
गोस्वामी तुलसीदास ने सत्संग का व्यापक प्रभाव बताया है। सत्संग को चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग बताया बल्कि उससे भी बढ़कर फल देेने वाला कहा। तीर्थराज प्रयाग में स्नान करके लोग मोक्ष प्राप्त करते हैं। मोक्ष मृत्यु के बाद मिलता है लेकिन सत्संग के प्रभाव से चारांे पुरुषार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस शरीर के रहते ही प्राप्त हो जाते हैं-लहहिं चारिफल अछत तनु साधु समाज प्रयाग। तुलसीदास जी कहते हैं सत्संग रूपी तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल मिलने लगता है। इस बात को महर्षि बाल्मीकि, नारद जैसे ऋषि-मुनियों ने अपने-अपने अनुभव से बताया है लेकिन यह सत्संग भी उसी को मिलता है जिस पर प्रभु राम की कृपा होती है।
मज्जन फल पेखिय तत्काला, काक होहिं पिक बकउ मराला।।
सुनि आचरज करै जनि कोई, सत्संगति महिमा नहिं गोई।
बाल्मीक नारद घटजोनी, निज-निज मुखन कही निज होनी।
जलचर थलचर नभचर नाना, जे जड़ चेतन जीव जहाना।
मति कीरति गति भूति भलाई, जब जेहिं जतन जहां जेहि
पाई।
सो जानव सत्संग प्रभाऊ, लोकहुं वेद न आन उपाऊ।
बिनु सत्संग विवेक न होई, रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।
सत्संगत मुद मंगल मूला, सोइ फल सिधि, सब साधन फूला।
अर्थात सत्संग रूपी तीर्थराज प्रयाग में स्नान का फल प्रत्यक्ष देखने में आता है जैसे कौये कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस। यहां पर कौये और बगुले का तात्पर्य व्यक्ति के गुणों से है। कोयल मीठा बोलती है और उसे सभी लोग पसंद करते हैं, कौये की वाणी कर्षक होती है, अशुभ भी मानी जाती है। इसी प्रकार बगुले को कुटिल पक्षी माना जाता है जो तालाब में बड़ी ही शांत मुद्रा में खड़ा हो जाता है लेकिन जैसे ही मछलियां दिखती हैं उनको चोंच में पकड़कर उड़ जाता है। दूसरी तरफ हंस को मां सरस्वती का वाहन भी बताया गया है। नीर-क्षीर का विवेक करने वाला माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार सत्संग रूपी तीर्थराज लोगों के अवगुण को दूर कर उन्हें गुणी बना देता है। यह सुनकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि सत्संगति की महिमा किसी से छिपी नहीं है। महर्षि बाल्मीकि, नारद जी और अगस्त्य जी ने अपने-अपने मुख से अपनी होनी अर्थात अपना जीवन वृत्त बताया है। (बाल्मीकि जी के बारे में बताया जाता है कि पहले वह डकैत थे लोगों की हत्या कर देते थे। एक साधु ने उनको समझाया और उनकी आदत को देखते हुए मरा-मरा शब्द जपने को कहा। इस शब्द के जपने से ही राम-राम निकलने लगा और वह महान कवि हो गये) इसी प्रकार नारद जी और महर्षि अगस्त्य जी के बारे में कहानियां प्रचलित हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जल में रहने वाले, जमीन पर चलने वाले और आकाश में विचरण करने वाले पक्षी और नाना प्रकार के जड़-चेतन (सजीव और निर्जीव) इस जगत में है, उनमें से जिसने, जिस समय, जहां कहीं भी, जिस किसी भी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति अर्थात ऐश्वर्य और भलाई पायी है, वह सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिए। वेदों में और इस लोक अर्थात संसार में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्संग के बिना विवेक अर्थात ज्ञान नहीं मिल सकता लेकिन इसके लिए भी प्रभु राम की कृपा चाहिए। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है, सत्संग का फल सिद्धि है और उसके साधन फूल के समान हैं।
सठ सुधरहिं सत्संगति पाई, पारस परस कुघात सुहाई
विधि बस सुजन कुसंगत परहीं, फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।
अर्थात दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं जैसे पारस (एक प्रकार का पत्थर) के स्पर्श से ही लोहा, जो कुधात अर्थात अच्छी धातु नहीं माना जाता है लेकिन सोना बन जाता है। (इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन कहते हैं पारस पत्थर के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है) गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि दैवयोग से यदि कभी सज्जन लोग बुरी संगति (कुसंगति) में फंस जाते हैं तो वहां भी वे सांप की मणि के समान आचरण करते हैं। सांप की मणि के बारे में भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है और इसके बारे में भी कहा जाता है कि यह सांप के मुख में रहती है। सांप जब इसे उगलता है तो चारों ओर अलौकिक प्रकाश उत्पन्न होता है। इस मणि के प्रभाव से कई असंभव कार्य भी किये जा सकते हैं। सांप के मुंह में भी रहकर जिस तरह से मणि अपना स्वभाव नहीं छोड़ती है उसी तरह दुष्टों के साथ रहकर भी सज्जन अपनी सज्जनता को बरकरार रखते हैं।
विधि हरिहर कवि कोविद बानी, कहत साधु महिमा सकुचानी।
सो मोसन कहिजात न कैसे, साक बनिक मनि गुनगन जैसे।
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि ब्रह्मा, बिष्णु, शिव, कवि और पंडितों की वाणी भी संतों की महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है। इसलिए संतों की महिमा को मैं (कवि तुलसीदास) इस प्रकार भी कह सकता हूं जैसे साग-सब्जी बेचने वाला दुकानदार मणि-माणिक्य के गुण नहीं बता सकता। इनके गुण तो जौहरी ही जानता है। इसलिए
बंदुउं संत समान चित, हित अनहित नहिं कोइ।
अंजलि गति सुभ सुमन जिमि, सम सुगंध कर दोइ।।
संतों का वंदन करता हूं जो सरल हृदय और जगत के हितकारी हैं। उनके ऐसे स्वभाव को जानकर ही मैं प्रणाम करता हूं। संतों के हृदय में समानता का भाव रहता है। उनके लिए न कोई दोस्त है और न कोई दुश्मन है। हित और अनहित का सवाल ही उनके सामने नहीं रहता है। जिस तरह अंजलि (दोनों हाथ फैलाकर अंजलि बनायी जाती है) में रखे हुए फूल दोनों हाथों को बराबर सुगंध देते हैं। यहां पर गोस्वामी तुलसीदास यह बताना चाहते हैं कि जिस हाथ से हम फूल तोड़ते हैं और जिस हाथ में फूल रखते हैं तो पुष्प कोई विभेद नहीं करता। सुगंध दोनों हाथों को मिलती है। इसलिए सत्संग का प्रभाव सज्जनों और दुर्जनों दोनों पर समान रूप से पड़ता है।
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
बाल विनय सुनि करि कृपा रामचरन रति देहु।
इसलिए सरल हृदय वाले सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने वाला स्वभाव रखने वाले संतजन हमारी बाल
विनय सुनकर कृपा करें और प्रभु
श्रीराम के चरणों में प्रेम करने का वरदान दें। -क्रमशः
(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)


