बच्चो का कोना

बच्चों को अच्छे संस्कार कैसे दें?

हम इंसानों की दुनिया बहुत खूबसूरत है। यहां विभिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। हर एक का रहन-सहन अलग होता है उसी तरह सोच भी लोगों की अलग होती है। हमारा जन्म होता है हम बड़े होते हैं उसी हिसाब से हमें अपने बड़ों से संस्कार मिलते हैं। संस्कार मुख्य रूप से वातावरण, माता, पिता, अपने टीचर, अच्छी संगत का असर है। घर के बड़े यदि सही दिशा में हों तो बड़ों को देखकर ही बच्चे सीखने में विकसित होते हैं। इसके लिये घर में ऐसा माहौल हो जहां बुजुर्गों एवं माता-पिता अनुशासन, प्रेम, धार्मिकता और रिस्पेक्ट का वातावरण बच्चों के लिए बनाये रखें। शुरू से ही बच्चों को जिम्मेदारी लेना, अपनी गलतियों को मानना और दूसरों की मदद करना सिखाना चाहिये। आज के आधुनिक जमाने में बच्चे संस्कार को भूलते जा रहे हैं। हालांकि ऐसा कुछ परिवारों में देखने को मिलता है। इसलिये मां-बाप के लिए जरूरी है कि वो अपने बच्चों में संस्कार बनाये रखने के लिये तकनीक के साथ नैतिक शिक्षा को जोड़ें। बच्चों को बचपन से ही ऐसे संस्कार दें जो उनके लिये आगे चलकर सही हों। ईश्वर के प्रति आस्था, बड़ों के प्रति सम्मान, गीता, रामायण की कहानियांे के माध्यम से उन्हें नैतिक मूल्यों के बारे में समझायें। उन्हें सच बोलना, ईमानदार रहना सिखायें। उन पर दबाव न डालें उनको अपना मित्र बनाकर सही और गलत में अंतर सिखायें। हालांकि आजकल के युग में बच्चे इंटरनेट के इतने आदी हो गये हैं कि उनको होश ही नहीं रहता। बच्चों को इंटरनेट के प्रति और मोबाइल के प्रति काफी आकर्षण हो गया है। आजकल का तकनीकी वातावरण, सामाजिक माहौल और पर्यावरणीय कारकों के परस्पर प्रभाव बच्चों का मोबाइल और इंटरनेट का नतीजा है।
आजकल के स्मार्टफोन, घरेलू ब्रांडबेंड बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिससे उनके भंवर जाल में फंस जाते हैं। और इसी के चलते न वो स्कूल में अपना ध्यान केंद्रित कर पाता है न ही आउटडोर खेल के प्रति उसकी रुचि रह जाती है। आजकल के बच्चे और यहां तक कि युवा भी पारिवारिक परम्पराओं से दूर होकर आनलाइन सामग्री का सहारा लेते हैं। ऐसे में माता-पिता का यह फर्ज बनता है कि बच्चों की नींव शुरू से ही मजबूत रखी जाय। उनको स्पष्ट रूप से बार-बार यह बताया जाय कि उनकी सीमायें कहां तक हैं। उनको समय के अनुसार कार्य सौंपा जाये। मोबाइल एवं नेट के इस्तेमाल करने की सीमायें उन्हें बताई जाय। उनको यह समझाया जाये कि यदि उन्होंने ज्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया तो उनकी सोचने की क्षमता कमजोर हो सकती है। वे किसी भी कार्य को करने के लिये काफी समय की बर्वादी कर सकते हैं जो उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिये हानिकारक है। माना कि आज का जमाना इंटरनेट और मोबाइल का है पर उसे कैसे इस्तेमाल करना है यह शिक्षा सिर्फ माता-पिता ही दे सकते हैं। इंटरनेट को अपना आदी न बनायें। अपने समय को निर्धारित करें। उदाहरण के तौर पर एक मिडिल स्कूल के अभिभावक ने शाम को सोशल मीडिया पर समय बिताने के बजाय परिवार के साथ खाना पकाने का समय आउटडोर खेल के लिये पंजीकरण कराया। कुछ दिनों में ही बच्चे के मूड में और नींद में सुधार आ गया और उसके डिवाइस और मोबाइल का उपयोग कम हो गया। इसलिए माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों के लिए स्पष्ट और सुसंगत सीमायें निर्धारित करें।
आदर्श व्यवहार सिखायें, बच्चे के आमने-सामने बैठकर बात करें उसे संसार के बारे में बतायें और उन्हें अनुशासन में चलायें। उन्हें आॅफलाइन विकल्प प्रदान करें और आउटडोर गेम, क्लब, रचनात्मक परियोजनायें आमने-सामने सामाजिक समय इंटरनेट एक जटिल चीज है यह हमें कई मामलों में गुलाम बनाता है और कुछ मामलों में आजाद करता है। यह कहना कुछ हद तक बिल्कुल सही है कि आजकल इंटरनेट का प्रचलन काफी जोर से चल गया है। हर स्कूल, कालेज में शिक्षा इंटरनेट के माध्यम से होती है। आप इंटरनेट के माध्यम से कहीं भी और कभी भी पढ़ाई कर सकते हैं और यह वर्चुअल होने के साथ-साथ आरामदायक भी होती है जहां शिक्षक एक जगह रहकर पढ़ाई कर सकता है। काम, परिवार और जीवन के बीच अन्य चुनौतियों के बीच अपनी पढ़ाई को प्राथमिकता दे सकते हैं।
जब तक इंटरनेट कनेक्शन होता है एक शिक्षक आराम से अपने आरामदायक सोफे से लेकर काफी शाॅप तक आनलाइन शिक्षा कर सकता है। अपना खुद का रास्ता सीखने के लिये तय कर सकता है। इसके साथ ही आॅनलाइन शिक्षा के माध्यम से पूरी के बावजूद भी आनलाइन लर्निंग प्लेटफार्म आपके साथियों के साथ सहयोग और जुड़ाव के कई अवसर प्रदान करती है। यहां लोग अपनी पढ़ाई के विषय ग्रुप बना लेते हैं और उसी के माध्यम से वर्चुवल डिस्कशक, फोरम और ग्रुप प्रोजेक्टस करते हैं एक दूसरे को चुनौती देते हैं और एक समुदाय की भावना विकसित करते हैं। लोगों का मानना है कि पारंपरिक शिक्षा की तुलना से आॅनलाइन कोर्स ज्यादा किफायती होते हैं। कम लागत लगती है और बजट प्रेंडली होते हैं क्योंकि कहीं जाना नहीं होता। जहां आप हैं वहीं से अपनी पढ़ाई पूरी करें।
वहीं अगर इसके नुकसान की बात की जाये तो इसमें शिक्षकों और सहपाठियों के साथ आमने-सामने की बातचीत होनी असंभव रहती है। ग्रुप सिस्कर्शन सिर्फ आॅनलाइन हो पाता है। कभी-कभी आपको शारीरिक उपस्थिति, गैर मौखिक-संकेत और तत्काल प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है जो सीखने के अनुभव को और अधिक प्रभावी बना सकती है। आॅनलाइन पढ़ाई में नेटवर्किंग थोड़ी मुश्किल हो सकती है। आमने-सामने की मुलाकातें, कैंपस में होने वाले कार्यक्रम और सहपाठियों से हुई मुलाकातें पेशेवर संबंध बनाने और सामाजिक दायरा बढ़ाने में मददगार साबित होते हैं। मौखिक संवाद के अभाव में इंसान के हाव-भाव, चेहरे के भाव और शारीरिक भाषा के संकेत हमें एक अलग ही स्तर पर समझाने में मदद करते हैं। आॅनलाइन शिक्षा में हम लिखित एक मौखिक तौर पर ज्यादा निर्भर रहते हैं और जिससे हमें गैर मौखिक संकेतों में कमी महसूस हो सकती है। आनलाइन पढ़ाई कभी-कभी अकेला महसूस करा सकती है। फायदे और नुकसान दोनों को ही सामने रखते हुये हमें जीवन में आगे बढ़ना चाहिये और साथ ही इंटरनेट के उपयोग के साथ-साथ अपने बड़ों के आदर एवं सम्मान करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। (चक्षु स्वामी-हिफी फीचर)

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