क्यों कहते हैं, गणेश जी को महोदर और गजानन

आदि देव गणेश की महिमा और एकदन्तावतार के महात्मय के बारे में पहले आपको बताया था। आज हम गणेश जी को महोदर और गजानन क्यों कहा जाता है इस सम्बन्ध में एक कहानी सुनायेंगे और उनका स्तुति मंत्र और उसका अर्थ भी बतायेंगे। महोदर भगवान का स्तुति मंत्र है-
महोदर इति ख्यातो ज्ञानब्रह्मप्रकाशकः।
मोहासुरस्य शत्रुवै आखुवाहनगः स्मृतः।।
अर्थात भगवान श्री गणेश का महोदर नाम ब्रह्म ज्ञान के प्रकाशन यानि फैलाने वाले देवता के रूप में प्रसिद्ध है। उन्हें मोहासुर अर्थात मोह नामक दुर्गुण का विनाशक भी माना जाता है। इनका वाहन मूषक बताया गया है।
दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के एक शिष्य का नाम मोहासुर था। उनके आदेश से मोहासुर ने सूर्य भगवान की आराधना की। उसकी कठोर तपस्या से सूर्य भगवान प्रसन्न हो गये और उन्होंने सर्वत्र विजयी होने का वरदान दिया।
भगवान से वर प्राप्त करने के बाद मोहासुर खुश होकर अपने स्थान पर लौट गया। शुक्राचार्य ने उसका दैत्यराज के पद पर अभिषेक किया। उसके बाद अपने असीमित पराक्रम से उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। देवता और ऋषि मुनि पहाड़ों एवं जंगलों में छुप गये। अब वह निश्चिन्त होकर अपनी पत्नी मदिरा के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।
उसके तीनों लोकों पर अधिपत्य के कारण धर्म सत्कर्म, यज्ञ, तप आदि सब नष्ट हो गये। देवता और ऋषि, मुनि दुःखी होकर सूर्य भगवान के पास गये और इस भयानक कष्ट का उपाय पूछा। तब भगवान सूर्य ने एकाक्षर मन्त्र देकर भगवान गणेश को प्रसन्न करने की सलाह दी। तत्पश्चात देवताओं और मुनियों ने श्रद्धापूर्वक भगवान महोदर की उपासना की। उनकी आराधना और तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान महोदर प्रकट हुए और उन्हें आश्वस्त किया कि वे मोहासुर का वध करेंगे। महोदर भगवान ने देवताओं को निश्चिन्त रहने के लिए कहा। देवताओं को समझाकर महोदर भगवान मोहासुर से युद्ध करने के लिये चल पड़े। अब यह सूचना देवर्षि नारद ने मोहासुर को दी तथा अनन्त पराक्रमी समर्थ महोदर के स्वरूप की ताकत को भी उसे समझाया। दैत्यगुरू शुक्राचार्य ने भी मोहासुर को महोदर भगवान की शरण में जाने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने भी भगवान महोदर का दूत बनकर मोहासुर को समझाया, ‘कि तुम्हें अनन्त शक्ति सम्पन्न भगवान महोदर से मित्रता कर लेनी चाहिए। इसी में तुम्हारा कल्याण है। तुम देवताओं और ऋषि मुनियों को शान्ति से जीवन यापन करने दो तो प्रभु तुम्हें क्षमा कर देंगे और यदि तुम रणभूमि में उनके समक्ष युद्ध करोगे तो तुम्हारी रक्षा असम्भव है। यह सुनते ही मोहासुर का अहंकार नष्ट हो गया। उसने भगवान विष्णु से निवेदन किया कि आप परम प्रभु भगवान महोदर को मेरे नगर में लेकर आइये और मुझे उनके दर्शन का अवसर प्रदान करें।
उसके निवेदन से भगवान महोदर ने स्वीकार किया और वे मोहासुर के नगर में गये जहां मोहासुर ने उसका अभूतपूर्व स्वागत किया। उनकी श्रद्धापूर्वक स्तुति करते हुये उसने कहा, ‘हे प्रभु अज्ञानवश मेरे द्वारा जो अपराध हुआ है उसके लिये मैं क्षमता मांगता हूँ। मैं आपके प्रत्येक आदेश का पालन करने का वचन देता हूँ। अब मैं देवताओं और मुनियों के पास भूलकर भी नहीं जाऊँगा उनके धर्माचरण में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचाऊँगा।
भगवान महोदर उसकी श्रद्धा-भक्ति और विनम्रता पर प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसे अपनी शरण में ले लिया देवताओं और ऋषि-मुनियों का जीवन शान्त होकर आराम से चलने लगा वे सुखी हो गये। देवतागण भगवान महोदर की स्तुति करने लगे।
गजानन क्यों कहते कहते हैं गणेश जी को
हमने आपको महोदर भगवान का स्तुति मंत्र और उनकी कहानी आपको सुनाई है। अब हम आपको गणेश जी के गजानन स्वरूप का स्तुति मंत्र और उससे सम्बन्धित कहानी आपको सुनायेंगे। गजानन भगवान का स्तुति मंत्र है-
गजाननः स विज्ञेयः सांख्येभ्यः सिद्धिदायकः।
लोभासुरप्रहर्ता वै आखुगश्च प्रकीर्तितः।।
अर्थात भगवान श्री गणेश जी का गजानन नामक अवतार सांख्यब्रह्म का धारक है, गजानन को सिद्धिदायक भगवान के रूप में जाना जाता है। इन्हें लोभासुर का संहारक तथा मूषक के वाहन पर चलने वाला कहा गया है।
एक बार की बात है कि देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर कैलाश पर्वत पर पहुंचे। वहाँ उन्होंने भगवान शिव-पार्वती का दर्शन किया। कुबेर भगवती उमा के अनुपम सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो गए और एकटक उनको निहारने लगे। देवी उनको अपनी ओर इस तरह निहारते हुये देखकर अत्यन्त क्रोधित हो गईं। देवी की कोप दृष्टि से कुबेर अत्यन्त भयभीत हो गये। उसी समय भयभीत कुबेर ने लोभासुर को उत्पन्न किया। वह अत्यन्त प्रतापी तथा बलवान था।
लोभासुर दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास गया। उसने शुक्राचार्य से अपने को शिष्य बनाने का अनुरोध किया। आचार्य ने इसे पंचाक्षरी मन्त्र (ऊँ नमः शिवाय) की दीक्षा देकर तपस्या करने के लिये वन भेज दिया।
लोभासुर ने स्नान करके भस्म धारण करके वे भगवान शिव का ध्यान करते हुये पंचाक्षरी मन्त्र का जाप करने लगा। उसने अन्न, जल त्यागकर शंकर जी की कठोर तपस्या की। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर भगवान प्रकट हुये। लोभासुर उनके चरणों में गिर कर उनकी स्तुति करने लगा। शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसे तीनों लोकों में निर्भय होने का वरदान दे दिया। निर्भय होकर लोभासुर ने दैत्यों की एक विशाल सेना एकत्र कर ली। उसने असुरों के सहयेाग से पृथ्वी के समस्त राजाओं को जीत लिया। फिर उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। इन्द्र को पराजित करके उसने अमरावती पर अधिकार जमा लिया। लोभासुर से पराजित होने पर इन्द्र भगवान विष्णु के पास गये और उनसे अपना दुःख कहा। भगवान विष्णु असुरों का संहार करनेे के लिए गरूण पर चढ़कर आये। भयानक संग्राम हुआ। भगवान शंकर का वरदान लोभासुर को प्राप्त था अतः उसने विष्णु भगवान को भी पराजित कर दिया और देवताओं के रक्षक महादेव हैं यह जानते हुये लोभासुर ने अपना दूत भेजकर उनसे कहा कि आप भी अपनी पराजय को स्वीकार करते हुये कैलाश पर्वत को खाली कर दीजिये। भगवान शंकर ने अपने दिये वरदान को याद करते हुये कैलाश पर्वत को खाली कर दिया। लोभासुर अत्यधिक प्रसन्न हो गया। अब सब तरफ असुरों का साम्राज्य होने से धर्म कर्म समाप्त हो गये। असुरों के अत्याचार से ब्राह्मण, ऋषि, मुनि सब परेशान हो गये। तब दैत्य मुनि के कहने पर देवताओं ने गणेश उपासना की। प्रसन्न होकर गजानन ने लोभासुर के अत्याचार से देवताओं को मुक्ति दिलाने का वचन दिया। गजानन ने भगवान शिव से लोभासुर को यह संदेश भिजवाया कि तुम या तो गजानन की शरण में आओ अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहो। जब दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को पता लगा तो उन्होंने भगवान गजानन की महिमा बताकर गजानन की शरण में जाने के लिये कहा। लोभासुर को जब गणेश तत्व अर्थात उनकी महिमा का पता चला और वह उनकी चरण वंदना करने लगा। शरणागत लोभासुर को गजानन ने क्षमा करके पाताल लोक भेज दिया।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



