महाराष्ट्र

शरद पवार के घर में एक और दीवार

महाराष्ट्र की राजनीति में समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बिखराव की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि शरद पवार के आंगन में एक और दीवार खड़ी होती दिख रही है।

भाजपा निर्वाचन क्षेत्र पुनर्गठन विधेयक पारित कराना चाहती है। इस मामले मंे एनसीपी (पवार गुट) मंे मतभेद दिख रहा है। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भाजपा के पक्ष मंे राय दे रही हैं। वे इस बिल का समर्थन कर रही हैं लेकिन रोहित पवार ने इस बिल का जमकर विरोध किया है।

शरद पवार फिर बने संकट मोचक

राजनीतिक गलियारों मंे इस बात की भी चर्चा हो रही है कि शरद पवार के नेतृत्व वाला गुट और उनके भतीजे अजित पवार के नाम पर बनी एनसीपी का विलय हो सकता है। हालांकि अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार, जो राज्य की डिप्टी सीएम भी हैं, इसके पक्ष मंे नहीं दिख रही हैं। बहरहाल सांसद सुप्रिया सुले और विधायक रोहित पवार के विचार टकराते हैं तो एनसीपी शरद पवार गुट में एक और विभाजन हो सकता है।

महाराष्ट्र की राजनीति मंे एनसीपी (शरद पवार गुट) की कथित सीक्रेट बैठक ने भी कई सवाल खड़े किये हैं।
संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही डिलिमिटेशन का मुद्दा गरमाने लगा है। इस पर एनसीपी पवार गुट के सुर अलग-अलग हैं। विधायक रोहित पवार ट्विट कर इस बिल का जमकर विरोध करते नजर आ रहे हैं और वहीं, सुप्रिया सुले इस बिल का कुछ हद तक समर्थन करती नजर आ रही हैं।

रहस्य बनते शरद पवार

रोहित पवार ने ट्वीट कर कहा संसद के मानसून सत्र में ‘परिसीमन (निर्वाचन क्षेत्र पुनर्गठन) विधेयक’ को पारित कराना ही सत्ताधारी पक्ष का मुख्य उद्देश्य है। इसके लिए मीठी बातें करके राज्यों को 50 प्रतिशत अधिक सीटें देने का लालच भी दिया जा सकता है। लेकिन यदि हम इन आंकड़ों के जाल में फंसकर इस विधेयक का समर्थन करते हैं, तो जिस तरह नगर निगम चुनावों में राजनीतिक लाभ के लिए वार्डों का पुनर्गठन किया गया, उसी तरह लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का भी राजनीतिक फायदे के लिए पुनर्गठन किया जाएगा।

भौगोलिक सीमाओं या संवैधानिक मर्यादाओं की परवाह किए बिना केवल सत्ता बनाए रखने के उद्देश्य से यह परिसीमन किया जाएगा और असम में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
सत्ता के समीकरण अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा ने 2016 से ही अनुभवी पूर्व अधिकारियों की मदद से यह रणनीति तैयार कर रखी है कि किन-किन निर्वाचन क्षेत्रों का किस प्रकार पुनर्गठन किया जाए।

अब उन्हें केवल इस विधेयक के पारित होने का इंतजार है। तब तक विपक्ष के साथ सौहार्द का दिखावा किया जाएगा, तरह-तरह के आश्वासनों का लालच दिया जाएगा, विपक्ष को विश्वास में लेने का नाटक किया जाएगा और लोकतंत्र की बातें भी की जाएंगी लेकिन जैसे ही यह विधेयक पारित होगा, विपक्ष को ऐसे किनारे कर दिया जाएगा, जैसे शरीर से मक्खी झटक दी जाती है, और फिर से तानाशाही प्रवृत्ति हावी हो जाएगी।

शरद चाचा पर भारी पड़ा भतीजा

इसी प्रवृत्ति के तहत एक ओर परिसीमन और दूसरी ओर एसआईआर के माध्यम से संविधान पर प्रहार करने की तैयारी की जा रही है। इस साजिश को विफल करना है या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस विधेयक का समर्थन करके इसे सफल होने देना है, इस पर सभी को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। देश के युवाओं ने अब परिवर्तन लाने का संकल्प कर लिया है, इसलिए हमें उनका ईमानदारी से साथ देना चाहिए।

संघर्ष करना है या समझौता, यह निर्णय हर किसी को स्वयं लेना होगा। अब ‘अपना टाइम आएगा’ कहकर इंतजार करने का समय नहीं है, बल्कि ‘अपना टाइम आ गया’ इस विश्वास के साथ विपक्ष को एकजुट होकर और दृढ़ता से निर्णय लेने की आवश्यकता है।
डिलिमिटेशन बिल को लेकर शरद पवार गुट भी दो राय आने लगी है। सांसद सुप्रिया सुले कही न कही इस बिल को समर्थन देने की तैयारी में हैं और बोल रही हैं कि अगर सरकार 50 फीसद वाले फार्मूले का लिखित दे, तो विचार किया जा सकता है, वहीं रोहित पवार विरोध कर रहे हैं।

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‘ऑपरेशन टाइगर’ और एनसीपी अजित गुट में बढ़ते खींचतान की चर्चाओं के बीच अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) की एक कथित सीक्रेट बैठक ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर पार्टी के भविष्य पर चर्चा हो रही थी तो शरद पवार के सबसे चर्चित युवा चेहरों में शामिल रोहित पवार उस बैठक से बाहर क्यों रहे? क्या उन्हें जानबूझकर दूर रखा गया, या फिर इसके पीछे शरद पवार की कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति छिपी है? फिलहाल इन सवालों का कोई आधिकारिक जवाब नहीं है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार जरूर गर्म है।

सूत्रों के मुताबिक विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दौर में हुई इस बैठक में एनसीपी (शरद पवार गुट) के 10 में से 9 विधायक शामिल हुए। चर्चा इस बात पर हुई कि क्या पार्टी को अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होना चाहिए। दिलचस्प बात यह रही कि रोहित पवार इस बैठक में मौजूद नहीं थे। यही वजह है कि अब इस पूरी कवायद को सिर्फ एक सामान्य बैठक नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य से जुड़े संभावित फैसले के तौर पर देखा जा रहा है।

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मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विधानसभा सत्र के दौरान विधान भवन में एनसीपी (शरद पवार गुट) के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल ने पार्टी विधायकों की एक अहम बैठक बुलाई। बताया गया कि इस बैठक में रोहित पवार को छोड़कर बाकी नौ विधायक मौजूद थे। बैठक में व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर चर्चा हुई। सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि अधिकांश विधायकों ने भाजपा के साथ सीधे गठबंधन करने और एनडीए का हिस्सा बनने की वकालत की। हालांकि इस संबंध में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। बैठक में मौजूद नेताओं का मानना था

कि अजीत पवार गुट में विलय करने के बजाय एनसीपी (शरद पवार गुट) को अपनी अलग पहचान बनाए रखते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल होने पर विचार करना चाहिए। विधायकों का तर्क था कि अगर क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए पर्याप्त सरकारी फंड चाहिए और 2029 के विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना है, तो सत्ता के साथ जाना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।

बैठक मंे विधायकों की राय सुनने के बाद जयंत पाटिल ने कहा, ‘हमारे रुख पर राजनीतिक सवाल जरूर उठेंगे, लेकिन अब ठोस निर्णय लेने का समय आ गया है।’ इसके बाद उन्होंने विधायकों को भरोसा दिलाया कि उनकी बात पार्टी अध्यक्ष शरद पवार और सांसद सुप्रिया सुले तक विस्तार से पहुंचाई जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि ‘एनडीए के साथ जाना निश्चित रूप से एक विकल्प है, लेकिन इस पर अंतिम निर्णय आदरणीय शरद पवार ही लेंगे।

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इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चर्चित पहलू रोहित पवार की अनुपस्थिति रही। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भाजपा के साथ जाने के उनके कथित विरोधी रुख के कारण उन्हें बैठक से दूर रखा गया। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि
नहीं हुई है। खबर यह भी है कि बैठक की जानकारी मिलने के बाद रोहित पवार ने कई विधायकों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क किया और उनसे पूछा कि क्या वे वास्तव में भाजपा के साथ जाने के पक्ष में हैं। इससे यह साफ है

कि पार्टी के भीतर अलग-अलग राय मौजूद है।’(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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