सनातन धर्म पर थोपा गया ऐतिहासिक षडयंत्र

(गगन शर्मा-हिफी फीचर)
भारतीय समाज की जिन अवधारणाओं को सबसे अधिक तोड़ा-मरोड़ा गया है, उनमें वर्ण व्यवस्था अग्रणी है। आज जिसे हम जाति के रूप में देखते, झेलते और बहसों में घसीटते हैं, वह वैदिक समाज की मूल रचना नहीं, बल्कि इतिहास की एक दीर्घकालिक विकृति है। दुर्भाग्य यह है कि इस विकृति को या तो अज्ञानवश या विचारधारात्मक आग्रह में सनातन व्यवस्था बताकर प्रस्तुत किया जाता रहा है।
वैदिक दृष्टि में समाज चार मूल शक्तियों पर आधारित था, ब्राह्मण (मेघा शक्ति), क्षत्रिय (रक्षा शक्ति), वैश्य (वाणिज्य शक्ति और शूद्र (श्रम शक्ति)। ये चारों कोई ऊँच-नीच की सीढ़ियाँ नहीं थीं, बल्कि समाज रूपी शरीर के चार अनिवार्य अंग थे। क्या कोई भी समाज ज्ञान, सुरक्षा, व्यापार और श्रम के बिना जीवित रह सकता है ? उत्तर सहज है नहीं। तब प्रश्न यह उठता है कि यदि ये शक्तियाँ परस्पर पूरक थीं, तो भारतीय व्यवस्था को ही जन्म आधारित, अमानवीय और भेदभावपूर्ण क्यों ठहराया गया ?
इसका उत्तर स्वयं शास्त्रों में निहित है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये जातियाँ नहीं थीं, बल्कि कर्म-आधारित वर्ण थे। वैदिक समाज मानव को एक ही जाति मानता था, मानव जाति। ऋग्वेद का उदघोष अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते स्पष्ट करता है कि न कोई जन्म से श्रेष्ठ है, न कनिष्ठ श्रम का गौरव वैदिक चेतना की आत्मा था और व्यक्ति को उसकी रुचि, योग्यता और प्रवृत्ति के अनुसार कर्म चुनने की स्वतंत्रता थी।
यदि वर्ण जन्म से निर्धारित होते, तो महर्षि वाल्मीकि, वेदव्यास, विश्वामित्र, परशुराम और विदुर जैसे असंख्य उदाहरण इतिहास में कैसे संभव होते? इतिहास स्वयं जन्म-सिद्धांत को खंडित करता है। ऋग्वेद स्पष्ट घोषणा करता है अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते अर्थात न कोई श्रेष्ठ है, न कोई कनिष्ठ यह वाक्य वर्ण व्यवस्था का मृत्यु प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि जाति व्यवस्था के झूठ का पोस्टमार्टम है। अब असली प्रश्न पर आइए, जाति बनी कैसे ?
इस प्रश्न का उत्तर शिक्षा व्यवस्था के पतन में छिपा है। प्राचीन भारत की गुरुकुल परंपरा केवल वैचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं थी। वहाँ ज्ञान, चरित्र और कौशल का समन्वय था। कृषि, धातुकर्म, चिकित्सा, वास्तु, व्यापार और युद्धकला जैसे अनेक क्षेत्रों में व्यावहारिक प्रशिक्षण उपलब्ध था। विद्यार्थी अपनी योग्यता के अनुसार कर्म चुनता था और वही उसका वर्ण बनता था।
यह व्यवस्था अचानक नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक ऐतिहासिक प्रक्रिया में नष्ट हुई। विदेशी आक्रमणों, राजनीतिक अस्थिरता और बाद में औपनिवेशिक नीतियों ने शिक्षा केंद्रों की रीढ़ तोड़ दी। गुरुकुल उजड़े, आचार्य मारे गए या विस्थापित हुए और ज्ञान की परंपरा सार्वजनिक से पारिवारिक हो गई। जो कौशल जिस परिवार में बचा, वही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने लगा। यहीं से कर्म का स्थान विरासत ने ले लिया और वर्ण धीरे-धीरे जाति में बदल गया।
विडंबना यह है कि इसी विकृति को बाद के काल में शास्त्रसम्मत बताने का प्रयास हुआ, जबकि स्वयं मनुस्मृति में कहा गया है-
शूद्रो ब्राह्मणता एति ब्राह्मणश्चेति शुद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातं एवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च।।
भावानुवाद- शूद्र भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो सकता है और ब्राह्मण भी शुद्रत्व को प्राप्त हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय से उत्पन्न व्यक्ति वैश्य हो सकता है और वैश्य से भी अन्य वर्ण में परिवर्तन संभव है।
संदर्भार्थ- मनुस्मृति के अध्याय 10वें श्लोक संख्या 65 में वर्णों की उत्पत्ति, उनके कर्म, और गुण-कर्म के आधार पर वर्ण परिवर्तन की अवधारणा का वर्णन है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि वर्ण जन्म से अपरिवर्तनीय नहीं, बल्कि आचरण और कर्म से निर्धारित होता है।
जाति को कठोर और स्थायी पहचान देने का कार्य औपनिवेशिक शासन में हुआ। सन् 1901 की जनगणना में ब्रिटिश अधिकारी हर्बर्ट होप रिस्ले ने प्रशासनिक सुविधा और बाँटो और राज करो की नीति के तहत भारतीय समाज को स्थायी जातियों में बाँट दिया। वर्णों को जन्म-आधारित जातियों के रूप में परिभाषित किया गया। यह कोई अकादमिक भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति थी। इसके परिणाम दूरगामी और घातक रहे। वही श्रम शक्ति, जिसने सदियों तक भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाए रखा, उसे हीनता-बोध में धकेल दिया गया। औपनिवेशिक वर्गीकरण स्वतंत्र भारत में भी लगभग यथावत स्वीकार कर लिया गया। सामाजिक न्याय के उद्देश्य से बनी संवैधानिक श्रेणियाँ धीरे-धीरे स्थायी पहचान बन गईं।
यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है कि क्या मनुस्मृति अधिक कठोर है या आधुनिक व्यवस्था ? जहाँ शास्त्र वर्ण परिवर्तन की संभावना स्वीकार करते हैं, वहीं आधुनिक ढाँचा व्यक्ति को अनेक पहचानें बदलने की स्वतंत्रता देता है, पर जाति बदलने का अधिकार नहीं। क्या यह जड़ता सामाजिक समरसता को बढ़ाती है या उसे और जटिल बनाती है ?
आज स्थिति यह है कि वर्ण-दृष्टि समाप्त कर दी गई है और जाति को पोषित किया जा रहा है। श्रम का गौरव नहीं, बल्कि श्रम की पहचान को हीन बनाया गया है। समाधान न तो अतीत में लौटने में है, न किसी ग्रंथ को दोषी ठहराने में, बल्कि सत्य को स्वीकार करने में है।
जब तक हम वर्ण और जाति के अन्तर को नहीं समझेंगे, तब तक सामाजिक न्याय और समरसता केवल नारे बने रहेंगे। जाति-आधारित समाज वैदिक नहीं, बल्कि औपनिवेशिक विरासत है और इस सत्य को स्वीकार किए बिना किसी भी सुधार की कल्पना अधूरी ही रहेगी। (हिफी)


