मंगल देनी।।
और हमें जीवन में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए यह बात भी संत समाज के तीर्थराज में पता चलती है। हमारे पौराणिक गं्रथों में यह बताया गया है। इसीलिए इसे विधि निषेधमय कहा गया है। वेद, पुराण स्मृति में ये बातें भरी पड़ी हैं। सभी लोग तो इनका अध्ययन नहीं कर पाते, इसलिए चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग, जो संतों के रूप में होता है, वह हमें यह बताता है। संतों के बीच यह सूर्य पुत्री यमुना की धारा है और भगवान विष्णु और शंकर की कथाएं त्रिवेणी के समान हैं। तीर्थराज प्रयाग उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में है। यहां पर तीन नदियों का संगम बताया जाता है। गंगा और यमुना तो प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती हैं लेकिन तीसरी नदी सरस्वती अदृश्य रूप मे हैं। प्राचीनकाल में यह बहुत पवित्र नदी मानी गयी थी और वर्तमान पंजाब प्रांत से बहती हुई इलाहाबाद में गंगा और यमुना से मिल गयी। इसी सरस्वती नदी के तट पर बड़े-बड़े संत महात्माओं ने निवास कर वैदिक ग्रंथों की रचना की।
तीर्थराज प्रयाग का आज भी बहुत महत्व है। यहां पर कुंभ और अर्धकुंभ का आयोजन होता है जो डेढ़-दो महीने तक चलता है। देश-विदेश से लोग यहां स्नान करने आते हैं। इसके अतिरिक्त माघ महीने (जनवरी-फरवरी) में कल्पवास किया जाता है। संगम के तट पर तमाम गृहस्थ भी एक महीने तक निवास करते हैं और संगम स्नान का पुण्य कमाते हुए साधु-संतों के प्रवचन का लाभ उठाते हैं। वहां का अलौकिक वातावरण और रहन-सहन देखकर हर व्यक्ति सांसारिक दुखों को भूल जाता है। गंगा-यमुना और सरस्वती का यह संगम चलते-फिरते संत समाज में ही मिल सकता है अन्यथा प्रयाग राज जाकर स्वयं इसकी अनुभूति की जा सकती है। इसी तीर्थराज प्रयाग में-
बटु विस्वास अचल निज
धरमा, तीरथराज प्रयाग सुकरमा।
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा, सेवत सादर समन कलेसा।।
अर्थात उस संत समाज रूपी प्रयागराज में अपने धर्म में अटल विश्वास की प्राप्ति उसी तरह होती है जैसे प्रयाग में अक्षयवट कई वर्षों से वहां लगा हुआ है। यह संत समाज हमें सभी देशों में सब जगह सभी को सहज रूप में मिल सकता है। इस संत समाज का हम आदर करें तो हमारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।
अकथ अलौकिक तीरथ राऊ, देह सद्यफल प्रगट प्रभाऊ। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि संत समाजरूपी तीरथ राज की महिमा का पूरी तरह से वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इसकी महिमा इतनी ज्यादा है कि यह अकथ अर्थात कहने में सीमित नहीं है। इसकी महिमा अलौकिक है और इससे तुरंत (सद्य) फल मिलता है। इसलिए संतों के समागम से हम अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

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