अध्यात्म

यही मेरा वतन है

(यह मेरी मातृभूमि है-भाग-2)

इधर से निराश होकर मैं उस चैपाल की ओर चला जहाँ शाम को पिताजी गाँव के और बड़े-बूढ़ों के साथ हुक्का पीते और हँसी-दिल्लगी करते थे। हम भी उस चट पर कलाबाजियाँ खाया करते। कभी-कभी वहाँ पंचायत भी बैठती थी जिसके सरपंच हमेशा पिताजी ही होते थे। इसी चैपाल से लगी हुई एक गोशाला थी जहाँ गाँवभर की गायें रखी जाती थीं और हम यहीं बछड़ों के साथ कूदते-फाँदते किया करते थे। अफसोस, अब इस चैपाल का पता न था। वहाँ अब गाँव के टीका लगाने का स्टेशन और एक डाकखाना था।
उन दिनों इसी चैपाल से लगा हुआ एक कोल्हू था जहाँ जाड़े के दिनों में ऊख पेरी जाती थी और गुड़ की महक से दिमाग तर हो जाता था। हम और हमारे हमजोली घंटों गन्नेड़ियों के इंतजार में बैठे रहते थे और गन्नेड़ियाँ काटने वाले मजदूरों के हाथों की तेजी पर अचरज करते थे, जहाँ सैकड़ों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिलाकर पिया था। यहाँ आसपास के घरों से औरतें और बच्चे अपने-अपने घड़े लेकर आते और उन्हें रस से भरवाकर ले जाते। अफसोस, वह कोल्हू अभी ज्यों का त्यों गड़े हुए हैं मगर देखो, कोल्हाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटने वाली मशीन है और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेट की दुकान है।
दिल को छलनी करने वाले इन दृश्यों से दुखी होकर मैंने एक आदमी से जो सूरत से शरीफ नजर आता था, कहा-बाबा, मैं परदेसी मुसाफिर हूँ, रातभर पड़े रहने के लिए मुझे जगह दे दो। इस आदमी ने मुझे सिर से पैर तक घूरकर देखा और बोला- आगे जाओ, यहाँ जगह नहीं है। मैं आगे गया और यहाँ से फिर हुक्म मिला- आगे जाओ। पाँचवीं बार सवाल करने पर एक साहब ने मुट्ठीभर चने मेरे हाथ पर रख दिये। चने मेरे हाथ से छूटकर गिर पड़े और आँखों से आँसू बहने लगे। हाय, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है। यह हमारा मेहमान और मुसाफिर की आवभगत करने वाला प्यारा देश नहीं, हरगिज नहीं।
मैंने एक सिगरेट की डिबिया ली और एक सुनसान जगह पर बैठकर बीते दिनों की याद करने लगा कि यकायक मुझे उस धर्मशाला का खयाल आया जो मेरे परदेश जाते वक्त बन रहा था। मैं उधर की तरफ लपका कि रात किसी तरह वहीं काटूँ, मगर अफसोस, हाय अफसोस, धर्मशाला की इमारत ज्यों-की-त्यों थी लेकिन उसमें गरीब मुसाफिरों के रहने के लिए जगह न थी। शराब और शराबखोरी, जुआ और बदचलनी का वहाँ अड्डा था। यह हालत देखकर बरबस दिल से एक ठंडी आह निकली, मैं जोर से चीख उठा-नहीं-नहीं और हजार बार नहीं, यह मेरा वतन, मेरा प्यारा देश, मेरा प्यारा भारत नहीं है। यह कोई और देश है। यह यूरोप है, अमेरिका है, मगर भारत हरगिज नहीं।
अँधेरी रात थी। गीदड़ और कुत्ते अपने राग अलाप रहे थे। मैं दर्द-भरा दिल लिये उसी नाले के किनारे जा कर बैठ गया और सोचने लगा कि अब क्या करूँ? क्या फिर अपने प्यारे बच्चों के पास लौट जाऊँ और अपनी नामुराद मिट्टी अमेरिका की खाक में मिलाऊँ? अब तो मेरा कोई वतन न था, पहले मैं वतन से अलग जरूर था मगर प्यारे वतन की याद दिल में बनी हुई थी। अब बेवतन हूँ, मेरा कोई वतन नहीं। इसी सोच-विचार में मैं बहुत देर तक चुपचाप घुटनों में सिर दिये बैठा रहा। रात आँखों ही आँखों में कट गयी, घड़ियाल ने तीन बजाये और किसी के गाने की आवाज कानों में आयी। दिल ने गुदगुदाया, यह तो वतन का नगमा है, अपने देश का राग है। मैं झट उठ खड़ा हुआ।
क्या देखता हूँ कि पन्द्रह-बीस औरतें, बूढ़ी, कमजोर, सफेद धोतियाँ पहने, हाथों में लोटे लिये, स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं-
प्रभु, मेरे अवगुण चित न धरो
इस मादक और तड़पा देने वाले राग से मेरे दिल की जो हालत हुई उसका बयान करना मुश्किल है। मैंने अमेरिका की चंचल से चंचल, हँसमुख से हँसमुख सुन्दरियों की अलाप सुनी थी और बहुत बार उनकी जबानों से मुहब्बत और प्यार के बोल सुने थे जो मोहक गीतों से भी ज्यादा मीठे थे। मैंने प्यारे बच्चों के अधूरे बोलों और तोतली बानी का आनन्द ठाया था। मैंने सुरीली चिड़ियों का चहचहाना सुना था। मगर जो लुत्फ, जो मजा, जो आनन्द मुझे इस गीत में आया वह जिन्दगी में कभी और हासिल न हुआ था। मैंने खुद गुनगुनाना शुरू किया-
प्रभु, मेरे अवगुण चित न धरो
तन्मय हो रहा था कि फिर मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुनायी पड़ी और कुछ लोग हाथों में पीतल के कमण्डल लिये शिव-शिव, हर-हर, गंगे गंगे, नारायण-नारायण कहते हुए दिखाई दिये। मेरे दिल ने फिर गुदगुदाया, यह तो मेरे देश, प्यारे देश की बातें हैं। मारे खुशी के दिल बाग-बाग हो गया। मैं इन आदमियों के साथ हो लिया और एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः मील पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद हम उस नदी के किनारे पहुँचे जिसका नाम पवित्र है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना हर हिन्दू सबसे बड़ा पुण्य समझता है। गंगा मेरे प्यारे गाँव से छः-सात मील पर बहती थी और किसी जमाने में सुबह के वक्त घोड़े पर चढ़कर गंगामाता के दर्शन को जाया करता था। उनके दर्शन की कामना मेरे दिल में हमेशा थी। यहाँ मैंने हजारों आदमियों को इस सर्द, ठिठुरते हुए पानी में डुबकी लगाते देखा। कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री मंत्र जप रहे थे। कुछ लोग हवन करने में लगे हुए थे। कुछ लोग माथे पर टीके लगा रहे थे। कुछ और लोग वेदमंत्र सस्वर पढ़ रहे थे। मेरे दिल ने फिर गुदगुदाया और मैं जोर से कह उठा- हाँ हाँ, यही मेरा देश है, यही मेरा प्यारा वतन है, यही मेरा भारत है। और इसी के दर्शन की, इसी की मिट्टी में मिल जाने की आरजू मेरे दिल में थी।
मैं खुशी से पागल हो रहा था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतार फेंका और जाकर गंगा माता की गोद में गिर पड़ा, जैसे कोई नासमझ, भोला-भाला बच्चा दिन-भर पराये लोगों के साथ रहने के बाद शाम को अपनी प्यारी माँ की गोद में दौड़कर चला आये, उसकी छाती से चिपट जाये। हाँ, अब अपने देश में हूँ। यह मेरा प्यारा वतन है, यह लोग मेरे भाई हैं, गंगा मेरी माता है।
मैंने ठीक गंगाजी के किनारे एक छोटी-सी झोंपड़ी बनवा ली है और अब मुझे सिवाय रामनाम जपने के और कोई काम नहीं। मैं रोज शाम-सवेरे गंगा-स्नान करता हूँ और यह मेरी लालसा है कि इसी जगह मेरा दम निकले और मेरी हड्डियाँ गंगामाता की लहरों की भेंट
चढ़ें।
मेरे लड़के और मेरी बीवी मुझे बार-बार बुलाते हैं मगर अब मैं गंगा का किनारा और यह प्यारा देश छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता। मैं अपनी मिट्टी गंगाजी को सौंपूँगा। अब दुनिया की कोई इच्छा, कोई आकांक्षा मुझे यहाँ से नहीं हटा सकती क्योंकि यह मेरा प्यारा देश, यह मेरी प्यारी मातृभूमि है और मेरी लालसा है कि मैं अपने देश में मरूँ।
(हिफी डेस्क-हिफी फीचर)

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