सम-सामयिक

यूजीसी के नये नियम पर सुप्रीम रोक

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) अर्थात् विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नये नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। इसका विरोध भी तर्कसंगत है। हरिजन एक्ट का भी इसी तरह विरोध किया गया था क्योंकि उसके दुरुपयोग की संभावना ज्यादा थी। उसको बाद मंे तर्कसंगत बनाया गया। हमारे देश का संविधान सभी को समान अवसर देने की बात करता है। यूजीसी ने इसी साल अर्थात् 2026 मंे नया नियम बनाया है जिसमंे मुख्य बात यह है कि कालेजों और विश्वविद्यालयों मंे किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति, जेंडर अथवा बैकग्राउंड के आधार पर छींटाकशी न की जा सके। इस प्रकार के आरोप की जांच के लिए इक्यूटी सेल बनाना सरकारी और गैर सरकारी कालेजों और विश्वविद्यालयों के लिए जरूरी होगा। इस साल मंे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी, एक महिला और एक दिव्यांग को सदस्य बनाया जाएगा। जाहिर है कि सामान्य वर्ग को इससे अलग रखा गया है। इससे लगता है कि सामान्य वर्ग के लोगों को पहले से ही दोषी मान लिया गया। इसीलिए विरोध हो रहा था। विरोध करने वाले कह रहे थे कि जातिगत टिप्पणी का झूठा आरोप भी लगा दिया जाए तो कमेटी क्या ऐक्शन लेगी? नये नियम के अनुसार शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर कमेटी की बैठक होगी और 15 दिनों मंे रिपोर्ट देनी पड़ेगी। इसके बाद ऐक्शन होगा। प्रथम दृष्टया यह व्यावहारिक नहीं लगता है। इसीलिए बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया था। जाने माने कवि कुमार विश्वास ने भी इस पर आपत्ति जताई थी। इसके दुरुपयोग की आशंका तो है, इसमें कोई दो राय नहीं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी, अगली सुनवाई की तारीख दे दी। गत 27 जनवरी को यूजीसी कार्यालय के सामने छात्रों व संगठन के प्रतिनिधियों ने यूजीसी के चेयरमैन विनीत जोशी से मुलाकात की थी। मांग पत्र भी दिया था। जोशी ने कहा था कि 15 दिनों के भीतर यूजीसी से जवाब मिलेगा।
यूजीसी के नये नियम को जनरल कैटेगरी के छात्रों के खिलाफ बताया जा रहा है। दरअसल, इसी महीने उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रमोशन आॅफ इक्यूटी इन हायर एजूकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026, लागू किया गया है। इसका उद्देश्य कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में भेदभाव खत्म करना है। यूजीसी चाहता है कि किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति, जेंडर या बैकग्राउंड की वजह से बुरा बर्ताव न हो।
यूजीसी के नए नियम के अनुसार सरकारी कॉलेज हो या प्राइवेट यूनिवर्सिटी, हर जगह एक इक्यूटी सेल बनाना जरूरी होगा। इसमें कम से कम एक सदस्य एसटी, एससी, ओबीसी, एक महिला और एक दिव्यांग समुदाय से होना अनिवार्य है।
अगर किसी छात्र को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वो अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। किसी भी शिकायत पर 24 घंटे के भीतर कमेटी की बैठक होनी चाहिए। इस पर 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी। दोषी पाए जाने पर एक्शन लिया जा सकता है। अगर संस्थान ये नियम नहीं मानती या इसका पालन नहीं करती तो संस्थान पर भी एक्शन होगा। यूजीसी उस कॉलेज का फंड रोक सकता है। डिग्री प्रोग्राम को रोका जा सकता है। ऑनलाइन कोर्स पर भी ब्रेक लग जाएगा। इतना ही नहीं संस्थान की मान्यता भी रद्द हो सकती है।
अब इन नए यूजीसी नियमों का समर्थन और विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क हैं। कहा जा रहा है कि नए नियमों में ओबीसी को भी ‘जातिगत भेदभाव’ की कैटेगेरी में रखा गया है। समर्थन करने वालों का तर्क है कि ओबीसी छात्रों से भी जातिगत भेदभाव हो सकता है। विरोध करने वाले कह रहे हैं कि इस नियम से सामान्य वर्ग के छात्र स्वाभाविक अपराधी बना दिए जाएंगे जबकि समर्थन वाले कह रहे हैं किसी भी तरह छात्रों को भेदभाव से बचाना जरूरी है। विरोधियों के मुताबिक, नए कानून में सामान्य श्रेणी के छात्र आरोपी हो सकते हैं तो पीड़ित क्यों नहीं जबकि समर्थक कह रहे हैं कि ये कानून छात्रों में बराबरी का व्यवहार सुनिश्चित करेगा। नाराज लोगों का कहना है कि ऐसे एकतरफा नियमों ने आरोपी और पीड़ित की जाति पहले ही तय कर दी है। जबकि समर्थक इसे छात्रों की समानता और सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं। जनरल कैटेगरी के छात्रों-कर्मचारियों का कहना है- ये नियम एकतरफा है। इसका इस्तेमाल साजिश के तहत भी हो सकता है जबकि समर्थक कह रहे हैं कि इससे भेदभाव की सही तस्वीर पता चल जाएगी। विरोधियों का तर्क है अगर किसी को फंसाना हो तो बस इतना कहना होगा कि ये मुझसे भेदभावपूर्ण बर्ताव कर रहा है। वहीं समर्थक इसे न्याय सुनिश्चित करने का निष्पक्ष तरीका बता रहे हैं।
एक चिंता इस बात की भी है कि जिसके खिलाफ शिकायत की जाएगी, उस छात्र का करियर खराब हो सकता है। वहीं समर्थक कह रहे हैं कि इन नियमों से भेदभाव से तंग आकर आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या कम होगी। विरोध करने वालों का डर ये है कि झूठी शिकायत करने वालों पर एक्शन लेने का कोई प्रावधान नहीं है। वहीं इन नियमों के समर्थक इसे भेदभाव के खिलाफ बिना डरे आवाज उठाने की हिम्मत से जोड़कर देख रहे हैं। सवाल है कि अगर झूठी शिकायत के जरिए किसी की मानसिक प्रताड़ना होगी और बाद में वो निर्दोष साबित हुआ तो उसके लिए प्रावधान खामोश है। मुआवजे का कोई प्रोविजन नहीं है। अग्निहोत्री ने त्यागपत्र दे दिया, जिस पर खूब राजनीति हो रही है। सवाल पूछे जा रहे हैं। अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे की 2 वजह बताई थीं।
यूजीसी को लेकर अग्निहोत्री का तर्क था कि यह प्रशासनिक या शैक्षणिक निर्णय नहीं हैं बल्कि समाज के बड़े वर्ग की गरिमा और अधिकारियों से जुड़ी हुई हैं। हालांकि केंद्र सरकार और यूजीसी ने नियमों का बचाव करते हुए कहा है कि ये सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप हैं। ताकि कॉलेज कैंपस में भेदभाव को रोका जा सके लेकिन अलंकार अग्निहोत्री ने नए नियम को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा नया नियम काला कानून है। इसे वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने यूपी के राज्यपाल, मुख्य चुनाव आयुक्त और उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी को चिट्ठी लिखी, जिसमें यूजीसी के नए नियमों को रॉलेट ऐक्ट जैसा बताया है।
उन्होंने कहा कि यूजीसी के प्रावधान भेदभावपूर्ण हैं। सामान्य वर्ग के छात्रों को शोषित करने वाले प्रावधान हैं। प्रावधानों से साजिशों का जन्म होगा। सामान्य वर्ग की छात्रा का शारीरिक शोषण भी संभव है। उनका कहना है कि सामान्य वर्ग का पक्ष रखने वाला कोई नहीं है इसलिए अब वैकल्पिक व्यवस्था बनाने का वक्त आ चुका है।
इसी संदर्भ में यूजीसी ऑफिस के बाहर प्रोटेस्ट करने वाले छात्रों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने चेयरमैन विनीत जोशी से मुलाकात की और अपनी शिकायतों का मेमोरेंडम सौंपा। उन्हें सकारात्मक आश्वासन मिला था। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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