नेपाल में भी राम राज्य

हमारा पड़ोसी देश नेपाल दुनिया का एक मात्र घोषित हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था। वहां वामपंथियों ने राजतंत्र को हटाकर प्रजातंत्र कायम किया। यह वामपंथी प्रजातंत्र जनता को रास नहीं आया और हाल ही में युवाओं ने जबर्दस्त आंदोलन करके ओली सरकार को उलट दिया। आंदोलन के फल स्वरूप जनता की चुनी सरकार गठित करने के लिए संविधान के अनुसार चुनाव कराये गये। देश की 275 सदस्यीय संसद में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने 182 सीटों पर विजयश्री प्राप्त की। आरएसपी के नेता बालेन्द्र शाह ने 182 सीटों पर विजयश्री प्राप्त की। अब बालेन्द्र शाह रामनवमी (27 मार्च 2026) को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। बालेन्द्र शाह ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत जनकपुर से की थी जिसे माता सीता की जन्मस्थली माना जाता है। इस प्रकार रामनवमी के शुभ दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ लेना और जनकपुर से चुनाव अभियान की शुरुआत से संकेत मिलता है कि नेपाल में फिर से रामराज्य की स्थापना होने वाली है। बालेन्द्र शाह खुलकर हिन्दुत्व की बात तो नहीं कर रहे हैं लेकिन उनका झुकाव आस्था की तरफ है। भगवान राम को भी लोगों ने अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा है। महिर्ष बाल्मीकि और तुलसी के राम कुछ मायने मंे अलग-अलग हैं, उसी प्रकार नेपाल में बालेन्द्र शाह की आस्था भी नई सोच के साथ सामने आ रही है। नेपाल में जनता की सोच भी उनका साथ दे रही है। वामपंथी विचारधारा के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को बालेन्द्र शाह ने ही चुनाव में करीब 50 हजार वोटों से हराया है।
हाल ही में नेपाल में चुनाव हुए हैं। 35 साल के युवा नेता बालेंद्र शाह अब देश के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं, लेकिन उनकी शपथ की तारीख ने इस खबर को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है। बालेंद्र शाह 27 मार्च को राम नवमी के दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। यह फैसला सिर्फ एक तारीख तय करना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, शाह ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत जनकपुर से की थी, जिसे माता सीता की जन्मस्थली माना जाता है। अब राम नवमी के दिन शपथ लेना उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम नेपाल की जनता की आस्था को स्वीकार करने का संकेत है। बालेंद्र शाह का यह कदम सीधे तौर पर लोगों की भावनाओं से जुड़ने की कोशिश है। उनका कहना है कि शाह के समर्थक युवा हैं और राजशाही के खिलाफ रहे हैं, इसलिए इसे पुराने धार्मिक राजतंत्र से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। नेपाल हमेशा से अपनी अलग राष्ट्रीय और धार्मिक पहचान बनाने की कोशिश करता रहा है, जिसमें रामायण की परंपरा को भी वह अपने तरीके से देखता है। बालेंद्र शाह इस फैसले के जरिए यह संकेत दे रहे हैं कि वह हिंदू पहचान से दूरी नहीं बना रहे, लेकिन वह उस तरह के हिंदुत्व की बात भी नहीं कर रहे जो राजशाही के दौर में था, जब राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। यानी साफ है कि बालेंद्र शाह का यह कदम सिर्फ एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक संतुलित राजनीतिक संदेश है, जिसमें आस्था भी है, लेकिन नई सोच के साथ।
हाल ही में हुए चुनावों में उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने भारी जीत दर्ज की। पार्टी ने 275 सदस्यीय संसद में 182 सीटें हासिल कीं, जो एक बड़ा जनादेश माना जा रहा है। शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को करीब 50 हजार वोटों से हराया। बालेंद्र शाह को बालेन के नाम से भी जाना जाता है। वह नेपाल की नई पीढ़ी का चेहरा हैं। वह पहले एक रैपर के रूप में चर्चित हुए, जहां उन्होंने अपने गानों के जरिए भ्रष्टाचार और सिस्टम पर सवाल उठाए। इसके बाद 2022 में उन्होंने काठमांडू के मेयर का चुनाव जीता और अब प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। खास बात यह है कि वह मधेशी समुदाय से आते हैं और इस पद तक पहुंचने वाले पहले नेता हैं।
बालेन्द्र शाह नेपाल के एक संरचना इंजीनियर, पूर्व रैपर एवं राजनेता हैं। उन्होंने 30 मई 2022 से 18 जनवरी 2026 तक काठमांडू के 15वें मेयर के रूप में कार्य किया। वे काठमांडू के महापौर के रूप में चुने जाने वाले प्रथम निर्दलीय प्रत्याशी थे।
बालेन शाह सन् 2012 से नेपाली हिप-हॉप उद्योग का हिस्सा रहे हैं। 2022 के स्थानीय चुनाव में, वे नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार श्रीजना सिंह और सीपीएन (यूएमएल) के उम्मीदवार और काठमांडू के पूर्व मेयर केशव स्थापित को हराकर महापौर चुने गए थे। काठमाण्डू के मेयर के रूप में उनके कार्यकाल में अपशिष्ट प्रबंधन और सड़क यातायात नियंत्रण में सुधार आदि कार्य हुए लेकिन अवैध पुनर्वास, अवैध रूप से निर्मित निजी संरचनाओं को ध्वस्त करने और सड़क विक्रेताओं के उत्पीड़न जैसे जटिल मुद्दों पर उनके उग्र दृष्टिकोण भी चर्चा मंे रहे। इसीलिए 3, जनवरी 2026 में बालेन शाह ने काठमांडू के महापौर के पद को त्याग दिया और 2026 के आम चुनाव लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) में शामिल हो गए। बालेन शाह का जन्म 27 अप्रैल 1990 को काठमांडू के नारादेवी में मैथिली मूल के एक परिवार में हुआ था। उनके पिता राम नारायण शाह एक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं जबकि उनकी माँ का नाम ध्रुवदेवी शाह है। वे उनके सबसे छोटे पुत्र हैं। उनके पिता की नरदेवी आयुर्वेदिक अस्पताल में पदस्थापन के बाद उनके माता-पिता माधेश प्रांत के महोतरी जिले से काठमांडू चले गए।
बालेन शाह ने वी.एस. निकेतन हायर सेकेंडरी स्कूल से अपनी अपनी 10वीं की शिक्षा पूरी की। उन्होंने हिमालयन व्हाइटहाउस इंटरनेशनल कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री (बीई) ए-10 प्राप्त की भारत के कर्नाटक राज्य के विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (वीटीयू) से उन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री (एमटेक) भी प्राप्त की। उनको काठमांडू विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग में पर्यटन और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए नेवा विरासत संरचनाओं का संरक्षण विषय पर पीएचडी अध्ययन के लिए केयू शोधकर्ता की फेलोशिप से सम्मानित किया गया था।
बालेन शाह की पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि नेपाल की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। नई सरकार के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं होंगी। नेपाल की अर्थव्यवस्था अभी कई समस्याओं से जूझ रही है। बेरोजगारी, विदेशों में श्रमिकों पर निर्भरता, सीमित औद्योगिक विकास और राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याएँ लंबे समय से बनी हुई हैं। इन चुनौतियों का समाधान किए बिना नेपाल को स्थायी विकास की दिशा में आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा।
नेपाल की नई सरकार के सामने विदेश नीति के स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। नेपाल भौगोलिक रूप से दो बड़ी शक्तियों के बीच स्थित है, इसलिए उसकी विदेश नीति हमेशा संतुलन और व्यावहारिकता पर आधारित रही है। भारत और नेपाल के बीच
1950 की शांति और मैत्री संधि ने
दोनों देशों के संबंधों को विशेष आधार प्रदान किया है। व्यापार, ऊर्जा, जल संसाधन और आधारभूत संरचना के क्षेत्रों में भारत नेपाल का एक प्रमुख साझेदार रहा है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)
