अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा…

रामकथा की प्रथम श्रोता

रामकथा को अमर बनाने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस को भगवान शिव और माता पार्वती के बीच संवाद बताया है। हालांकि यह सवाल भी अनसुलझा है कि रामचरित मानस का प्रथम श्रोता कौन था?
रचि महेश जिन मानस राखा। पाइ सुसमय सिवा सन भाषा।
ताते रामचरितमानस वर। धरेउ नाम हियॅ हेरि हरषि हर।
उपरोक्त चैपाई के अर्थ से यह ज्ञात होता है, कि भगवान शिव ने मानस की रचना करने के पश्चात उसे सर्व प्रथम माता पार्वती जी को सुनाया। परन्तु
सुनु शुभ कथा भवानि, रामचरितमानस विमल।
कहा भुसुण्डि बखानि, सुना बिहग नायक गरूण।
इस सोरठे के भाव से यह सिद्व होता है, कि शिव जी के द्वारा माता पार्वती को यह कथा सुनाने के पूर्व ही, इस राम कथा को श्री कागभुसुण्डि जी महाराज ने कहा, जिसे पक्षीराज गरूण जी महाराज ने सुना था।
यह प्रश्न बड़ा गंभीर है, कि श्रीरामचरितमानस का सर्वप्रथम श्रोता किसे ठहराया जाए। मानस के रचयिता शिवजी हैं, यह बात तो बिल्कुल निर्विवाद है, परन्तु उन्होंने मानस की रचना करने के बाद सर्व प्रथम उसे कागभुसुण्डी जी को प्रदान किया अथवा माता पार्वती जी को सुनाया।
इस बात का निर्णय करने के लिए जब हम सम्पूर्ण मानस ग्रन्थ की छान-बीन करते हैं, तो यही पता चलता है, कि शिवजी ने जिस समय यह कथा माता पार्वती जी को सुनायी थी, उसके प्रथम ही वे स्वयं नीलगिरि पर्वत पर कागभुसुण्डी जी के आश्रम पर जाकर हंस रूप से उस कथा को सुन आये थे, और काग भुसुण्डी जी, जिन्होंने हंसरूप भगवान शिवजी को यह कथा सुनायी थी, श्री गरूण जी के प्रति यह कथन किया है, कि उन्हे यह कथा रामचरितमानस आज से सत्ताइस कल्प पहले भगवान शिवजी की कृपा से महर्षि लोमश ऋषि के द्वारा प्राप्त हुई थी। इन सभी बातों का प्रमाण श्रीरामचरितमानस में ही मौजूद है।
सुन शुभ कथा भवानि, रामचरितमानस विमल।
कहा भुसुण्ड बखानि सुना बिहग नायक गरूण।
सो संवाद उदार जेहिं विधि भा आगे कहब।
सुनहु राम अवतार चरित परम सुन्दर अनघ।
उत्तरकाण्ड में पुनः शिवजी का वचन माता पार्वती के प्रति,
जिसमें उनके हंस रूप होकर काग भुसुण्डी जी से कथा सुनने का प्रमाण है।
तब कछु काल मराल तनु धरि तहॅ कीन्ह निवास।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउॅ कैलाश।
उत्तरकाण्ड में श्री कागभुसुण्डी जी का कथन, जिसमें सत्ताइस कल्प पहले श्रीरामकथा प्राप्त होने की बात है।
इहाॅ बसत मोहि सुनु खग ईसा।
बीते कलप सात अरू बीसा।
उत्तरकाण्ड में ही श्री लोमश जी का वचन श्रीकागभुसुण्डी जी के प्रति है-
रामचरित सर गुप्त सुहावा।
शंभू प्रसाद तात मैं पावा।
तोहि निज भगत राम कर जानी।
ताते मै सब कहेउॅ बखानी।
अब इन घटनाक्रमों को जोड़ दें तब समझ मंे आता है-
रचि महेश निज मानस राखा।
पाइ सुसमउ शिवा सन भाषा।
शंभु कीन्ह यह चरित सुहावा।
बहुरि कृपा करि उमहिं सुनावा।
सोई सिव कागभुसुण्डुहिं दीन्हा।
राम भगत अधिकारी चीन्हा।
तेहिं सन जगबालिग पुनि पावा।
तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।
इन चैपाइयों में ‘शिवा सन भाषा’ और ‘उमहिं सुनावा’ के पश्चात् सोइ शिव कागभुसुण्डहिं दीन्हा। पढ़ने पर यह अनुमान होने लगता है कि पहले पहल माता पार्वती जी को ही यह श्रीराम कथा रूपी महाप्रसादी प्राप्त हुई थी, इसलिए इस विरोधाभास का निराकरण करने के लिए दो बातों का आधार दिखलाते हुए निर्णय लिया जा रहा है। वे दोनो बातें निम्नलिखित हैं।
पहली बात तो यह है कि इस श्रीरामचरितमानस की रचना जब शिव जी ने की, तब वह भुसुण्डि आश्रम का निर्माण होने के सत्ताइस कल्प पहले किस कल्प में हुए अवतार चरित्र के आधार पर रचा गया था। जब हम इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हैं, तो पता चलता है कि जिस कल्प में श्री नारद जी को मोह और उनके शाप के द्वारा भगवान विष्णु का श्रीराम रूप में अवतार हुआ था, उसी कल्प में श्रीरामचरितमानस की रचना हुई थी। इसका प्रमाण उत्तरकाण्ड की चैपाइयां है जो मानस के मुख्य हृदय में हैं, एवं जिनमें काग भुसुण्डि द्वारा श्री गरूण जी को पूरा श्रीरामचरितमानस सुनाने की बात वर्णित है।
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी।
रामचरित सर कहेसि बखानी।
पुनि नारद कर मोह अपारा।
कहेसि बहुरि रावन अवतारा।
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई।
तब शिशु चरित कहेसि मन लाई।
इसका तात्पर्य यह कि जिस श्रीरामचरितमानस को भगवान शिव ने लोमश ऋषि द्वारा काग भुसुण्डि को प्रदान किया था, उसमे रामावतार हेतु केवल नारदमोह ही था। उस चरित में नारद के शाप से ही दो शिव गण रावण और कुम्भकरण हुए थे, और जब शिवजी ने माता पार्वती जी को उस चरित्र को सुनाया है, तब अवतार हेतु कथन में नारद मोह के साथ ही साथ तीन कल्पों के तीन और हेतुओं को भी शामिल कर दिया गया। वे कारण इस प्रकार हैं। जय और विजय का रावण व कुम्भकरण होना, दूसरा जालन्धर राक्षस का रावण होना और तीसरा राजा भानुप्रताप और उनके भाई अरिमर्दन का रावण और कुम्भकरण होना।
बालकाण्ड में चार कल्पों के चारों हेतुओं का प्रमाण मौजूद है। अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि भगवान शिव ने श्रीरामचरितमानस को नारद मोह के हेतु से हुए अवतार काल में ही रचकर निज मानस में रख लिया था और माता पार्वती को जन कल्याण करने वाली उसी कथा को प्रसंग सहित सुनाया -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

 

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