लेखक की कलम

सवालों के घेरे में एकनाथ शिंदे

सियासत की राह सीधी नहीं, ऊबड़-खाबड़ होती है। इस राह पर चलते हुए बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। कदम जरा सा इधर-उधर पड़ा अथवा निगाह चूकी तो लड़खड़ाते और गिरते देर नहीं लगती। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं। इसीलिए शिवसेना मंे सबसे बड़ा गुट बनाने मंे सफल हुए और मुख्यमंत्री की कुर्सी भी मिली लेकिन उस समय भी उनको मालूम था कि सावधानी अंदर भी रखनी पड़ेगी। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते भाजपा के साथ दुबारा सरकार बनाने का प्रयास भी किया लेकिन देवेन्द्र फडणवीस ने इस बार डिप्टी सीएम बनने पर मजबूर कर दिया। नयी सरकार मंे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से टूट कर आये अजित दादा के साथी भी शामिल हुए। इस प्रकार महायुति की सरकार चल रही है लेकिन घटक दलों का अपना-अपना समीकरण है। अजित दादा के दुर्घटना में निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार डिप्टी सीएम की कुर्सी संभाल रही हैं। इस बीच एकनाथ शिंदे और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस, के बीच तनातनी की खबरें भी आती रही हैं। अब मराठा आंदोलन, जो आरक्षण को लेकर हुआ, उसके नेता मनोज जरांगे पाटिल ने गत 20 अक्टूबर को बीड में आयोजित एक कार्यक्रम मंे ऐसी आडियो क्लिप सुनाई जिससे एकनाथ शिंदे बुरी तरह घिर गये हैं। इस आडियो क्लिप मंे एक महिला यह दावा करती सुनाई पड़ती है कि एकनाथ शिंदे के बेटे सांसद श्रीकांत शिंदे ने मराठा आंदोलन दबाने के लिए जरांगे को पांच सौ करोड़ रुपये दिये। यह आडियो 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले का बताया जाता है। एकनाथ शिंदे और मनोज जरांगे पाटिल- दोनों ने इस आडियो क्लिप की निष्पक्ष जांच कराने को कहा है। शिवसेना (शिंदे) के विधायक ने इसे एकनाथ शिंदे के खिलाफ साजिश बताया है।
मनोज जरांगे पाटिल ने 20 अक्टूबर को बीड जिले में आयोजित एक कार्यक्रम में एक ऑडियो क्लिप सुनाई थी, जिसमें एक महिला यह दावा करती सुनाई दे रही है कि जारांगे को श्रीकांत शिंदे के जरिए 500 करोड़ रुपये दिए गए हैं। जारांगे ने आरोप लगाया कि उन्हें और उनके आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। जरांगे का दावा था कि यह ऑडियो 2024 के विधानसभा चुनाव के पहले का है। ऐसा इसलिए किया गया था कि ताकि मराठा वोटर्स को प्रभावित किया जा सके। मनोज जरांगे पाटिल ने भी इस मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की है। एकनाथ शिंदे ने कहा कि अगर जरांगे पाटील के पास कोई सबूत हैं, तो उन्हें संबंधित एजेंसियों को सौंपना चाहिए। मामले की जांच होनी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। एकनाथ शिंदे ने दिल्ली में यह बयान दिया।
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल के 500 करोड़ रुपए के कथित लेन-देन वाले दावे पर सियासत तेज है। इस मामले की वजह से महायुति के दल शिवसेना और भाजपा के बीच भी तल्खी दिख रही है। जरांगे ने आरोप लगाया था कि मराठा आंदोलन को रोकने और उन्हें चुप रहने के लिए 500 करोड़ रुपए का ऑफर दिया गया था। उनका आरोप था कि यह ऑफर राज्य के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के बेटे और शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे की तरफ से दिया गया था। इस दावे के बाद राज्य की सियासत में भूचाल आ गया। बीजेपी और शिवसेना के नेता भी इस मामले में आमने-सामने नजर आ रहे हैं। हालांकि महाराष्ट्र में जारी इस सियासी घमासान पर ब्रेक लगाने की तैयारी भी दिख रही है। सीएम देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले में जांच की बात कही है, उनका कहना है कि ढाई साल बाद यह ऑडियो क्लिप सामने क्यों लाई गई। इसका पता लगाया जाएगा। ऑडियो की जांच कराई जाएगी, ताकि मामला क्लीयर हो सके। मनोज जरांगे पाटिल के दावे पर महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने जांच के आदेश दिए हैं। उनका कहना है कि इस ऑडियो क्लिप के जरिए किसे टारगेट किया जा रहा है? इन सभी पहलुओं की जांच की जाएगी। इस ऑडियो की भी फॉरेंसिक जांच होगी। फडणवीस ने कहा कि ऑडियों में बीजेपी के कुछ नेताओं के भी नाम लिए गए हैं, उन नेताओं से भी पूछताछ की जा रही है। भाजपा और शिवसेना दोनों दलों की तरफ से इस ऑडियों के जांच की मांग हुई है। इसलिए इसकी सच्चाई सामने लाई जाएगी।
मनोज जरांगे पाटिल का अनशन खत्म हो चुका है। इस बीच मराठा आरक्षण आंदोलन का केंद्र बने जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव से मनोज जरांगे के अनशन के लिए बनाया गया मंडप और मंच भी हटा दिया गया है। करीब तीन साल से ज्यादा समय तक आंदोलन का केंद्र रहा यह मंडप अब इतिहास बन गया है। हालांकि मनोज जरांगे पाटिल ने साफ कर दिया है कि मंच भले हट गया हो, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने सरकार को तीन महीने का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन पाटोदा से आगे बढ़ते हुए मुंबई तक पहुंच सकता है।
जालना जिले का अंतरवाली सराटी गांव मराठा आरक्षण आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। 29 अगस्त 2023 को शुरू हुए आंदोलन के दौरान यहां अनशन के लिए एक मंडप और विशाल मंच बनाया गया था। लगभग तीन साल और 27 दिनों तक यह मंच आंदोलन का प्रतीक बना रहा लेकिन अब ग्राम पंचायत, स्थानीय ग्रामसभा और आंदोलन की कोर कमेटी के बीच हुई चर्चा के बाद इस मंच को हटाने का फैसला लिया गया। निर्णय के कुछ घंटों के भीतर ही पूरा मंडप और मंच हटा दिया गया। हालांकि मनोज जरांगे का कहना है कि अब आंदोलन राज्य के किसी भी हिस्से में हो सकता है। चाहे वह येवला हो, परली हो, पाटोदा हो या फिर पश्चिम महाराष्ट्र का कोई इलाका। आंदोलन जारी रहेगा और जरूरत पड़ने पर इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाया जाएगा। मनोज जरांगे पाटिल ने अंतरवाली सराटी के ग्रामीणों का आभार भी व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान गांव के लोगों ने हर संभव सहयोग किया। कई लोगों ने अपनी जमीन आंदोलन के लिए उपलब्ध कराई, तो कई लोगों ने संघर्ष के दौरान कठिनाइयों का सामना किया। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन सिर्फ एक गांव का नहीं बल्कि पूरे मराठा समाज के अधिकारों का आंदोलन है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।
हालांकि इसी गांव की ललिता तारख ने अब मनोज जरांगे पाटील के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि 29 अगस्त को जब आंदोलन शुरू हुआ था, तब वे खुद जरांगे के साथ थीं और उनके चैथे अनशन को खत्म कराने में भी उनकी भूमिका रही थी। तारख का कहना है कि आंदोलन के दौरान गांव के लोगों ने दिन-रात मेहनत की। चाय-पानी, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी गांव वालों ने संभाली, लेकिन बदले में उन्हें कोई फायदा नहीं मिला। ललिता तारख ने कहा कि अंतरवाली सराटी में हैदराबाद गजट के आधार पर कुणबी प्रमाणपत्र के लिए उन्होंने आवेदन किया था। आवेदन किए हुए करीब दस महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक कोई लाभ नहीं मिला। उन्होंने सवाल उठाया कि आंदोलन के नाम पर लगातार आश्वासन दिए गए, लेकिन जिन लोगों ने आंदोलन को सफल बनाने के लिए संघर्ष किया, उन्हें आज तक आरक्षण का प्रत्यक्ष लाभ क्यों नहीं मिला। उन्होंने मांग की कि मनोज जरांगे इस सवाल का जवाब दें।
ललिता तारख ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान महिलाओं की भावनाओं का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि गांव की माताएं और बहनें आंदोलन स्थल पर रात-रात भर रुकती थीं लेकिन आज उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। तारख ने कहा कि आंदोलन के दौरान लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ा गया, लेकिन अब उन्हें लगता है कि उनसे किए गए कई वादे पूरे नहीं हुए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि अंतरवाली सराटी ही नहीं, बल्कि 123 गांवों के लोगों को भी आंदोलन के
नाम पर उम्मीदें दिखाई गईं। अब, आंदोलन खत्म करने के नाम पर पांच करोड़ का मामला सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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