
सभी प्राणियों में मनुष्य को सबसे ज्यादा विवेकवान माना गया है, वैसे तो सभी जीव-जंतुओं यहां तक कि पेड़-पौधों में भी चेतनता पायी जाती है। वनस्पतियों ने भी जीव होता है, यह प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री जगदीश चन्द्र बसु ने प्रयोग के माध्यम से सिद्ध भी किया था। जीव-जंतुओं में तो बहुत समझदारी पायी जाती है। पुलिस विभाग का डाग स्क्वायड कितने ही अपराधों की गुत्थी सुलझाने में मदद करता है। मनुष्य सबसे ज्यादा बुद्धिमान माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने प्रबंध काव्य रामचरित मानस में मनुष्य के विवेक को भी सावधान किया है। उन्होंने यह बताया कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण और दोषों से सनी हुई है लेकिन हमें गुण संग्रहीत करना है जबकि अवगुणों का त्याग करना है।
अस विवेक जब देहि
विधाता।
सब तजि दोष गुनहि मनुराता।।
काल सुभाउ करम बरिआई।
भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई।।
अर्थात् विधाता या ईश्वर जब ऐसा विवेक देता है जैसे हंस का होता है जो सिर्फ दूध ग्रहण करता है, पानी को छोड़ देता है, तभी हम दोषों को छोड़कर गुणों को ग्रहण कर सकते हैं। हमारा मन इस तरह के विवेक से ही गुणों की तरफ अनुरक्त हो सकता है। हालांकि समय और परिस्थितियां तथा प्रारब्ध के चलते भले लोग भी कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं।
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं।
दलि सुख दोष बिमल जसु देहीं।।
खलउ करहिं भल पाई सुसंगू।
मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।।
अर्थात् भगवान के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम साथ पाकर भलाई करते हैं लेकिन उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिट पाता है।
लखि सुवेष जग वंचक जेऊ, वेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।
उघरहिं अंत न होइ निबाहू, कालनेमि जिमि रावन राहू।।
अर्थात् जो लोग वेश बदलकर दूसरों को धोखा देते हैं। साधु का वेश बनाकर ठगते हैं क्योंकि समाज में साधुओं का सम्मान किया जाता है लेकिन ऐसे ठगों का मायाजाल ज्यादा दिन नहीं चल पाता, उनका कपट सामने आ ही जाता है जैसे कालनेमि, रावण और राहु का असली स्वरूप सामने आ गया था। कालनेमि ने
साधु का वेश धारण कर हनुमान जी को उस समय रोकने का प्रयास किया था जब हनुमान जी लक्ष्मण को शक्ति लगने के बाद संजीवनी बूटी की तलाश में जा रहे थे। रावण ने
साधु का वेश बनाकर सीता जी से भिक्षा मांगी थी और राहु ने देवता का रूप धारण कर अमृत पी लिया था। इन तीनों की अंत में गति क्या हुई, यह सभी जानते हैं।
किएहुं कुवेषु साधु सनमानू, जिमि जग जामवंत हनुमानू।
हानि कुसंग सुसंगति लाहू, लोकहुं वेद विदित सब काहूं।
हानि कुसंग सुसंगति लाहू, लोकहुं वेद विदित सब काहू।
दूसरी तरफ जो सज्जन हैं, वे कुरूप होने पर भी सम्मानित होते हैं। हनुमान जी और जाम्बवंत ने वानर और भालु के वेश में अवतार लिया था लेकिन उनका सम्मान सभी करते थे। यहां पर यह भी जान लेना चाहिए कि बुरे संग से हमेशा हानि और अच्छे लोगों के साथ से हमेशा लाभ होता है। यह बात संसार में सभी लोग जानते भी हैं। हमारे वेदों में भी इसका बखान किया गया है। इसको समझाने के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने कुछ उदाहरण भी दिये हैं-
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा, कीचहिं मिलई नीच जल संगा।
साधु-असाधु सदन सुक सारीं, सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।।
अर्थात् पवन का साथ पाकर धूल भी आकाश तक पहुंच जाती है और वही धूल जब नीचे की ओर बहने वाले जल का साथ पकड़ती है तो कीचड़ बन जाती है। एक दूसरा उदाहरण तोता-मैना का है। बताते हैं कि घर का जैसा वातावरण होता है, वैसा ही ये सीखते हैं। साधु के घर में रहने वाले तोता-मैना भगवान राम का नाम लेते हैं लेकिन जिस घर में लड़ाई-झगड़े और अपशब्द (गालियां) बोले जाते हैं तो ये पक्षी भी वही शब्द दोहराते रहते हैं।
धूम कुसंगति कारिख होई, लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।
सोइ जल अनल अनिल
संधाता, होइ जलद जग जीवन दाता।।
अर्थात् कुसंग के कारण धुंआ कालिख कहलाता है। उसे कोई छूना भी पसंद नहीं करता लेकिन वही
धुंआ अच्छा साथ पाकर सुन्दर स्याही बन जाता है जिससे वेद-पुराण लिखे जा सकते हैं। धुंआ इकट्ठा होकर कार्बन बनता है और कार्बन का प्रयोग स्याही बनाने में किया जाता है। वही धुंआ पानी, आग (ताप) और हवा का साथ पाकर बादल बन जाता है जो बारिश करके जगत को जीवन देता है। पानी न बरसे तो फसलें कैसे पैदा होंगी, मनुष्य और पशु जीवित नहीं रह पायेंगे। इसीलिए पानी को जीवन कहा गया है। इस प्रकार
ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।
अर्थात् ग्रह (नक्षत्र), औषधि (दवाएं) जल, वायु और वस्त्र- ये सभी कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ बन जाते हैं।
चतुर और विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैं।
सम प्रकास तम पाख दुहंु नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि, जग जस अपजस दीन्ह।
अर्थात् महीने के दोनों पखवारों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) में उजाला और अंधेरा समान ही रहता है लेकिन इनके गुण-अवगुण को देखकर ही इनका नामकरण अंधेरा पाख और उजाला पाख किया गया है। शुक्ल पक्ष चन्द्रमा को धीरे-धीरे बढ़ाता है जबकि कृष्ण पक्ष चन्द्रमा को धीरे-
धीरे कम करता है। इसी बात के लिए इन दोनों पाखों को यश और अपयश दिया गया। इसलिए ईश्वर ने हमें जो विवेक दिया है, उसका उपयोग कर हम यश के भागी बनें जबकि अपयश से दूर रहें। -क्रमशः (अशोक शांतिप्रिय-हिफी फीचर)



