अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा… 15

रामकथा को लेकर तुलसीदास की विनम्रता

विनयशील स्वभाव से बिगड़े काम भी बन जाते हैं। हमसे जो रूठे हुए हैं, नाराज हैं, उनकी अगर हम प्रशंसा करें, उनके सामने नतमस्तक हो जाएं तो उनकी नाराजगी दूर हो जाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रशंसा और विनय करने के बाद भी जो लोग प्रसन्न नहीं होते हैं तो उनको महामूर्ख समझना चाहिए और उनकी तरफ ध्यान न देने में ही भलाई है। उनका स्वभाव ही ऐसा है जिन्हें खुश नहीं किया जा सकता। रामकथा को आगे बढ़ाते हुए गोस्वामी जी कहते हैं-
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं, रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन विमल उर सोभा अति अनुराग।
अर्थात् श्रेष्ठ विचार रूपी बारिश से जो मुक्तामणि के समान कविता उत्पन्न होती है, उन कविता रूपी मुक्तामणियों को जतन (युक्ति) के साथ पिरोकर (बांधकर) रामचरित्र रूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने हृदय में माला बनाकर धारण करते हैं जिससे अत्यन्त अनुराग रूपी शोभा होती है, अत्यन्त प्रेम मिलता है लेकिन
जे जनमे कलिकाल कराला, करतब बायस बेष मराला।
चलत कुपंथ वेद मग छांड़े, कपट कलेवर कलिमल भांड़े।
बंचक भगत कहाइ राम के, किंकर कंचन कोह काम के।
तिन्ह महं प्रथम रेख जगमोरी,
धींग धरम ध्वज धंधक घोरी।
जौ अपने अवगुन सब कहऊं, बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊं।
ताते मैं अति अलप बखाने, थोरे महुं जानिहहिं सयाने।
समुझि विविध विधि बिनती मोरी, कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।
एतेहु पर करिहहिं जे असंका, मोहिते अधिक ते जड़मति रंका।
जो कराल-कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौये के समान है और चेहरा हंस का सा है, जो वेद मार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति और कलियुग के पापों के भांड़े हैं, जो श्रीराम जी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ) क्रोध और काम (वासना) के गुलाम (दास) हैं और जो धींगा धींगी (प्रंपंची), धर्म ध्वजी अर्थात् धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले अर्थात् अपने को धार्मिक कहलाने वाले-दम्भी हैं और कपट के धंधों को करने वाले हैं। संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूं तो कथा बहुत बढ़ जाएगी और मैं पार नहीं पाऊंगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है, बुद्धिमान लोग थोड़े में ही समझ लेंगे। गोस्वामी तुलसीदास जी यहां पर संत कवि कबीर के विचारों को अपनाते दिखते हैं जिन्होंने लिखा है- बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिए कोय, जो मन खोजा आपना तो मुझ सा बुरा न कोय। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं दूसरे को दोषी नहीं कहता इसलिए मेरी अनेक प्रकार की विनती को समझ कर कोई भी इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा लेकिन इतने पर भी जो लोग इस कथा की आलोचना करेंगे, शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं। तुलसीदास जी कहते हैं-
कवि न होउंनहि चतुर कहावउं, मति अनुरूप रामगुन गावउं।
कहं रघुपति के चरित अपारा, कहं मति मोरि विरत संसारा।
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं, कहहु तूल केहि लेखे माहीं।
समुझत अमित राम प्रभुताई, करत कथा मन अति कदराई।
मैं न तो कबि हूं, न चतुर कहलाता हूं बस अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीराम जी के गुण गा रहा हूं। वह कहते हैं कि मैं जानता हूं कि श्री रघुनाथ जी का चरित्र अपार है, जिसकी कोई थाह नहीं पा सकता, दूसरी तरफ मेरी बुद्धि है जो सांसारिक कामों में आसक्त अर्थात् उलझी हुई है। मेरा यह प्रयास उसी तरह का है जैसे जिस हवा से सुमेरु जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, इतनी प्रबल हवा के सामने रुई (तूल) की क्या गिनती हो सकती है। हां, भगवान राम की असीम प्रभुता को समझकर उनकी कथा रचना में मेरा मन बहुत हिचकता है, क्योंकि
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहि निरंतर गान।
सरस्वती जी, शेषनाग जी, शिवजी, ब्रह्मा जी, शास्त्र, वेद और पुराण ये सब नेति-नेति कहकर अर्थात् इसका पार नहीं (न इति) कहते हुए सदा जिनका गुणगान किया करते हैं तो मेरे लिए यह कथा कहना कैसे संभव है। तुलसी दास जी कहते हैं कि एक रास्ता तो है-
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई, तदपि कहें बिनु रहा न कोई।
तहां बेद अस कारन राखा, भजन प्रभाउ भांति बहुत भाषा।
एक अनीह अरुप अनामा, अज सच्चिदानंद पर धामा।
व्यापक विस्वरूप भगवाना, तेहि धरिदेह चरित कृत नाना।
सो केवल भगतन हित लागी, परम कृपाल प्रनत अनुरागी।
जेहि जन पर ममता अति छोहू।, जेहिं करुनाकरि कीन्ह न कोहू।
गई बहोर गरीब नेवाजू, सरल सबल साहिब रघुराजू।
बुध वरनहिं हरि जस अस जानी, करहिं पुनीत सुफल निज बानी।
तेहि बल मैं रघुपति गुन गाथा, कहिहउं नाइ रामपद माथा।
वह रास्ता यह है कि प्रभु श्री रामचन्द्र की प्रभुता को सभी जानतेे हैं कि यह अकथनीय है लेकिन वेद-पुराणों में उनकी महिमा कही गयी है अर्थात् कहे बिना कोई रहा नहीं। वेदों में इसका कारण बताया गया कि भजन का प्रभाव बहुत होता है, इसलिए भगवान की महिमा का वर्णन पूरी तरह से तो कोई नहीं कर सकता लेकिन जिससे जितना बन पड़े, उतना भगवान का गुणगान करना चाहिए। भगवान के गुणगान रूपी भजन का प्रभाव बहुत ही अनोखा है इसका अनेक प्रकार से शास्त्रों और पुराणों में वर्णन है। कुछ कथाएं तो सभी को पता होेंगी कि भक्त प्रह्लाद के पुकारने पर भगवान खंभे से प्रकट हुए थे और आततायी हिरण्यकश्यप का संहार किया, द्रौपदी के पुकारने पर भगवान कृष्ण ने उसकी लाज बचायी। प्रेम के वशीभूत होकर भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाये। इससे यह पता चलता है कि थोड़ा सा भी भगवान का भजन मनुष्य को सहज ही भवसागर पार कर देता है। वह परमेश्वर एक हैं, उनकी कोई इच्छा नहीं है जिनका कोई रूप नहीं है, कोई नाम नहीं है, जो अजन्में, सच्चिदानंद और परमधाम हैं और जो सब में व्यापक और विश्व रूप हैं, उन्हीं भगवान ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीला की है। वह लीला केवल भक्तों के हित के लिए है क्योंकि भगवान परम कृपालु हैं और शरणागत के बड़े प्रेमी हैं। उनकी भक्तों पर बड़ी ममता और कृपा रहती है। भगवान ने जिस पर एक बार कृपा कर दी, उस पर कभी क्रोध नहीं किया। वही, प्रभु राम खोयी हुई वस्तु को पुनः प्राप्त करने वाले, गरीबों के बंधु समान सहायक, सरल स्वभाव सर्व शक्तिमान और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान लोग श्री हरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल देने वाली बनाते हैं। उसी बल से मैं श्री रामजी के गुणगान उनके चरणों में मस्तक नवाकर कर रहा हूं। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

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