सम-सामयिक

भारत की पहली महिला चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता

पिछले दिनों सेतु प्रकाशन से एक किताब आई है, औपनिवेशिक भारत की जुनूनी महिलाएँ। पुस्तक के लेखक हैं, राजगोपाल सिंह वर्मा। यह किताब औपनिवेशिक भारत की उन स्त्रियों के बारे में है जिन्होंने इतिहास तो रचा पर स्वयं ही समाज द्वारा विस्मृत भी कर दी गईं। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महिलाओं ने अभूतपूर्व योगदान दिया है। रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल और रानी अवन्तीबाई ने तो 1857 के संग्राम में सशस्त्र संघर्ष किया था। सरोजनी नायडू, अरूणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी जैसी जुझारू महिलाओं ने गांधीवादी आन्दोलनों, रैलियों, भूमिगत रेडियो संचालन? विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आदि में निर्णायक भूमिका निभाई है। इन महिलाओं के नाम इतिहास में दर्ज़ हैं। लेकिन ऐसी बहुत सी महिलाएं भी हैं जिन्होंने अपने व्यक्तिगत संघर्षों के साथ-साथ समाज और देश के लिए भी महत्वपूर्ण काम किये हैं लेकिन वे प्रकाश में नहीं आ सकीं। उन्हें रेखांकित किया जाना भी जरूरी है। आज हम ऐसी ही कुछ महिलाओं के व्यक्तित्व, कृतित्व और संघर्षों की कहानियाँ सुनाने जा रहे हैं, हमारी श्रृंखला चलती रहेगी। इनमें पहली कहानी है-रख्मा बाई राउत की।
बचपन से ही संघर्ष
22 नवम्बर 1864 बम्बई में जन्मी रख्मा बाई राउत का विवाह बहुत कम उम्र में दादाभाई भीरवाजी के साथ कर दिया गया था रख्मा विवाह के समय नाबालिग थीं। वे अपनी पढ़ाई कर रही थी। रख्मा के माता-पिता ने दादा भाई भीखाजी को रख्मा की पढ़ाई पूरी होने पर ही विदाई के लिए मना लिया था रख्मा के पति दादाभाई की उम्र उन्नीस वर्ष की थी। पति ने अपनी पत्नी को ससुराल से जाने की ज़िद की लेकिन रख्मा इसके लिये तैयार नहीं थीं। उसने ससुराल जाने से मना कर दिया। उसका कहना था कि मैं इस बाल विवाह को नहीं मानती। रख्मा के पिता ने बेटी का साथ दिया। रख्मा के पति दादाभाई भीखाजी ने अपने वैवाहिक अधिकारों को बरकरार रखने के लिए कानूनी नोटिस भेजा लेकिन रख्मा ने किसी बात की परवाह किये बगैर अपनी पढ़ाई जारी रखी और इस बाल विवाह से मुक्ति पाने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ती रहीं।
व्यक्तिगत समस्या और बड़ी सामाजिक लड़ाई
रख्मा बाई ने अपनी व्यक्तिगत लड़ाई को एक सामाजिक समस्या समझते हुये देश के प्रमुख समाचार पत्रों में ‘ए’ हिन्दू लेडी एण्ड हर वोज’ शीर्षक से अपने छदम नाम से लेखों की एक श्रृंखला लिखनी शुरू की जो काफी चर्चित हुई। इन लेखों में बाल विवाह, विधवा जीवन और समाज में स्त्री के स्तर को लेकर अनेक प्रश्न खड़े किये। तत्कालीन ‘टाइम्स आॅफ इण्डिया’ ने भी अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में रख्मा बाई के पक्ष को रखा।
सवाल-जवाब हुए, गवाह पेश हुए, दोनों पक्षों ने मजबूती से अपने तर्क-वितर्कों को रखा। अन्ततः फ़ैसले की घड़ी आयी। 21 सितम्बर 1885 को दिये गये अपने निर्णय में ब्रिटिश जज राॅबर्ट हिल पिनले ने माना कि यह मामला ब्रिटिश कानून से अलग है, और यह कि बाल-विवाह के लिए हिन्दू कानून में कोई व्यवस्था नहीं है। वह एक अबोध बालिका के रूप में इस बन्धन में बँधी थी और बड़े होने पर अपनी समझदारी से पूर्व में किये गये फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है। इस ममाले में रख्मा अगर पति के साथ नहीं रहना चाहती थी तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता। वैसे भी वह अभी तक विवाहिता के रूप में दादाभाई भीखाजी के घर रहने नहीं गयी थी। हिन्दू कानून के अनुसार भी उसे ऐसे विवाह में बँधे रहने की स्वीकृति नहीं दी जा सकती थी जिसमें पूर्व में उसकी ‘समझदारी योग्य सहमति’ न रही हो, भले ही भारतीय कानून में बाल-विवाह के विरुद्ध कुछ न कहा गया हो। जजमेण्ट में लिखा गया था कि,
‘इस मुकदमे के भागी लोगों का विवाह ग्यारह वर्ष पूर्व सम्पन्न हुआ था, जब प्रतिवादी केवल ग्यारह वर्ष की थी। ये दोनों कभी साथ नहीं रहे हैं। परन्तु अब प्रतिवादी एक बाइस वर्ष की महिला है। इसलिए वादी 7इस मान्य अदालत से प्रार्थना करता है कि प्रतिवादी को अपने पतिदेव के घर भेजा जाए, ताकि वह इस पवित्र बन्धन के दायित्वों को निभा सके। वयस्क आयु की प्रतिवादी इस बन्धन को स्वीकार करने तथा निभाने से इन्कार करती है।’
उन्होंने स्पष्ट कहा, मेरे विचार से इस युवा महिला को इन परिस्थितियों में अपने नापसन्द पुरुष के साथ वास करने के लिए विवश करना एक क्रूर और निर्दयी कृत्य है।’
जज का यह भी कहना था कि उन्होंने किसी न्यायालय को ऐसा निर्णय देते हुए नहीं देखा या पढ़ा, जहाँ किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध वैवाहिक बन्धन में बाँधे रखने के लिए मजबूर किया जाए। ऐसा कोई कानून ब्रिटने में मान्य नहीं है, इसलिए भारत में भी मान्य नहीं हो सकता।
अपनी लड़ाई खुद ही लड़ी
1887 में उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुये रख्मा बाई को दोषी ठहराया और आदेश दिया कि यह वह पति के घर न जाकर शिक्षा जारी रखेगी तो उसे छः महीने के लिए कारावास की सजा भुगतनी पड़ेगी। आज यह बात हमें चांैका सकती है लेकिन यह वह समय था जब कोई भी स्त्री अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़ती थी कोई भी संगठन और संस्था इसे सहयोग नहीं करते थे लेकिन रख्मा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने क्वीन विक्टोरिया के सामने अपील की। उसके बाद ब्रिटेन में इस मुकदमे की चर्चा हुई उस पर बहस हुई और सन् 1888 में क्वीन विक्टोरिया ने रख्मा के हक में फैसला दिया। इसी के बाद से ब्रिटेन ने अपने पूरे साम्राज्य में विवाह के लिए ‘ऐज आॅफ कंसेण्ट एक्ट 1891’ लागू किया। इस एक्ट के बाद भारत सहित सभी ब्रिटिश उपनिवेशों में बाल विवाह अवैध घोषित किया गया। यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
शिक्षा के उच्चतम शिखर तक
मुकदमा जीतने के बाद उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई के लिए ‘लन्दन स्कूल आ ॅफ मेडिसिन फार विमेन’ में दाखिला लिया। 1894 में वे अपनी पढ़ाई पूरा करके वापस भारत लौटीं। इतिहास में दर्ज़ हो गया कि रख्मा बाई भारत की पहली महिला चिकित्सक बनी। वे पहली भारतीय विद्रोही महिला थीं तथा उनका वैवाहिक विवाह संभवतः भारत में पहला तलाक का मामला बना जिसमें एक स्त्री ने हिम्मत से कहा था कि मेरी मर्जी के बिना हुई शादी को मैं नहीं मानतीं।
जो उन्होंने कहा
अपने एक लेख में उन्होंने लिखा था, ‘‘हम जैसी हिन्दू महिलाओं के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। हमें खिलौनों की तरह रखा जाता है-एक दफा आनन्द के लिए खेला और उठाकर फेंक दिया। हमारे शास्त्रकार पुरुष हैं। वे स्वयं को महान और पवित्र दर्शाते हैं, और हमारे द्वार पर हर प्रकार के पाप छोड़ जाते हैं।’’
नब्बे वर्ष की उम्र में 1955 में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। तब तक वे अपने सामाजिक और चिकित्सकीय रूप में अनेक महिलाओं को कष्टों से उबार चुकी थीं।(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button