
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने
प्रबंध काव्य रामचरित मानस में यह बताने का प्रयास किया है कि विधाता ने सृष्टि की रचना करते समय न तो किसी को पूरी तरह गुणवान बनाया और न किसी को पूरी तरह से अवगुण ही दे दिये। सृष्टि में जितने भी जड़ चेतन हैं, वे गुण और अवगुण लिये हुए हैं। ईश्वर ने हमें जो बुद्धि और विवेक दिया है, उसका उपयोग कर हम अवगुण को छोड़कर गुण ग्रहण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए आग को ले लें आग से हम खाना पकाते हैं, रोशनी करते हैं लेकिन यही आग असावधानीवश हमारे घर को भी जलाकर नष्ट कर देती है। इसलिए किसी भी व्यक्ति या पदार्थ से हम गुण ग्रहण करें और अवगुणों से दूर रहें। जड़ और चेतन सभी का एक स्वभाव अर्थात् नैसर्गिक गुण होता है, उसे वह छोड़ नहीं सकता।
भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरतां गरल सराहिइ मीचु।।
अर्थात् जो अच्छा है वह अच्छाई ही ग्रहण करेगा और नीच (बुरा) है, नीचता को ही धारण करेगा जिस तरह अमृत की सराहना अमर करने से होती है और जहर की सराहना विष की तीव्रता के लिए होती है। अमृत की क्षमता है कि वह मृत व्यक्ति को जिला दें और विष की क्षमता है कि वह मृत्यु तक पहुंचाए। ये इनका नैसर्गिक (प्राकृतिक) गुण है। चिकित्सा शास्त्र में इनके इसी गुण का उपयोग किया गया है। कितनी ही दवाएं जहर से बनायी जाती हैं। इस संबंध में एक कथा याद आती है। एक महात्मा जी गंगा स्नान कर रहे थे। उन्होंने देखा एक बिच्छू नदी में डूबने वाला है। वह अपने प्राण बचाने के लिए छटपटा रहा था। महात्मा का स्वभाव दयालु होता है। उन्होंने उस बिच्छू को हाथ में पकड़कर निकालना चाहा तो बिच्छू ने डंक मार दिया। महात्मा दर्द से तिलमिला उठे और इस तिलमिलाहट के कारण बिच्छू पुनः नदी में गिर गया। बिच्छू को जान बचाने के लिए छटपटाते देखकर महात्मा को पुनः दया आयी और उन्होंने बिच्छू को हाथ में उठा लिया। बिच्छू ने पुनः डंक मार दिया और महात्मा के हाथ से छूटकर पुनः जल में गिर गया। ऐसा कई बार हुआ तो महात्मा के शिष्य ने सवाल किया ‘गुरू जी ये दुष्ट बिच्छू बचाने योग्य नहीं है, इसे नदी में डूब जाने दीजिए तो महात्मा ने जवाब दिया- ‘वत्स इस बिच्छू का स्वभाव ही डंक मारना है, जब यह अपना स्वभाव नहीं छोड़ रहा है तो मैं अपना दया करने का स्वभाव क्यों छोड़ूं। महात्मा ने अंततः उस बिच्छू को नदी के बाहर निकाल दिया।
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-
खल अघ अगुन साधु गुनगाहा, उभय अपार उदधि अवगाहा।
तेहिते कछु गुनदोष बखाने, संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।
भलेउ पोच सब विधि उपजाए, गनिगुन दोष बेद बिलगाए।
कहहिं वेद इतिहास पुराना,
विधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।
अर्थात् दुष्टों के पापांे, अवगुणों की और साधु-सज्जनांे के गुणों की कथाएं दोनों ही अपार अथाह समुद्र की तरह हैं। इसी से कुछ गुण-दोषों का वर्णन किया है, क्योंकि बिना जाने गुणों का संग्रह और अवगुणों का त्याग करना संभव नहीं है। भले और बुरे सभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचार कर उन्हें अच्छे और बुरे की संज्ञा दी गयी है। वेद, इतिहास और पुराण यही कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण और अवगुणों से भरी है।
दुख सुख पाप-पुन्य दिन राती, साधु-असाधु सुजाति कुजाती।
दानव देव ऊंच अरु नीचू, अमिय सुजीवन माहुरु मीचू।
माया ब्रह्म जीव जगदीसा, लच्छि, अलच्छि रंक अवनीसा।
कासी मग सुरसरि क्रमनासा, मरु मारव महिदेव गवासा।
सरग नरक अनुराग विरागा, निगमागम गुनदोष विभागा।
जड़ चेतन गुन दोष मय विस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि वारि विकार।
अर्थात् जो लोग इस बात से निराश हैं कि घोर कलियुग आ गया है और अच्छे लोगों का गुजारा नहीं, उन्हें यह समझना होगा कि दुख और सुख, पाप और पुण्य, दिन और रात, सज्जन और दुष्ट, सुजाति और कुजाति (जिन्हें हम सवर्ण और दलित जाति के नाम से पुकारते हैं) दानव और देवता, ऊँच और नीच, अमृत और विष, सुन्दर जीवन और मृत्यु माया और ब्रह्म, जीव और ईश्वर, सम्पत्ति और दरिद्रता, स्वर्ग और नरक, राजा और भिखारी (रंक), काशी और
मगध, गंगा और कर्मनाशा, मारवाड़ और मालवा, ब्राह्मण और कसाई, अनुराग और वैराग्य आदि जो भी ब्रह्मा जी ने उत्पन्न किये हैं, वेद-शास्त्रों ने उनके गुण और दोषो में विभाजित कर दिया है। विधाता ने इस जड़ और चेतन मय सृष्टि को गुण और दोष मिलाकर बनाया है। संत रूपी हंस दोष रूपी जल को त्याग कर गुण रूपी दुग्ध को ही ग्रहण करते हैं।
अस विवेक जब देइ विधाता, तब तजि दोष गुनहिं मनुराता।
काल सुभाउ करम बरिआई, भलेउ प्रकृति बस चुकई भलाई।
विधाता अर्थात् परम परमेश्वर जब हंस के समान विवेक देते हैं तब दोषों को त्याग कर मन गुणों की तरफ आकर्षित होता है। हालांकि समय और परिस्थितियां कभी-कभी ऐसी आ जाती हैं कि सज्जन व्यक्ति भी गलती कर जाते हैं। यह काल सुभाउ, करम बरिंआई की बात थोड़ी गंभीर है। मान लें कि हम कहीं जा रहे है और रास्ते में चोट खाकर कोई गिर गया है तो हमारा दायित्व होता है कि हम उस चोट खाये व्यक्ति को उठाएं और चिकित्सा दिलाने में उसकी मदद करें लेकिन यदि हम कोई आवश्यक दवाई लेकर घर जा रहे हैं जो तुरन्त घर पहुंचानी है तो वहां रुककर हम अनर्थ भी कर सकते हैं। यह समय का स्वभाव समझना भी बहुत जरूरी है। समय पर जैसी जरूरत हो, वैसा ही आचरण हमें करना चाहिए। इसी प्रकार करम बरिआई से मतलब
प्रारब्ध से है। प्रारब्ध हमारे पिछले जन्म के कर्मों का फल माना जाता है। बहुत से लोग पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते। उनकी दृष्टि में स्वर्ग और नरक कुछ नहीं होता और पुनर्जन्म जैसी अवधारणा भी कपोल कल्पित है लेकिन इस विषय पर पाश्चात्य देशों में भी अध्ययन हो रहा है कि क्या सचमुच पुनर्जन्म होता है? कई लोगों ने अपने पूर्व जन्म की बातें बतायीं जो अक्षरसः सत्य निकलीं। गोस्वामी तुलसीदास पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे। इसीलिए उन्होंने कहा है कि बहुत ही अच्छे कर्म करने के बाद मनुष्य के रूप में जन्म होता है। इसी प्रारब्ध के चलते भी हम कभी ऐसे काम कर जाते हैं जो हमें नहीं करने चाहिए। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



