गरबा सिर्फ उत्सव नहीं, पूजा भी

आगामी 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र प्रारम्भ हो रहे हैं। इन नौ दिनों में आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना की जाती है। उपासना के लिए रात्रि जागरण, मां दुर्गा के भजन और गरबा का आयोजन भी होता है। गरबा को आमतौर पर लोग उत्सव मान लेते हैं लेकिन यह उत्सव के साथ मां की पूजा भी है। गरबा पर दूसरे सम्प्रदाय के लोगों, विशेष रूप से उन लोगों को जो मूर्ति पूजा के विरोधी हैं, को आने की जरूरत ही नहीं है। यह विवाद पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है। अभी हाल में कुछ नेताओं के बयान भी आये, जिन पर चर्चा हुई। हमारे देश मंे कुछ उत्सव हैं जिनको सभी सम्प्रदाय के लोग खुशी के साथ मनाते हैं। उदाहरण के लिए होली का त्योहार, ईद का त्योहार और क्रिसमस डे। ये तीनों पर्व धार्मिक भावना से भी जुड़े हैं जैसे होली हिन्दुओं का त्योहार है तो ईद मुसलमानों का और क्रिसमस ईसाइयों का लेकिन सभी इन्हें मनाते हैं और किसी प्रकार का विरोधी भी नहीं होता क्योंकि इनमंे किसी की उपासना नहंी की जाती है। नवरात्र के दिनों में गरबा का आयोजन माता रानी की पूजा के निमित्त होता हैं। गरबा शब्द संस्कृत के गर्भ से बना है जिसका अर्थ जीवन, गर्भस्थ शिशु और सृजन शक्ति से है। जनश्रुति है कि प्राचीनकाल मंे मिट्टी के एक छिद्रित पात्र, जिसे गर्भी कहा जाता था, उसके अंदर दीपक जलाकर उसके चारों तरफ गोल घेरा बनाकर नृत्य किया जाता था। यह जलता हुआ दीपक ब्रह्माण्ड और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता था। यही नृत्य कालांतर मंे गरबा बन गया है। यह नृत्य शक्ति माता और देवी दुर्गा के नौ रूपों के प्रति समर्पण व सम्मान का प्रतीक है। इसीलिए उन लोगो को इस पूजा-उत्सव में सम्मिलित होने से रोका जाता है जिनकी पूजा में आस्था ही नहीं है। छत्तीसगढ़ के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल और मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक के बयान इसी भावना के तहत माने जाने चाहिए।
नवरात्र के दौरान होने वाले डांडिया और गरबा कार्यक्रमों को लेकर छत्तीसगढ़ के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल के बयान के बाद राज्य में सियासत गरमा गई है। मंत्री राजेश अग्रवाल ने वक्फ बोर्ड के
अध्यक्ष डॉक्टर सलीम राज के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि गरबा और डांडिया दुर्गा माता की आराधना से जुड़ा धार्मिक आयोजन है। मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि जो लोग मूर्ति पूजा और इस धार्मिक परंपरा को नहीं मानते, उन्हें गरबा-डांडिया जैसे आयोजनों से दूरी बनानी चाहिए।
छत्तीसगढ़ के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि अगर किसी को गरबा में जाने का शौक है, तो वह अपने परिवार के साथ जाए। मंत्री ने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पहचान छिपाकर या नाम बदलकर गरबा कार्यक्रम में जाता है, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी। राजेश अग्रवाल ने कहा कि कुछ लोगों की वजह से पूरे समाज को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने आपसी वैमनस्यता नहीं फैलाने की अपील करते हुए कहा कि जो लोग दुर्गा माता की आराधना नहीं करते या हिन्दू धर्म को नहीं मानते, उन्हें गरबा कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए।दूर से देखने में गरबा एक नॉर्मल डांस फॉर्म लग सकता है, लेकिन यह कई मायनों में खास है। गरबा हमेशा ग्रुप में खेला जाता है। गांव-समाज के लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं और एक साथ कदम और ताल मिलाकर गरबा खेलते हैं।
इस डांस में पैरों की ताल, हाथों की ताल और घूमर का शानदार मेल देखने को मिलता है। लोग एक सर्कल में घूमते हैं और ताली बजाकर, कदम ताल मिलाकर एक साथ गरबा खेलते हैं। आमतौर पर इसके लिए किसी खास वाद्य यंत्र की जरूरत नहीं होती। हाथों की ताली, चुटकी और पैरों की गति ही इस डांस की असली खासियत हैं। शुरुआत में इसे धीमी गति से शुरू किया जाता है और धीरे-धीरे गति बढ़ती है। गरबा में डांडिया का भी इस्तेमाल किया जाता है। डांडिया को आपस में टकराकर खेला जाता है, जिससे एक समूह में मधुर आवाज निकलती है।
वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सलीम राज ने कहा था कि मुस्लिमों को गरबा स्थल नहीं जाना चाहिए क्योंकि उनकी आस्था नहीं है और जब आस्था नहीं है तो यह कोई पर्यटन स्थल नहीं है। और अगर जाना चाहते हैं तो मूर्ति पूजा करें, गंगा जल ग्रहण करें, कलावा बांधे और अपनी बहन बेटियों के साथ गरबा करें। आपको दूसरे की बहन-बेटियों के साथ गरबा खेलने का अधिकार नहीं है। अपनी बहन-बेटियों को आप परदे में रख रहे हैं और दूसरे की बहन बेटियों को प्रेम जाल में फंसाया जाता है, विवाह कर लिया जाता है। विवाह के बाद धर्मांतरण कराया जाता है और जब धर्मांतरण नहीं होता तो उन्हें छोड़ दिया जाता है जिससे हमारी बहन-बेटियों की जिंदगी नर्क से भी खराब हो जाती है। दूसरी ओर रायपुर के काजी मौलाना सैयद अशरफ जिलानी ने भी मुस्लिम समाज के लोगों से नवरात्र के गरबा कार्यक्रमों में शामिल नहीं होने की अपील की है।
गरबा का पहनावा भी काफी खास होता है। महिलाएं रंग-बिरंगी चनिया-चोली पहनती हैं। ये पोशाक चटकीले रंगों के होती है, जिस पर मिरर वर्क, कौड़ियों और गोटा-पट्टी का का बहुत खूबसूरत काम किया होता है। इसके साथ ओढ़नी और ऑक्सीडाइज्ड या चांदी के गहने पहने जाते हैं। वहीं, पुरुष गरबा के लिए केडियूं और धोती पहने हैं। केडियूं एक घेरदार कुर्ता होता है, जिसपर कढ़ाई और शीशे का काम होता है। इसके साथ वे रंग-बिरंगी गुजराती पगड़ी पहनेते हैं और ऑक्सीडाइज्ड जूलरी पहनते हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ने बोत्सवाना में अंतर-सरकारी समिति के अपने 18वें सत्र के दौरान आधिकारिक तौर पर गुजरात के प्रतिष्ठित गरबा नृत्य को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की अपनी प्रतिष्ठित प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था। गरबा नृत्य शैली यूनेस्को की सूची में जगह बनाने वाली भारत की 15वीं सांस्कृतिक धरोहर है। कोलकाता की दुर्गा पूजा को वर्ष 2021 में इसमें शामिल किया गया था।
नवरात्र से पहले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी गरबा आयोजनों में मुस्लिम युवाओं की भागीदारी को लेकर सियासी बयानबाजी हुई है। हुजूर से भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा के एक बयान पर विवाद खड़ा हो गया। उन्होंने गरबा में मुस्लिम युवाओं के शामिल होने को लेकर कहा था कि वे अकेले न आएं, बल्कि अपनी बहन-बेटियों को भी साथ लेकर आएं। उनके इस बयान पर भोपाल मध्य से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। रामेश्वर शर्मा ने करोंद में जन्माष्टमी के अवसर पर आयोजित मटकी फोड़ कार्यक्रम में यह टिप्पणी की थी। उनके इस बयान का वीडियो बाद में वायरल हो गया, जिसको लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई।
विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा था कि गरबा केवल उत्सव या मनोरंजन का आयोजन नहीं, बल्कि मां भगवती की आराधना का पर्व है। उन्होंने कहा कि इसमें शामिल होने वालों को देवी की आराधना और प्रार्थना की भावना के साथ आना चाहिए। उन्होंने कहा, गरबा में अकेले मुस्लिम लड़के ही क्यों आना चाहते हैं। वे अकेले न आएं, बल्कि अपनी बहन-बेटियों को भी साथ लेकर आएं। हमारे भी छोरे तैयार हैं। शर्मा ने आगे कहा कि यदि मुस्लिम समुदाय के लोग गरबा में स्थायी रूप से शामिल होना चाहते हैं तो भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, आओ, जय श्रीराम बोलो, माथे पर तिलक लगाओ। गोमाता की रक्षा करो, किसी को परेशानी है तो बताओ। भाजपा विधायक ने कहा कि यदि किसी को हिंदू धर्म और सनातन से लगाव है तो वह रहीम और रसखान की तरह राम और कृष्ण को अपने मन में स्थान दे। उन्होंने राम, कृष्ण, महावीर और गौतम बुद्ध को भारतीय परंपरा के महापुरुष बताते हुए सनातन को स्वीकार करने की बात कही। इसे आस्था की नजर से देखें और सियासत न करें तो बेहतर होगा
।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



