श्राद्ध है, पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम

हिन्दू धर्म में श्राद्ध को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य से जोड़कर देखा जाता है। शास्त्रों मंे इसे पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि किसी भी जीव को उसके कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों मंे जन्म मिलता है। पुण्य कर्मों का फल स्वर्ग और पाप कर्मों का फल नरक के रूप मंे मिलता है। इसी कारण शास्त्रों में पुत्र पौत्रादि के लिए दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों केे निमित श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करने का विधान है। ताकि उन्हें परलोक या योनियों मंे सुख प्राप्त हो सके। हमारे धर्म मंे श्राद्ध को अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने उन्हंे नमन करने तथा स्वयं को पितृ ऋण से मुक्ति का माध्यम माना जाता है।
भारतीय धर्म शास्त्रों मंे श्राद्ध न करने से होने वाले कष्टों का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जीवन स्थूल शरीर छोड़कर आगे की यात्रा करता है और इस यात्रा में उसके लिए पाथेय यानी अन्न-जल की आवश्यकता होती है। ऐसा माना जाता है कि परिजन श्राद्ध और पिंडदान के माध्यम से जो अन्न-जल अर्पित करते हैं, वही इस यात्रा में उनका पाथेय बनता है।
पिंडदान की परम्परा क्या है
मरणोपरान्त पिंडदान की भी एक निर्धारित परम्परा बताई गई है। इसमंे शवयात्रा के दौरान छः पिंड देने का विधान मिलता है, जिसका उद्देश्य भूमि के अधिष्ठात्री देवता की प्रसन्न्ता और भूत-पिशाचों से होने वाली बाधाओं का निवारण माना गया है। इसके बाद दिये जाने वाले दस पिंडों से जीव को सू़क्षम शरीर प्राप्त होता है। इसके आगे पितृपक्ष मंे किए जाने वाले पिंडदान और श्राद्ध के माध्यम से अन्न-जल अर्पित करने की परम्परा है। यदि पुत्र-पौत्र या अन्य परिजन श्राद्ध आदि कर्म न करें तो मृत जीव को भूख-प्यास सहित अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है।
क्या शाप भी देते हैं पितर
हमारे धर्म शास्त्रांे में श्राद्ध न करने वाले परिजनों के सम्बन्ध में कठोर मान्यताओं का भी उल्लेख मिलता है। यहां तक कहा गया है कि पितर ऐसे परिजनों को शाप भी दे सकते हैं। उपनिषदों मंे भी देवताओं और पितरों के सम्बन्ध मंे आलस न करने की बात कही गयी है। इसीलिये श्राद्ध को दिवंगत माता-पिता और पूर्वजों के पुण्य स्मरण तथा उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर माना गया है।
श्राद्ध करने वाले को मिलता है मोक्ष
धार्मिक मान्यता है कि शान्त चित्त और श्रद्धा के साथ विधिपूर्वक श्राद्ध करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है और उसे पुनः संसार के चक्र मंे नहीं आना पड़ता है। इसी कारण पितरों की संतुष्टि के साथ अपने कल्याण के लिए भी श्राद्ध को महत्वपूर्ण माना गया हैं महर्षि के कथन के अनुसार धर्म-ग्रंथों मंे श्राद्ध को मनुष्य के लिए अत्यन्त कल्याणकारी कर्म माना गया है। इस दृष्टि से श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और अपने पारिवारिक दायित्व को निभाने की परम्परा के रूप मंे देखा जाता है।
उनकी यादों से जुड़ना ही असली श्राद्ध है
हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के 15 दिनों मंे श्राद्ध करने को पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ उनसे जुड़ने का आध्यात्मिक माध्यम माना गया। वस्तुतः भारतीय परम्परा मंे श्राद्ध को दिवंगत पूर्वजों से भावनात्मक जुड़ाव की एक सूक्ष्म पद्धति माना जाता है। श्राद्ध के माध्यम से एक अलग आयाम मंे स्थित शरीरधारी आत्माएं पृथ्वी पर अपने प्रियजनों द्वारा भावपूर्ण श्राद्ध आदि कर्म से तृप्त होकर उन्हें आशीर्वाद स्वरूप भौतिक सफलता, सुख समृद्धि आदि प्रदान करती हैं। भारतीय ऋषियों और महर्षियों ने अपनी स्थापना और अनुभूति के आधार पर जीवन-मृत्यु, चेतना तथा पितृ परम्परा से जुड़े उन रहस्यों की खोज की जो भौतिक जगत के विज्ञान की सीमाओं से बहुत आगे हैं।
उनके जाने के बाद भी उनसे सम्बन्ध बनाए रखिये
किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसका अपने प्रिय लोगों के साथ सम्बन्ध समाप्त नहीं होता है। हर साल आने वाले पितृपक्ष के 15 दिन हमंे उनके इसी प्यारे सम्बन्ध को याद दिलाने के लिए आते हैं। इसीलिए कोई भी शुभ कार्य करने से पहले पितरों का पूजन और याद करके उन्हंे नमन किया जाता है। पितरांे के प्रसन्न होने पर ही भगवान हमसे प्रसन्न होते हैं। अपने पूर्वजों को याद करने से हमारे सभी पूजा-पाठ अनुष्ठान आदि सफल होते हैं। यही कारण है कि पितरों को याद करके तर्पण आदि करना चाहिए।
पितृपक्ष में तर्पण और पिण्डदान का महत्व
हमारे प्राचीन ऋषियों ने संसार को दृश्य अदृश्य जगत के वैज्ञानिक रहस्यों का समझकर पितृपक्ष के दौरान पितरों को स्मरण करके तर्पण करने की परम्परा स्थापित की है। जिसे विधि-विधान के साथ पालन करके व्यक्ति अपने पितरों की मुक्ति सद्गति के साथ घर-परिवार का भी कल्याण कर सकता है। जब अन्तर्मन को एकाग्र करके दिवंगत पितरों के निमित्त तर्पण, पिण्डदान, दान-पुण्य किया जाता है तो ये बाहरी क्रियाएं आंतरिक भाव जगत से जुड़कर पितरों तक पहुंचती हैं।
श्राद्ध मंे पंचबलि, प्रकृति और जीव
श्राद्ध में जो भोजन पितरों के लिए बनाया जाता है, उसका एक बड़ा हिस्सा गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देव अतिथि के रूप में प्रकृति के अन्य जीवों को अर्पित किया जाता है। स्थूल भोजों को जब अग्नि मंे होम जल मंे तर्पण करके सूक्ष्म तत्वों में बदला जाता है तो वह भाप और ऊर्जा में रूपांतरित होता है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार सूक्ष्म सत्ताएं, स्थूल भोजन ग्रहण नहीं करती। ये केवल उसकी गंध, ऊर्जा और भाव तरंगांे से पोषण ग्रहण करती हैं।
ऊर्जा, संकल्प और श्राद्ध की
जो व्यक्ति हमारे जीवन नहीं हैं उनको याद करते हुए उसके प्रति दृढ़ संकल्प लेकर श्रद्धा के साथ भोजन खिलाने से हमारे मन मस्तिष्क मंे एक केन्द्रीय विचार पैदा होता है जो एक ऊर्जा के रूप मंे आंतरिक जगत में विलीन हमारे प्रिय व्यक्ति की चेतना तक विचार संप्रेषण के रूप में पहुंचता है। हमारे धर्म में वैदिक विज्ञान है जिसे समझना कठिन है इसीलिए इसे समझने के लिए व्रत, तीज, त्यौहार, श्राद्ध, यज्ञ आदि के सरल विधान बनाए गए हैं, ताकि हर व्यक्ति
इसे समझ सके और लाभान्वित हो सके।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



