अध्यात्म

यह सुभ संभु उमा संवादा…17

देव-मनुज को तुलसीदास का वंदन

आज के व्यस्तता के युग में कथा-कहानी सुनने का समय लोगों के पास नहीं रह गया है। यह बात गोस्वामी तुलसीदास ने पांच सौ साल पहले ही अनुभव की थी। इसलिए वह रामचरित मानस की कथा में पुण्य देने वाली भावना का समावेश करने का प्रयास करते रहे और साथ ही उसे मधुर बनाने के लिए जन सामान्य के बीच प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया। इसीलिए आज भी रामचरित मानस का नियमित
और अखण्ड पाठ किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा कलियुग के और पूर्ववर्ती कवियों को प्रणाम करने के साथ ही देव कृपा के बिना हमारी यह कथा पुनीत और मधुर नहीं हो सकती-
पुनि बंदउं सारद सुरसरिता, जुगल पुनीत मनोहर चरिता
मज्जन पान पाप हर एका, कहत सुनत एक हर अविवेका
गुर पितु-मातु महेस भवानी, प्रनवउं दीनबंधु दिन दानी
सेवक स्वामि सखा सिय पीके, हित निरुपधि सब विधि तुलसी की।
इसलिए मैं सरस्वती जी और देवनदी गंगा जी की पुनः वंदना करता हूं। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्र वाली हैं। एक (गंगा जी) स्नान करने और जल पीने से पापों को हरती हैं और दूसरी (सरस्वती जी) गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं। इसी तरह श्री महेश और मां पार्वती को मैं प्रणाम करता हूं जो मेरे गुरु और माता-पिता हैं। भगवान शंकर को दीनबंधु और नित्य दान करने वाला (अवढर दानी) कहा जाता है। शिव जी सियापति श्री रामचन्द्र के सेवक, स्वामी और सखा हैं तथा मुझे (तुलसीदास का) सब प्रकार के कपट रहित (सच्चा) हित करने वाले हैं।
कलि बिलोकि जगहित हर गिरिजा, साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।
अनमिल आखर अरथ न जापू, प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।
सेा उमेस मोहि पर अनुकूला, करिहिं कथा मुद मंगल मूला।।
सुमिरि सिवासिव पाइ पसाऊ बरनउं रामचरित चित चाऊ।
भनिति मोरि सिव कृपा विभाती, ससि समाज मिलि मनहुं सुराती।
वही प्रभु शिव व माता पार्वती ने कलियुग को देखकर सम्पूर्ण जगत के हित के लिए शाबर मंत्र समूह की रचना की, जिन मंत्रों के अक्षर बेमेल हैं जिनका न कोई ठीक अर्थ होता है और न जप ही होता है तथापि श्री शिवजी के प्रताप से जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हम सभी जानते हैं कि बम-बम-बम भोले जैसे शब्द बोलकर शंकर जी की उपासना की जाती है। इनका कोई अर्थ नहीं है लेकिन भगवान शिव इन शब्दों को सुनकर भी प्रसन्न हो जाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि वही उमापति शिव जी मुझ पर प्रसन्न होकर श्री रामजी की इस कथा को आनंद और मंगल के मूल अर्थात आनंद का अनंत स्रोत पैदा करने वाली बनाएंगे। इस प्रकार मां पार्वती और शिव जी दोनों की कृपा दोनों का स्मरण करके और उनका प्रसाद पाकर मैं चाव भरे चित से (मन से) श्री रामचरित्र का वर्णन करता हूं। इससे मेरी कविता श्री शिवजी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी जैसी तारागणों के सहित चन्द्रमा के साथ रात्रि शोभा पाती है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
जे एहि कथहि सनेह समेता, कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता
होइहहिं रामचरन अनुरागी, कलिमल रहित सुमंगल भागी।
जो इस कथा को प्रेम सहित और सावधानी के साथ सुनेंगे और कहेंगे वे कलियुग के पापों से रहित और सुंदर कल्याण के भागी होकर श्री रामचन्द्र जी के चरणों के प्रेमी बन जाएंगे।
सपनेहुं साचेहुं मोहिपर जौं हर गौरि पसाउ
तौ फुर होउ जो कहेउं सब भाषा भनिति प्रभाउ।
अर्थात यदि मुझ पर श्री शिवजी और पार्वती जी की स्वप्न में भी सचमुच प्रसन्नता हो तो मैंने भाषा-कविता की अज्ञानता के बारे में जो कुछ कहा है मुझे कोई ज्ञान नहीं है तो भगवान की
कृपा से इसमें कविता के सभी गुण पैदा हो जाएंगे-यह बात सच हो जाएगी।
गोस्वामी तुलसीदास ने वंदना के क्रम में भगवान राम की पावन नगरी अयोध्या और उनके परिवार के सभी लोगों की भी स्तुति की है-
बंदउं अवधपुरी अति पावनि, सरजू सरि कलि कलुष नसावनि
प्रनवउं पुर नरनारि बहोरी, ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।
अर्थात मैं अति पवित्र श्री
अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली श्री सरयू नदी की वंदना करता हूं। अवधपुरी के इन नर-नारियों को प्रणाम करता हूं जिन पर प्रभु श्री रामचन्द्र जी की ममता थोड़ी नहीं बल्कि बहुत ज्यादा है।
सिय निंदक अध ओध नसाए, लोक विसोक बनाइ बसाए
बंदउं कौसल्या दिसि प्राची, कीरति जासु सकल जगमाची
प्रगटेउ जहं रघुपति ससि चारू, विस्व सुखद खलकमल तुसारू
दसरथ राउ सहित सब रानी, सुकृत सुमंगल मूरति मानी
करउं प्रनाम करम मन बानी करहु कृपा सुत सेवक जानी
जिन्हहिं बिरचि बड़ भयउ विधाता, महिमा अवधि राम पितु माता
बंदउं अवध भुआल, सत्य प्रेम जेहि राम पद
बिछुरत दीनदयाल, प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।
अयोध्या वासियों पर राम की ममता का उल्लेख करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभुराम ने अयोध्या के रहने वाले उस धोबी को भी पाप मुक्त किया जिसने सीता जी की इसलिए निंदा की थी कि उनको रावण अपहरण करके लंका ले गया था। धोबी और अयोध्या के कई लोग यह आरोप लगा रहे थे कि दूसरे व्यक्ति (रावण) के घर में रही सीता को राम ने अपनी पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर लिया। ऐसे निंदक को भी प्रभु राम ने इसलिए पुण्य धाम दिया क्योंकि वह अयोध्या का रहने वाला था। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं कौसल्या रूपी पूर्व दिशा की वंदना करता हूं जिसकी कीर्ति समस्त संसार में फैल रही है। वह कहते हैं कि कौसल्या रूपी पूर्व दिशा से विश्व को सुख देने वाले और दुष्ट रूपी कमलों के लिए पाले के समान श्री रामचन्द्र रूपी सुंदर चन्द्रमा प्रकट हुए। कमल के बारे में कहा जाता है कि वह दिन में सूर्य के निकलने पर खिल जाता है और रात होने पर मुरझा जाता है। यहां पर चन्द्रमा और कमल को एक प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि मैं सभी रानियों के साथ राजा दशरथ को पुण्य और सुंदर कल्याण की मूर्ति मानकर मन, बचन और कर्म से प्रणाम करता हूं। वे महाराजा दशरथ मुझे अपने पुत्र का सेवक समझकर मुझ पर कृपा करें। ऐसे राजा दशरथ को सृजित कर (रचकर) ब्रह्माजी ने भी बड़ाई पायी। राजा दशरथ और माता कौसल्या श्री रामजी के माता-पिता होने के कारण महिमा की अथाह सीमा हैं अर्थात इनकी महिमा का पार नहीं पाया जा सकता है। अवध के राजा दशरथ की वंदना करता हूं जो रामचंद्र जी के चरणों में सच्चा
प्रेम रखते थे, जिन्होंने दीनदयालु
प्रभु के बिछड़ते (वनवास जाते)
ही प्राण त्याग दिये। अपने शरीर
को मामूली तिनके की तरह त्याग दिया। -क्रमशः

(अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)

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