लेखक की कलम

जगन मोहन रेड्डी का खेद प्रकाश

इसमें कोई संदेह नहीं कि देश ही नहीं दुनिया में सबसे चर्चित विषय भारत का निर्वाचन आयोग बन गया है। देश की विपक्षी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त
ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग कर रही हैं। एक अंग्रेजी दैनिक की खबर ने इस मामले मंे घी डाल दिया कि दो सहायक निर्वाचन आयुक्तों के विरोध के बावजूद ज्ञानेश कुमार ने मतदाता फार्म-6 में संशोधन किया। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर सवाल उठाया तो विरोध-समर्थन का एक अजीब तमाशा होने लगा। पूर्व जज और नौकरशाह ज्ञानेश कुमार के समर्थन में खड़े हो गये। अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के छात्र ज्ञानेश कुमार के समर्थन और विरोध में लामबंद हो गये। अब मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति के 2023 में बने कानून को समर्थन देने को लेकर आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने खेद जताया है। यह किसी मुकदमें मंे गवाह के पलटने जैसा मामला है। मोदी सरकार ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का कानून बनाया था। विपक्षी दलों ने विरोध भी किया लेकिन जगन मोहन रेड्डी जैसे कुछ विपक्षी नेताओं के समर्थन से ही कानून पारित हो गया था।
मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के चयन के लिए 2023 में लाए गए कानून का समर्थन करने को लेकर वाईएसआरसीपी प्रमुख वाईएस जगन मोहन रेड्डी के खेद जताने पर तेदेपा और बीजेपी ने सोमवार को उन पर निशाना साधा। आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने जहां राजनीतिक सुविधा का विकल्प अपनाने को लेकर रेड्डी की आलोचना की, वहीं भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उनके रुख में आए अचानक बदलाव पर सवाल उठाया है।
रेड्डी ने 18 अक्टूबर को संवाददाता सम्मेलन में कहा था, हम उस प्रक्रिया का समर्थन करने पर खेद व्यक्त करते हैं, जिसके तहत केंद्र में सत्ताधारी दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) को नामित करता है…न तो सीईसी और न ही राज्य निर्वाचन आुयक्त (एसईसी) की नियुक्ति सत्ताधारी दल द्वारा की जानी चाहिए। सीईसी चयन प्रक्रिया की तुलना एक परीक्षा से करते हुए उन्होंने कहा, परीक्षक को छात्र द्वारा नियुक्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अगर नियुक्ति किसी निष्पक्ष संस्था द्वारा नहीं की जाती है, तो एक ईमानदार निर्वाचन आयुक्त को भी आलोचना का सामना करना पड़ेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल होने चाहिए। इन तीनों को अपने मतदान के अधिकार का उपयोग करना चाहिए. रेड्डी कहा कि मौजूदा कानून के तहत, प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के पास दो वोट होते हैं, जबकि नेता प्रतिपक्ष के पास एक वोट होता है। उन्होंने कहा कि वाईएसआरसीपी को कानून का समर्थन करने के बाद अपनी गलती का एहसास हो गया था। राज्य निर्वाचन आयुक्तों (एसईसी) के लिए भी इसी तरह के सुधारों का सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्ति मुख्यमंत्रियों या सत्ताधारी दलों द्वारा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष प्राधिकार द्वारा की जानी चाहिए। इन टिप्पणियों पर तेदेपा नेता एन विजय कुमार ने वाईएसआरसीपी प्रमुख जगन पर राजनीतिक सुविधा का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में रहते हुए वाईएसआरसीपी ने इस कानून का समर्थन किया था, लेकिन चुनाव हारने के बाद अब वे चयन प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने 2019 से 2024 के बीच पिछली वाईएसआरसीपी सरकार के दौरान, राज्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को लेकर रेड्डी के रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए।
विजय कुमार ने कहा, निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता पर जगन की टिप्पणियां राजनीतिक सुविधा से प्रेरित हैं। सत्ता में रहते हुए वाईएसआरसीपी ने इस कानून का समर्थन किया था, लेकिन चुनाव हारने के बाद अब वे इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। उनके अनुसार, वाईएसआरसीपी सरकार ने अपने कार्यकाल में तत्कालीन एसईसी एन रमेश कुमार को हटाने के लिए एक अध्यादेश पेश किया था। इसके बाद, सरकार ने सेवानिवृत्त मुख्य सचिव नीलम साहनी को नियुक्त किया, जो रेड्डी की राजनीतिक सलाहकार रह चुकी थीं। यह नियुक्ति राज्य के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष और तेदेपा प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू से परामर्श किए बिना की गई थी। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने राज्य में चुनाव तंत्र को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी, उसे दूसरों को लोकतांत्रिक पारदर्शिता के बारे में उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
वहीं, बीजेपी नेता बी विनूषा रेड्डी ने भी जगन के रुख में आए बदलाव पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि केंद्र में दशकों तक सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस ने ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया, जिसमें प्रधान न्यायाधीश को शामिल करने वाली एक चयन समिति का प्रावधान हो? उन्होंने यह भी पूछा कि आंध्र प्रदेश में रेड्डी के पिता, दिवंगत मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल के दौरान ऐसा कानून क्यों नहीं लाया गया? विनूषा रेड्डी ने पूछा, वाईएसआरसीपी ने संसद में 2023 के कानून का समर्थन क्यों किया और अब पछतावा क्यों जता रही है? क्या रुख में यह बदलाव राजनीतिक हालात की वजह से आया है? बीजेपी नेता ने कहा कि संसद ने कानून पारित करते समय अपने विधायी अधिकार का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा कि इस कानून में एक चयन समिति का प्रावधान है,जिसमें प्रधान न्यायाधीश के बजाय, प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे।
विधेयक की मुख्य विशेषताएं हैं कि यह विधेयक चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कामकाज) अधिनियम, 1991 का स्थान लेता है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति, वेतन और बर्खास्तगी का प्रावधान है। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी। चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्रिमंडल मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेताध्सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल होंगे। इस समिति में रिक्ति होने पर भी चयन समिति की सिफारिशें मान्य रहेंगी। मंत्रिमंडल सचिव की
अध्यक्षता वाली एक खोज समिति, चयन समिति को नामों का एक पैनल प्रस्तावित करेगी। इन पदों के लिए पात्रता में केंद्र सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर कार्यरत होना (या रह चुके होना) शामिल है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और कार्यकारी आयुक्तों का वेतन और सेवा शर्तें कैबिनेट सचिव के समकक्ष होंगी। 1991 के अधिनियम के तहत, यह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के समकक्ष था।
चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया में सरकार का दबदबा हो सकता है, जिसका असर इसकी स्वतंत्रता पर पड़ सकता है। चयन समिति की संरचना में रिक्ति होने के बावजूद उसकी सिफारिशों को स्वीकार करने से प्रभावी रूप से उम्मीदवारों के चयन में सरकारी सदस्यों का एकाधिकार स्थापित हो सकता है। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त का वेतन कैबिनेट सचिव के बराबर करने से सरकार का प्रभाव बढ़ सकता है, क्योंकि यह सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है। यह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन से अलग है, जो संसद के अधिनियम द्वारा निर्धारित किया जाता है। सीईसी और ईसी अर्ध-न्यायिक कार्य भी करते हैं। इन पदों को वरिष्ठ नौकरशाहों तक सीमित रखने से अन्य योग्य उम्मीदवार वंचित रह सकते हैं।
मार्च 2023 में, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जांच करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की थी कि उनकी नियुक्ति केवल कार्यपालिका द्वारा नहीं की जानी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयुक्त कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतंत्र
होना चाहिए। अब इसी बात को जगन मोहन रेड्डी भूल सुधार के रूप में उठा रहे हैं।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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