बचपन को झुलसा रही युद्ध की बारूद

दुनिया भर में हर संघर्ष में सबसे बड़ी मार बचपन पर पड़ रही है। चाहे इजरायल-हमास-गाजा का संघर्ष रहा हो, चाहे सीरिया-लेबनान-ईरान में हुए टकराव। सबसे बड़ी कीमत बच्चों को चुकानी पड़ रही है। एशिया में बढ़ते युद्ध का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। मौजूदा टकराव में कई सौ बच्चे मिसाइल हमलों से मौत की नींद सो चुके हैं जबकि लाखों बच्चे बेघर हो गए हैं। वहीं, लाखों बच्चों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है उनकी स्कूली शिक्षा में रुकावट आ गयी है और वह दहशत के साए में असुरक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर हो रहे हैं। यह सब इक्कीसवीं सदी की कथित शिक्षित विकासशील दुनिया में हो रहा है। यह बता रहा है कि दुनिया का इंसान विज्ञान विकास और प्रगति के कितने भी दावे करे लेकिन वह सब बेमानी है जब कथित लोकतांत्रिक और ताकतवर देश दुनिया में हठधर्मी अराजकता फैलाए मनमाने टैरिफ वसूली करें तब दुनिया के अंतरराष्ट्रीय संगठन और संस्थाएं सिर्फ बगले झांकने का काम कर रहीं हैं तब तमाम मानवतावादी विचार और मानवाधिकारों की बाते भोथरी और खोखली बेमानी बन कर रह जाती हैं।
आपको बता दें संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी ने चेतावनी दी है कि लगातार बढ़ती हिंसा से लाखों बच्चों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है। इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति ने भी शांति की बात करते हुए युद्ध खत्म करने के लिए कुछ शर्तें सामने रखी हैं अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमलों की शुरुआत की थी। इस दौरान एक अमेरिकी मिसाइल मीनाब के शजारेह तैयबा स्कूल पर जाकर गिरी थी। इस हमले में 168 बच्चे और 14 शिक्षक मारे गए थे। मरने वालों में ज्यादातर छात्राएं थीं।
इस हमले की पूरी दुनिया में खूब निंदा की गई थी। अमेरिका भी मामले की जांच कर रहा है। दुनिया भर में चर्चा चल रही है कि क्या ये युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकता है? आपको बता दें कि यूनिसेफ ने कहा है कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष से पूरे पश्चिम एशिया में बच्चों की स्थिति बहुत गंभीर हो गई है। एजेंसी के अनुसार 28 फरवरी से अब तक हिंसा में एक हजार एक सौ से ज्यादा बच्चे घायल हुए हैं या उनकी मौत हो गई है। इनमें से लगभग दो सौ बच्चों की मौत ईरान में हुई है। वहीं इक्यानबे बच्चों की मौत लेबनान में हुई है। इसके अलावा चार बच्चों की मौत इजरायल में और एक बच्चे की मौत कुवैत में हुई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि अगर हिंसा इसी तरह बढ़ती रही तो मरने और घायल होने वाले बच्चों की संख्या और बढ़ सकती है। संस्था ने यह भी बताया कि इस संकट के कारण लाखों बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बाधा के कारण पूरे क्षेत्र में लाखों बच्चे स्कूल से वंचित हो गए हैं, जबकि सैकड़ों-हजारों बच्चे लगातार बमबारी के कारण विस्थापित हो गए हैं। अस्पतालों, स्कूलों और पानी और स्वच्छता प्रणालियों सहित नागरिक बुनियादी ढांचे, जिन पर बच्चे का जीवन निर्भर हैं, दोनों पक्षों द्वारा हमले किए गए हैं, उन्हें नुकसान पहुंचाया गया है या नष्ट कर दिया गया है। बच्चों की हत्या और उन्हें अपंग करना, या उन जरूरी सेवाओं पर हमला कर बर्बाद करना, जिन पर बच्चे निर्भर हैं, किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। लगातार बमबारी के कारण लाखों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं और सैकड़ों हजार बच्चे बेघर हो गए हैं। इजराइल लगातार लेबनान पर भी हमले कर रहा है। इस वजह से करीब 8 लाख लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इनमें 2 लाख से ज्यादा बच्चे हैं। यूनिसेफ ने कहा कि बच्चों की हत्या या उन्हें घायल करना किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता। संस्था ने यह भी कहा कि बच्चों के लिए जरूरी सेवाओं को नष्ट करना या बाधित करना भी गलत है। यूनिसेफ के अनुसार पूरे क्षेत्र में लगभग बीस करोड़ बच्चे हैं और वे उम्मीद कर रहे हैं कि दुनिया जल्द कदम उठाएगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि हिंसक टकराव की वजह से पूरे
मध्य पूर्व क्षेत्र में स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है और उपचार के लिए सेवाएँ सीमित होती जा रही हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह लड़ाकों और इसराइली सैन्य बलों में लड़ाई के बीच 11 हजार से अधिक गर्भवती महिलाएँ प्रभावित हैं और प्रवासी कामगारों के लिए भी जोखिम बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार लेबनान में 11,600 महिलाओं पर इस टकराव का असर हुआ है, जिनमें से 4 हजार अगले तीन महीनों के दौरान बच्चों को जन्म देंगी। ईरान पर इसराइली व अमेरिकी हवाई हमलों और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में भड़के भीषण टकराव ने लेबनान, कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ओमान समेत इस क्षेत्र में स्थित अनेक देशों को अपनी चपेट में ले लिया है।
शांति और मानवाधिकारों की तमाम अवधारणाओं और अंतरराष्ट्रीय कानून व मान्यताओं को दरकिनार कर स्कूली बच्चों और अस्पतालों में इलाज करा रहे रोगियों पर मिसाइल हमले इस खूनी मानसिकता की दरिंदगी भरी गाथा को उजागर कर रहे हैं। अपने स्वार्थ और सनक के चलते कई देशों के सत्ताधारी इंसानियत, बेगुनाहों और मजलूमों को दिन रात रौंद कर क्रूरता और वहशीपन का नया इतिहास लिख रहे हैं जिसे आने वाली सदियों तक पीढ़ियां भुगतान करने के लिए मजबूर होगीं।
ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने स्कूल पर हमले का जिक्र करते हुए लिखा है, सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में, कथित तौर पर हमले के तुरंत बाद का दृश्य दिख रहा है। जली हुई दीवारों से उठता धुआं दिख रहा है और सड़क पर मलबा बिखरा पड़ा है। सैकड़ों लोग घटनास्थल पर जमा हैं। अखबार लिखता है कि वो बम विस्फोट की रिपोर्ट, मृतकों की संख्या और वीडियो के स्रोत की तुरंत स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका लेकिन फैक्टचेक संगठन फैक्टनेमेह ने स्कूल परिसर की अन्य तस्वीरों के साथ वीडियो का मिलान किया और निष्कर्ष निकाला कि वीडियो प्रामाणिक है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी फुटेज की पुष्टि की है और बताया है कि यह स्कूल का ही है। गार्डियन ने लिखा है कि यह स्कूल इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर की बैरक में स्थित लग रहा है। दूसरी ओर कतर के न्यूज आउटलेट अल जजीरा की अरबी सेवा के मुताबिक अमेरिका ने मीनाब की स्कूली छात्राओं की जानबूझकर हत्या की है।
अल जजीरा ने लिखा कि सोशल मीडिया पर इस तबाही की तस्वीरें फैलते ही इसराइल और अमेरिका के अधिकारियों ने इस हमले से खुद को अलग बताने की कोशिश की। अल जजीरा ने लिखा, कुछ इसराइल समर्थित वेबसाइटों और सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दावा किया कि यह जगह इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के बेस का हिस्सा थी। लेकिन अल जजीरा की डिजिटल इन्वेस्टिगेशन यूनिट ने एक दशक से अधिक समय के सैटेलाइट चित्रों, हाल के वीडियो, समाचार रिपोर्टों और ईरानी सरकारी बयानों के विश्लेषण से बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है। जांच के निष्कर्ष बताते हैं कि कम से कम पिछले दस वर्षों से यह स्कूल पास के सैन्य ठिकाने से स्पष्ट रूप से अलग था। जांच यह भी संकेत देती है कि हमले के पैटर्न से उस खुफिया जानकारी की सटीकता पर गंभीर सवाल उठते हैं, जिसके आधार पर बमबारी की गई।
(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)


