बच्चों को सिखाएं संस्कार

अभिभावकों को बच्चों के पालन-पोषण में उन्हें संस्कारों से जोडने पर बल देना होगा वरना उनके जीवन में पतन की राह खुलने से कोई नही रोक सकता है। किशोर अवस्था से यौवन की ओर कदम बढ़ाती लड़किया कई बार अभिभावकों की खुली छूट या माडर्न बिंदास जीवन शैली के भ्रम में गलत रास्ते पर चली जाती है। सोना बाबू आउटिंग डेटिंग लव अफेयर्स और लिव-इन का सिलसिला कब जीवन को चैराहे पर छोड़ दे, कुछ नहीं कहा जा सकता है। जब किशोर से युवावस्था की दहलीज पर कदम बढ़ा रही लड़कियां बाहरी युवाओं के संपर्क में आतीं है तब उचित देख भाल और परिजनों से अपनी समस्याओं के बारे में संवाद होना जरूरी है अन्यथा लड़किया आसानी से दूसरे युवाओं को अपनी अंतरंग बात शेयर कर देती है। कई बार प्रेमियों पर भरोसा कर अंतरग पल बिता लेती है यहीं से इनके चालाक और रईसजादी बीबी पाने का मन बना चुके आशिक इनके अंतरंग पलो के फोटो और वीडियो कैप्चर कर स्टोर कर लेते हैं और जब जवानी के नशे में हुई गलतियों से बाहर निकल कर किसी केतन के साथ सगाई करती हैं तो इनके एक्स आशिक इनके फोटो वीडियो फ्लेश करने की धमकी दे कर बरगलाते है। सामाजिक प्रतिष्ठा और घर परिवार की इज्जत नीलाम होने के भय से ऐसी लड़किया एक्स के इशारे और सहयोग से मंगेतर को ही पहाड़ी से धकेल कर मारने का अक्षम्य अपराध कर जाती हैं। इस मामले की तह तक पड़ताल कर सारे षडयंत्र को बुनने वाले चेतन बाबूलाल का नारको टैस्ट होना चाहिए सिया गोयल एक बेबकूफ नादान मोहरा है। दोनों को फास्ट कोर्ट में सुनवाई कर फांसी की सजा होनी चाहिए। अभिभावकों को अपनी सियाओ पर नकेल कस कर उनके अनुसार विवाह का निर्णय लेना चाहिए ताकि कोई राजा रघुवंशी या केतन विशाल अग्रवाल किसी नागिन के मंगेतर होने की कीमत जान से न चुकाए।
पुणे में घटित केतन विशाल अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर भारतीय समाज की उन परतों को उधेड़ दिया है जिसे जान कर भी मानने से इंकार किया जा रहा हैं, क्योंकि हमें आदर्शवादी समाज का दिखावा बनाए रखना है। असीम संभावनाओं से भरे 26 साल के केतन अग्रवाल की हत्या उनकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने प्रेमी चेतन चैधरी के साथ मिलकर कर दी। पुणे के पास लोहागढ़ के किले में ट्रेकिंग के बहाने सिया केतन को ले गई, उससे पहले अपने जन्मदिन का जश्न केतन के साथ मनाया और बाकायदा सोशल मीडिया पर उसे डाला भी। उन वीडियो को देखकर जरा सा अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इस दौरान कितनी भयावह योजना उसके दिमाग में चल रही होगी। लोहागढ़ किले में जब केतन और सिया पहुंचे तो उनके साथ-साथ चेतन चैधरी भी पहुंचा, जिसके साथ मिलकर सिया ने केतन को ऊंचाई से धक्का दे दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर फिर पोस्ट डाली कि जन्मदिन पर तुम मुझे छोड़ कर चले गए। पहले पहल इसे सामान्य दुर्घटना मानकर सिया के लिए ही सबकी सहानुभूति उमड़ी कि नवंबर में इनकी शादी होनी थी, जिसके लिए दोनों परिवार जमकर तैयारी कर रहे थे। जयपुर में शाही अंदाज में शादी करवाने के लिए 17 करोड़ रूपयों में एक महल भी बुक करवा लिया गया था, लेकिन उससे पहले इतना बुरा हादसा हो गया। पुलिस ने जब इस दुर्घटना की जांच शुरु की तो कुछ अजीबोगरीब संयोगों पर नजर गई, जैसे शादी से पहले की फोटोग्राफी करवाने के लिए यह जोड़ा बाली जाने वाला था, और एक दिन पहले केतन का पासपोर्ट अचानक गुम हो गया। 14 जून को भी सिया और केतन लोहागढ़ ट्रेक पर गए थे, जहां केतन को सिया ने धक्का दिया था और उसने झाड़ी पकड़कर खुद को बचाया था, तब सिया ने कहा था कि उसने सांप देखा और केतन की जान बचाने के लिए घबराहट में उसे धक्का दिया लेकिन 18 जून को जब यह जोड़ा फिर से लोहागढ़ ट्रेक पहुंचा तो इस बार उनके करीब ही एक युवक सर्दियों में पहने जाने वाली हुडी को पहना हुआ था और उसका चेहरा छिपा था, जबकि पुणे में अभी गर्मी ही है। पुलिस ने जब इन सारे तथ्यों की गहराई से पड़ताल की तो यह समझने में वक्त नहीं लगा कि यह सामान्य हादसा नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत की गई हत्या थी।
अब सिया पुलिस की गिरफ्त में है, केतन के घरवाले स्वाभाविक तौर पर उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। उनका एक ही सवाल है कि अगर किसी और से प्यार था और केतन से शादी नहीं करनी थी, तो पहले ही अपने घरवालों को मना कर देना था, इसके लिए हमारे बेटे को मारने की क्या जरूरत थी। ठीक ऐसा ही सवाल पिछले साल मेघालय में क्रूरता से मारे गए राजा रघुवंशी के घर वाले भी पूछ रहे थे। जब राजा से शादी करने के चंद दिनों बाद सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर उनकी हत्या कर दी थी। असल में इन्हें प्रेमी या प्रेमिका कहना प्रेम जैसे पवित्र भाव का अपमान करने जैसा है, ये अपराध में भागीदार होते हैं, इससे ज्यादा इन्हें और कुछ नहीं कहा जा सकता। ये वासना के सने कीड़े है।
बहरहाल, इंदौर से लेकर पुणे तक अपने जीवनसाथी को मारने की घटनाएं समाज में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को तो दिखाती ही हैं, साथ ही यह संकेत भी देती हैं कि एक परंपरागत लीक पर समाज को चलाने की कोशिश कई बार कितने भयावह परिणाम लाती है। न जाने क्यों भारतीय समाज में अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने या किसी से प्यार करने के बाद शादी करने को अभी भी समाज घटिया या हिकारत से देखता है। आज के दौर में भी बहुत से अभिभावक यह कहने से हिचकते हैं कि उनकी बेटी या बेटे ने अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुना है। पितृसत्तात्मक समाज बेटे की पसंद को एक बार सहजता से स्वीकार कर भी ले, लेकिन अधिकतर घरों में बेटियां खुलकर जीवनसाथी के लिए अपनी मर्जी का इजहार कर ही नहीं पाती हैं। अगर करें तो उसे या तो पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव बताया जाता है, या फिर निर्लज्जता की श्रेणी में डाला जाता है। शायद इसी वजह से कई बार सही राह पर चलकर अपनी मर्जी बताने की जगह हत्या करने जैसा आपराधिक कदम उठाया जाता है, जिसकी कोई माफी नहीं दी जा सकती। जो इंसान किसी दूसरे की जान लेने जैसा अतिरेक भरा कदम उठा सकता है, वो इतनी हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाता कि शादी के लिए अपनी मर्जी बताए या मां-बाप के दबाव को मानने से इंकार करे।
सिया गोयल और सोनम रघुवंशी दोनों को यदि सामाजिक दायरे में पर्याप्त पारिवारिक नियंत्रण और मर्यादा में रहकर जीने का विचार दिया जाता तो वह किसी आशिक के जाल में फंस कर अपराध की ओर अग्रसर नही होती। या फिर उन्हें अपने पसंद के लड़कों से शादी करनी थी या मां-बाप की मर्जी से शादी नहीं करनी थी, तो वे पहले बता सकती थीं, इससे घर बर्बाद नहीं होते, न ही विवाह जैसी संस्था से भरोसा उठता। मगर इन्होंने गलत राह चुनी। हालांकि इनके कारण केवल लड़कियों पर सवाल उठाने से इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं मिलेगा। अभी बीते दिनों नोएडा से लेकर भोपाल कलकत्ता से लेकर देहरादून तक दहेज हत्याओं या ससुराल में मिली प्रताड़ना के कारण हुई मौतों के मामले सामने आए, जिनमें नवयुवतियों की जिंदगी बर्बाद हुई और उनके मां-बाप जिंदगी भर का दुख अब उठा रहे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि बड़ों के सामने खुलकर अपनी राय रखने को आज भी बदतमीजी बताया जाता है। हमारे जमाने में तो बिना दिखाए-बताए शादी हो जाती थी और कोई हूं-चू नहीं करता था, जैसी बातें सुनाकर नयी पीढ़ी को तिरस्कृत करना आम बात है। अच्छी संतानें उन्हें ही माना जाता है जो बिना ना-नुकुर के, बिना किसी सवाल के बड़ों के फैसले को मान ले। इसमें मां-बाप तो आज्ञाकारी संतान होने की खुशी मना लेते हैं, लेकिन अपनी मर्जी दबाने की कुंठा कई तरीकों से बाहर आती है, जिसमें अक्सर जीवनसाथी ही प्रभावित होते हैं।(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)


